Astrologer Jha Meerut

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ज्योतिष कक्षा पाठ -27 -नक्षत्रों के चरणाक्षर जानें -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ  ज्योतिषशास्त्र ने सूक्ष्मता से समझने के लिए...
18/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ -27 -नक्षत्रों के चरणाक्षर जानें -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ

ज्योतिषशास्त्र ने सूक्ष्मता से समझने के लिए प्रत्येक नक्षत्र के चार -चार भाग किये हैं ,जिन्हें पथम चरण ,द्वितीय चरण ,तृतीय चरण ,चतुर्थ चरण कहा जाता है | प्रत्येक नक्षत्र के जो चार -चार चरण होते हैं ,उनमें प्रत्येक नक्षत्र के चरण का एकेक "अक्षर " निर्धारित कर दिया है | जिस नक्षत्र के जिस चरण में जिस व्यक्ति का जन्म होता है ,उसका नाम उसी जमकालीन नक्षत्र के चरणाक्षर पर रखा जाता है | उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म सतभिषा नक्षत्र के चतुर्थ चरनाक्षर सू से प्रारम्भ करके सुरेश ,शुशील ,सुमित ,सुखीलाल ,और स्त्रिओं में सुरेखा ,इत्यादि रखा जायेगा | किस नक्षत्र के कौन -कौन से चरणाक्षर होते हैं ,इसे निम्न तालिका के द्वारा सहज ही समझा जा सकता है |
----नक्षत्र ----- प्रथम चरण --------- द्वितीय चरण ---- तृतीय चरण ------ चतुर्थ चरण

--अश्विनी ------ ------------चू ,----------------चे ,---------------चो ,-----------------ला

---भरणी ------------------ली-----------------,लू, ----------------ले, -----------------लो

--कृतिका------------------अ -----------------,इ ,--------------उ ,-------------------ए

--रोहिणी -----------------ओ ----------------,बा , -------------बी ,------------------बू

--मृगशिरा ----------------बे ------------------,बो ,---------क ,-------------------की

----आर्द्रा -----------------कू ------------------,घ ,---------ड ---------------------,छ

--पुनर्वसु ------------------के ,-----------------को ---------,ह --------------------,ही

--पुष्य ----------------------हू ,-------------हे ,------------------हो------------------,ड

--आश्लेषा ----------------- डी----------- ,डु ,-------------डे ---------------------,डो

--मघा ----------------------म ----------,मी--------------- ,मु ---------------------,में

---पूर्वाफाल्गुनी -----------मो -----------,ट ----------------,टी ---------------------,टू

--उत्तराफाल्गुनी ----------टे ,-----------टो -----------------,प-------------------- ,पी

---हस्त -------------------पू ,------------ष ,------------------ण -------------------,ठ

--चित्रा --------------------पे ,------------पो -------------------,र -----------------,री

--स्वाति --------------------रु ,------------रे ,------------------रो------------------- ,त

---विशाखा ----------------ती --------------,तू -------------,ते ,-----------------------तो

---अनुराधा ----------------न ,------------नी ,---------------नू ------------------------,ने

---ज्येष्ठा ---------------------नो ,------------या ,--------------यी ,---------------------यूं

-----मूल ------------------ये ,--------------यो ,------------भ ------------------==-,भी

---पूर्वाषाढ़ा --------------भू ,---------------ध ,------------फा ,------------------ढा

---उत्तराषाढ़ा -------------भे ,---------------भो ----------,ज -------------------,जी

--अभिजीत ---------------जू ---------------,जे ,---------जो ,-------------------ख

--श्रवण -------------------खी -----------,खू ------------,खे -------------------,खो

---धनिष्ठा -----------------गा ,----------गी ,-------------गू---------------------,गे

---शतभिषा -------------गो ,----------स ,--------------सी -------------------,सू

---पूर्वाभाद्रपद ---------से ,---------सो ,---------------दा ,--------------------दी

---उत्तराभाद्रपद ------दू ,----------थ ,-----------------झ --------------------,यं

-------रेवती ----------दे ----------,दो ,-----------------च ,---------------------ची

---- अगले भाग में पंचाग किसे कहते हैं पर परिचर्चा करेंगें ----भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

ज्योतिष कक्षा पाठ 26 -बालक के पैर देखना -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठसभी को नहीं किन्तु थोड़े पाठकों को यह अवश्य ज्ञात होगा कि...
18/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ 26 -बालक के पैर देखना -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ

सभी को नहीं किन्तु थोड़े पाठकों को यह अवश्य ज्ञात होगा कि जब घर में किसी बालक का जन्म होता है ,तो उसकी पैदाइश के बारे में पण्डित को बताया जाता है और पत्रा देखकर पंडित बताया करते हैं कि बालक के पैर सोने ,चांदी अथवा लोहे या ताम्बे के हैं | यहाँ हम उन्हीं चार पायों के बारे में बता रहे हैं | पाये निम्न चार होते हैं ----{1 }---सोना ,---{2 }--चांदी ,---{3 }--ताम्बा ,---{4 }---लोहा ----
---1 ---सोने के पैर -रेवती ,अश्विनी ,भरणी नक्षत्रों में जन्म सोने {स्वर्ण } का पाया {पैर } कहा जाता है ,जो मध्यम फलदायक माना जाता है |

----2 ---चांदी के पैर ---आर्द्रा ,पुनर्वसु ,पुष्य ,आश्लेषा ,मघा ,पूर्वाफाल्गुनी ,उत्तराफाल्गुनी ,हस्त ,चित्रा ,स्वाति ,विशाखा ,अनुराधा नक्षत्रों में यदि बालक का जन्म हो ,तो चांदी का पाया {पैर } होता है ,जो शुभ और श्रेष्ठ होता है |

---3 ---ताम्बे के पैर ---पूर्वाभाद्रपद ,{इसे भाद्रपदा भी लिखते हैं } ,उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों में जन्म लेना ताम्बे का पाया माना जाता है ,जो श्रेष्ठ होता है |

---4 --लोहे के पैर --उपर्युक्त नक्षत्रों के अतिरिक्त शेष सभी नक्षत्रों में लोहे का पाया माना जाता है ,जो नेष्ट और धन हानिकारक माना जाता है |

---विशेष ----कुछ विद्वान इस मत से विपरीत मत लिखते हैं | उनका अभिमत है कि इस रहस्य को समझने के लिए भाव -वेक्षण आवश्यक है | जिस प्रकार पलंग के चार पाये होते हैं ,उसी प्रकार द्वादश भावों को 4 भागों में विभाजित कर दिया है |

-1 ---प्रथमभाव ,षष्टभाव ,एकदश भाव ---इसका नाम रखा गया है स्वर्णपाद {सोने का पाया }

--2 --द्वितीयभाव ,पंचमभाव ,नवमभाव --इसका नाम रखा गया है रजतपाद --{चांदी का पाया }

--3 --तृतीयभाव ,सप्तमभाव ,दसमभाव --इसका नाम रखा गया है ताम्रपाद --{ताम्बे का पाया }

--4 -चतुर्थभाव ,अष्टमभाव ,द्वादशभाव --इसका नाम रखा गया है --लोहपाद --{लोहे का पाया }

--इस मतानुसार जिस भाव में चन्द्रमा बैठा हो --उसी भावानुसार पाया निर्धारित करना चाहिए |

-ध्यान दें --चांदी +ताम्बे के पैर उत्तम माने जाते हैं एवं सोना +लोहा के पैर उत्तम नहीं माने जाते हैं --यह उपचार से सही होते हैं | --अगले भाग में नक्षत्रों के चरणाक्षर पर प्रकश डालेंगें ----भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

12/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -40 -ज्योतिषी झा मेरठ
माँ शब्द की व्याख्या या व्युत्पत्ति या भावार्थ निकालना बहुत सहज नहीं है | --माँ छत्रछाया है ,माँ कृपा की मूर्ति है ,माँ ममतामयी है ---माँ के लिए सबका द्वार एक जैसा ही होता है --चाहे उसकी कोख से जन्मा अज्ञानी हो या ज्ञानी --सभी संतानें एक जैसी ही माँ को लगती है --माँ के दर पे कोई भेद भाव नहीं होता है | --मैं जब चोर था तब भी माँ के लिए वैसा ही था ,मेरे जीवन में माँ का भी बड़ा योगदान रहा है --भले ही मेरी माँ अनपढ़ थी -पर मुझको पढ़ाया है ,आश्रम में वही तो गयी थी नानी के साथ और 10 रूपये भी दिए थे | जब दीवाल गिरी तो न दीपक था न लालटेन पर माँ मुझको सबसे पहले ढूंढ रही थी | जब मैं कॉलेज में पढ़ने लगा तो 100 प्रतिमाह यही तो देती थी | एकबार पिता से युद्ध हुआ तो मैं रात के समय भागा गन्धराईन {अंधराठाढ़ी} से अपने गांव आया 15 किलोमाटर का सफर था --सांप मेरे पैरों में लिपट गया --मुझे पता नहीं मेरे पैरों में खून था क्योंकि मैं भागा -भागा माँ के पास ही तो आया था --भले ही औषधि की सामर्थ नहीं थी पर गरम पानी से साफ किया और देवताओं से दुआ मांगी थी --आज मैं इसलिए तो जिन्दा हूँ| जब भी घर से निकला तो पलकें बिछाये मेरी राह तो माँ ही देख रही थी | जब मैं रेडियो चुराया --गरीबी सही ईमानदार थी तभी तो चचेरे भाई से बोली गाली मत दो मैं रेडियो अपने भाई से दिल्ली से मंगबाकर दूंगीं --जबकि मैं तो चोर था | जिस पिता को घर की जिम्मेदारी सम्भालनी चाहिए वो काम तो माँ ने किया | शादी भी माँ ने करायी भले ही नानी का योगदान था --पर नानी भी तो माँ की माँ थी | --जब गरीबी थी तो खुद कई दिन खाना नहीं खाया पर मुझको तो पहले खिलाती थी | ---मेरी माँ में अनन्त गुण हैं --पर एक अबगुण ने --मुझे मरने पर विवस कर दिया --सत्ता और प्रभुता --बड़ा होना सहज है --पर उन धर्मों का भी पालन करना होता है जो सत्ता और प्रभुता के लिए अनिवार्य हैं --और मैं यही करना चाहता था --मैं चाहता था --मेरी माँ भले ही गरीबी देखी है --अब बढियाँ पहनें ,बढियाँ खाये ,अपने घर से बाहर न जाये ,मेरी माँ के पास लोग आये ,मेरी माँ सबकी अवश्य मदद करें पर सामर्थ के अनुसार ,मेरी माँ केवल दुआ मांगें तप की दुनिया में रहे ,किसी से लेनी -देनी ऐसी न करे जो जो दूसरे की हो ,अपने समय का सदुपयोग करे | ----ये वो राहें थी --जो असंभव थी --क्योंकि मेरे घर में दीदी का सदा साम्राज्य रहा है ,दीदी के पैसे व्याज पर लगाती रही है --घाटा होने पर हमारे पैसों से पूर्ति करती थी | सम्पूर्ण जीवन दीदी अपने बच्चों के साथ मेरे यहाँ निवास किया है----जबकि कोई अभाव नहीं है --ये बात मेरी माँ की समझ में क्यों नहीं आयी है | दूसरा कारण मेरे मामा रहे मेरे यहाँ शिक्षा मिली -सरकारी नौकरी मिली --करोड़पति हैं कभी भी --इतना नहीं कह सके --दीदी --जैसा बेटा -बहु कहते हैं वही करो ---बच्चों के सुख में ही माता पिता सुखी होते हैं | ---मैं अपनी कुण्डली देखी तो-- मेरा भाग्येश ,चतुर्थेश लग्न में विराजमान है --लग्नेश के साथ यह सर्वोत्तम योग है --सिंह लग्न की कुण्डली में सूर्य और मंगल लग्न में विराजमान हो चन्द्रमा उच्च का कर्मक्षेत्र में विराजमान हो --उस जातक को माता ,सम्पत्ति ,वाहन ,भवन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है ---ये तमाम सुख मुझे मिले ---फिर ऐसा क्या था ------आगे की चर्चा आगे करेंगें -----ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

11/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -39 -ज्योतिषी झा मेरठ
बड़ा पुत्र होना वरदान या अभिशाप है ---अपनी कसौटी पर परखने के बाद ही अहसास किया जा सकता है | --रामचरित मानस में श्री राम का राज्याभिषेक होते ही पाठ पूर्ण हो जाता है जबकि वस्तुतः --उत्तरकाण्ड के बिना रामायण अधूरी है --यह बात केवल ज्ञानी पुरुष ही समझ सकता है | --अस्तु --मुझे जो कुछ भी मिला है वो पिता की देन है वो न होते तो मेरा क्या अस्तित्व होता | हर पिता अपने बड़े पुत्र को अपने अनुसार ढालना चाहते हैं --परिणाम यह होता है --माँ को बड़ा पुत्र तभी खो देता है जब पिता की राह चलता है | मेरे साथ ऐसा ही हुआ --पिता की बताई राह पर चला तो --पिता में ही समा गया --मुझे भले ही पिता ने कुछ दिखाया नहीं, बताया नहीं पर अनुसरण मैं पिता का ही करता गया | पिता मान हैं ,पिता शान हैं ,पिता अभिमान भी हैं किन्तु --ममतामयी नहीं हो सकते --यह आशीर्वाद केवल छोटी सन्तान को माँ से मिलती है | जीवन भर पिता के वसूलों पर चलते -चलते --बड़ा पुत्र --न भाई का न बहिन का ,न माँ का ,न परिजनों का होता है बल्कि उसे हर वो काम करना होता है --जिससे पिता को ठेंस न पहुंचे --अन्त में उसे मृत्यु के सिवा कुछ नहीं दिखता है | मेरे साथ ऐसा ही हुआ | पिता आश्रम छोड़ कर आ गए उम्र थी --13 वर्ष --फिर कभी देखने नहीं गए --गयी तो माँ और नानी देखने | आश्रम से निकाला तो --पिता नहीं ताऊ छोड़ आये | पातेपुर जिला वैशाली पढ़ने गए तो खुद गए | मेरठ आये तो खुद आये | शादी करबादी --पर सारा कर्य मुझ पर डाल दिए | घर की गरीबी थी तो हमने गरीबी हटाई --पूजा से, दान से, कमाई से | मुझे किसी ने --15000 दिए पढ़ने के लिए --1995 में वो सारा धन से ईंट खरीदी | पतनी का मंगलसूत्र बेचा तो पिता के कहने से | पतनी का आदर नहीं किया तो ये सोचता था पिता हैं न देख लेंगें पर कभी देखा नहीं | जब पिता को मजबूत किया तो सबसे कमजोर मैं ही हुआ | जीवन भर -सत्यं वद ,घर्मं चर - -यही सीखता रहा --यही करता रहा --पर मातृदेवो भव यह उच्चारण पहला होता है --यह एक शास्त्री होकर भी नहीं सीख पाया | जब पिता से हिसाब माँगा तो बोले काहे का हिसाब --जो दिया खाया | भाई -भाई का युद्ध हुआ तो मेरी दो कन्या थी --माता पिता -छोटे से बोले तू गरीब हो जायेगा क्योंकि तू अनपढ़ है ,ये पढ़ा लिखा है --ये कभी गरीब नहीं होगा | जब हिस्सा की बारी आयी तो मुझे कम और खराब भाग मिला --क्योंकि तब तक मुझे अकल आ चुकी थी --42 वर्ष का हो चूका था | जीवन भर सोचता रहा पिता को तकलीफ न हो --यह धर्म है यह अधर्म है | पर घर्म की परिभाषा लोग अपने -अपने अनुसार करते हैं ---मेरा एक ही घर्म था पिता की शान पर सदा खड़ा उतरु ---इसका परिणाम यह हुआ --न पतनी के हो सके , न माँ के हो सके न भाई -बहिन के हो सके न ही परिजनों के हुए ---अन्त में मृत्यु ही नजर आने लगी | ---2015 ,16 ,17 --तक आत्म मंथन करने के बाद --इस निष्कर्ष पर पहुंचा ---अपनी आत्मकथा लिखें --तो हो सकता है --कमी कहां रह गयी मिल जाय --पर लिखना बहुत आसान नहीं था --कई -कई रात निन्द नहीं आयी ,कई बार मोटर साइकिल से टकरा गया --चलता किघर और था मन कहीं और था ----जबकि 4 जी नेट था ,100 +500 रूपये की भरपूर मात्रा में सेवा चल रही थी | फ्री सेवा पूर्ण यौवनमें थी | गुजरात +राजस्थान के बहुत से लोग अमेरिका में रहते हैं | सेवा लेने के बाद 2 तीन लोग अमेरिका ले जाना चाहते थे --मेरा यह सपना --1994 वर्ष जब मैं मुम्बई में पढता था तो घर की माली हालत के कारण रह गया था --मैं अमेरिका जाना भी चाहता था ---पर होनी को किसने रोकी है ----आगे की चर्चा आगे करेंगें -----ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

10/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -38 -ज्योतिषी झा मेरठ
2015 --नेट की दुनिया में अब नया क्या करें जिससे लोगों के दिल में मेरे प्रति और श्रद्धा बढे | क्योंकि जो आलेख ज्योतिष और कर्मकाण्ड के थे जिनको हम ठीक से जानते थे सभी लिख चुके थे | कई दिन सोचता रहा एक दिन फिर मेरे मन में विचार आया --क्यों न अपनी जीवनी को झांककर देखूं --कहाँ से चला था और कहाँ आ गया | पिता से मैं स्नेह बहुत करता थाऔर पिता भी मुझसे बहुत स्नेह करते थे | जब भी पिता का और मेरा आमना -सामना होता था तो युद्ध बहुत होता था | पिता के अपने तर्क थे जो अनपढ़ता की होती थी --मेरे अपने तर्क थे --जो केवल शिक्षा पर आधारित थे ---ये उसी तरह था जैसा सूर्यदेव +शनिदेव हैं | पिता पुत्र हैं --सभी पूजते दोनों को हैं किन्तु दोनों के जीवन में मतान्तर बहुत हैं | मैंने अपने पिता की जनमपत्री देखी तो पता चला मेरे भाग्य क्षेत्र में और पिता के संतान क्षेत्र में नीच का शनि है ---साथ ही शनि की महादशा मेरी चालू हुई ही थी | रोग और शत्रुता अति बढ़नी थी | --मेरी जन्मपत्री में लिखा हुआ था --44 से 47 मृत्यु योग ----इस बात को मैं 1990 से जनता था पर कभी इस ओर ध्यान इसलिए नहीं दिया --गुरूजी ने अपनी जन्म पत्री देखने के लिए मना कर दिया था | अतः ईस्वर अधीन ही हम रहने लगे | जब शनि दशा चालू हुई तो मेरे मन में मरने का विचार आया कि आत्महत्या कर लूँ --पिता के स्वभाव के कारण --सबकुछ था पर जिस घर को बनाने में जीवन लगा दिया --उस घर में सबसे विशेष तिरस्कार मेरा ही हो रहा था | तो मेरे मन विचार आया अपनी जीवनी लिखूं तो शायद कोई मार्ग मिल जायेगा | मुझे सबसे बड़ा दुःख होता था --धन है ,मकान ,पुत्र है सभी परिजन हैं ,--जिस घर में कभी रोटी नहीं थी --आज सभी लखपति हैं ---सभी परिपूर्ण हैं --परन्तु मुझे ही सबने अलग कर दिया --अतः --2017 में हमने जीवनी लिखनी शुरू की | और मैं देखना चाहता था --कमी कहाँ रह गयी ---इसी बीच --2018 --फरबरी माह में सुखद समाचार आया --बड़ी पुत्री को पुत्र {धेबता } हुआ | नेट की दुनिया में अपनी कला दिखाने के लिए हारमोनियम से कई भजन गाये हैं जो बिडियो युटुब पर उपलब्ध हैं | मेरे आलेखों को जब पाठकगण पढ़ते -पढ़ते थक जाते थे तो बीच -बीच में मनोरंजन भी हो जाय जिससे मन में रोमांच होने लगे --तो कभी मैथिली गीत या भजन तो कभी हिन्दी भजन तो कभी उपदेश बिडियो भी मैं प्रसारित करता रहा | जिससे पाठक गण जुड़े रहें ---अतः --2018 जनवरी में सबसे सुन्दर और अन्तिम हारमोनियम खरीदा --पर होनी को किसने देखी है ----आगे की चर्चा आगे करेंगें -----ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ-----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

10/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -37 -ज्योतिषी झा मेरठ
2014 --नेट की दुनिया इतनी सरल भी नहीं थी | 2 जी से 3 जी हो गयी --अब लिखने में सरलता थी -232 साइडों पर पहुंचे | कई बार उदास हुए ---ऐसा लगा कि आगे नहीं बढ़ सकते हैं --कई ऐसी साइडें आज भी हैं जिन पर मेरी पहुंच नहीं है --वहां फी सेवा लिखी हुई है --पर एक काम अच्छा हो गया था जो हम भी नहीं जानते थे --वहाँ यह लिखा हुआ है इस लिंक पर पधारें --सबकुछ तो है किन्तु --लिंक उपलब्ध नहीं है | फ्री सेवा में लिप्त रहता था ---इस सेवा की वजह से --बड़े दूर -दूर के लोग मुझसे मिलने आते थे | एक व्यक्ति बिहार निवासी मेरठ पल्लवपुरम में रहते हैं --बड़े ऊचे पद पर आसीन हैं --सिर्फ यह देखने आये --जो काम हम जैसे लोग नहीं कर पाये वो आप छोटे से शास्त्री कैसे करते हो | --मानो उठना गिरने के लिए होता है --और गिरना उठने के लिए --सो मैं कई बार गिरा और फिर स्वयं ही उठा भी | हमारे ब्लॉगर को पढ़ने वाले कई लाख लोग रहे --सबसे ज्यादा अमेरिका के --वह ब्लॉगर आज भी उपलब्ध है पर वहां अब लिखना नहीं होता है | ---मैं कुछ बातों को बाल्य्काल से ही जनता हूँ --मेरी कुण्डली पिताजी एक आचार्य के पास गए थे --तब मेरी उम्र --8 वर्ष थी --उन्हौनें कहा था एक दिन राजा बनेगा --फिर कभी पिताजी ने न तो कुण्डली दिखाई न ही कोई उपचार कराये | एकबार मैं आश्रम लगमा बिहार में, खुद हमने आचार्य से निवेदन किया तो बोले तुम एक दिन राजा की तरह होंगे --तब राहु की दशा चल रही थी उम्र थी --16 वर्ष --न उपचार कर पाया न ही ठीक से समझ पाया क्योंकि दरिद्र की सीमा से भी नीचे था | एकबार मेरठ में श्री जगदीश आचार्य थे --उनसे निवेदन किया कुण्डली देखने हेतु --बोले 3 भवन होंगें और शीग्र एक भवन का योग है -------तब मैं पराधीन जीवन --जात्तीबाड़ा मेरठ में जी रहा था --दो कन्या भी थी --यकीन नहीं आया न ही उपचार किये तब उम्र थी --26 वर्ष | --ध्यान दें --ज्योतिष में योग को बिरले ही जानते हैं योग क्या होता है --पर इसके लिए उपचार और समय जरुरत होती है | हमलोग कुण्डली दिखाते तो हैं किन्तु निदान नहीं करते साथ ही समय की प्रतीक्षा नहीं करते हैं | --2014 -मेरा अन्तिम सर्वोत्तम सुखद वर्ष था --जाते -जाते --एक और भवन का योग बना --यह भवन छोटी बेटी की उत्तम शादी हो इसके लिए लिया --पर होनी को कौन टालता है | मेरी कुण्डली में शनि की दशा शुरू हुई --सर्वप्रथम रोग और शत्रुता मिलनी थी ---इसकी चर्चा अगले भाग में करूँगा |---ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ : ज्योतिष की नजर में सुश्री ममता बनर्जी का सन -2026 ...
06/05/2026

खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ : ज्योतिष की नजर में सुश्री ममता बनर्जी का सन -2026 ...

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ज्योतिष कक्षा पाठ -23 -नक्षत्रों के स्वामी को जानने हेतु पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ पाठकगण -आपने नक्षत्रों को जाना अब क्रम ...
05/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ -23 -नक्षत्रों के स्वामी को जानने हेतु पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ

पाठकगण -आपने नक्षत्रों को जाना अब क्रम से नक्षत्रों के स्वामी कौन -कौन से हैं देखें और अनुभव को याद सदा रखें ----{1 } -अश्विनी --अश्विनी कुमार , ---{2 }--भरणी ---काल ,----{3 }---कृतिका ---अग्नि ,---{4 }--रोहिणी ---ब्रह्मा ,--{5 }--मृगशिरा --चन्द्रमा ,---{6 }--आर्द्रा --रूद्र ,---{7 }--पुनर्वसु ---अदिति ,----{8 }--पुष्य ---गुरु --{बृहस्पति },---{9 }--आश्लेषा ---सर्प ,---{10 }--मघा ---पितर ,---{11 }--पूर्वाफाल्गुनी ---भग ,----{12 }--उत्तराफाल्गुनी ---अर्यमा ,---{13 }--हस्त --सूर्य ,----{14 }--चित्रा ---विस्वकर्मा ---{15 }--स्वाति ---पवन ,---{16 }--विशाखा ---शुक्राग्नि ,----{17 }---अनुराधा --मित्र ,---{18 }--ज्येष्ठा ---इन्द्र ,---{19 }--मूल ---निरऋति ,---{20 }--पूर्वाषाढ़ा --जल ,---{21 }--उत्तराषाढ़ा ---विश्वेदेव ,----{22 }---अभिजीत ---ब्रह्मा ,---{23 }--श्रवण ---विष्णु ,---{24 }--धनिष्ठा ---वस् ,---{25 }---शतभिषा ---वरुण ,---{26 }--पूर्वाभाद्रपद ---अजेकापद ,----{27 } उत्तराभाद्रपद --अहिर्बुधन्य ,---{28 }--रेवती --पूषा ----ये नक्षत्रों के स्वामी हैं --हर जातक के जन्म अलग -अलग नक्षत्र में होता है --अतः फलादेश करते समय व्यक्ति का स्वभाव इस पर भी निर्भर करता है | ------अगले भाग में नक्षत्र कितने प्रकार के होते हैं --इस पर चर्चा करेंगें ---- भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

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04/05/2026

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ज्योतिष कक्षा पाठ -22 नक्षत्र किसे कहते हैं -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ ज्योतिष के नवीन पाठकों को यह शंका हो सकती है कि जब ...
04/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ -22 नक्षत्र किसे कहते हैं -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ

ज्योतिष के नवीन पाठकों को यह शंका हो सकती है कि जब इस विराट आकाश में असंख्य तारागण हैं ,तो फिर भारतीय ज्योतिष ने अपने गणित और फलित आदि में 27 नक्षत्र और 9 ग्रहों को ही प्रधानता क्यों दी ? ---उनकी इस शंका का समाधान यह है कि आकाश में प्रायः गोल "कुछ लम्बोतरा -सा " मार्ग है | इस मार्ग पृथ्वी 1 ,100 मील प्रति घण्टे की गति से निरन्तर चक्कर लगाया करती है | आकाश में कोई सड़क -मार्ग तो है नहीं , न ही वहां मील के कोई मापक पथ्थर ही लगे हैं ,तब यह कैसे पता चले कि पृथ्वी कितना चल चुकी है और अब कहाँ है ? ---इस समस्या को हल करने के लिए जिस मार्ग पर पृथ्वी घूमती है ,---उस पर या उसके आसपास स्थित नक्षत्रों में से 27 नक्षत्रों को चुन लिया गया है | ये स्थिर नक्षत्र हैं | ग्रह तो घूमते रहते हैं किन्तु नक्षत्र अपने स्थान पर स्थित रहते हैं |
-----इन नक्षत्रों से वो ही काम लिया जाता है --जो दूरी जानने के लिए मील के पत्थरों से लिया जाता है | इस प्रकार पृथ्वी के गोलाकार मार्ग को 27 नक्षत्रों में बाँटने की व्यवस्था इसलिए की गई है ---जिससे कि आकाश निश्चित स्थान का निर्देश किया जा सके | एक विशेष बात यह भी है कि आकाश -मण्डल में असंख्य ताराओं के समूहों द्वारा जो विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनती है ,उन्हीं आकृतियों ,अर्थात ताराओं के समूह को नक्षत्र कहा जाता है ,तथा प्रत्येक नक्षत्र का एकेक नाम रख दिया गया है |

--1 --अश्विनी ,--2 -भरणी ,---3 --कृतिका ,--4 --रोहिणी ,---5 ---मृगशिरा ,---6 ---आर्द्रा ,---7 ---पुनर्वसु ,--8 ---पुष्य ,-----9 आश्लेषा ,---10 ---मघा ,--11 ---पूर्वाफाल्गुनी ,----12 --उत्तराफाल्गुनी ,---13 ---हस्त ,--14 --चित्रा ,---15 स्वाति ,--16 --विशाखा ,---17 --अनुराधा ,---18 ---ज्येष्ठा ,---19 --मूल ,---20 ---पूर्वाषाढ़ा ,---21 ---उत्तराषाढ़ा ,--22 --श्रवण ,--23 --धनिष्ठा ,---24 --शतभिषा ,---25 --पूर्वाभाद्रपद ,---26 ---उत्तराभाद्रपद ,--27 ---रेवती |

----किसी समय वैदिक काल में उत्तराषाढ़ा और श्रवण के बीच में अभिजीत नामक नक्षत्र की गणना और की जाती थी | किन्तु अब 27 नक्षत्रों के अतिरिक्त 28 वां नक्षत्र अभिजीत भी माना जाता है | उत्तराषाढ़ा की अन्तिम 18 घटि तथा श्रवण के प्रारम्भ की 4 घटि ,-----इस प्रकार कुल 19 घटियों के मान वाला नक्षत्र अभिजीत है | सामान्यतः 1 नक्षत्र की 60 घटि होती है | -----अगले भाग में नक्षत्रों के स्वमियों की चर्चा करेंगें | - -- भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

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