15/07/2026
॥ बजरंग बाण ॥
दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करें सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान॥
चौपाई
जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा॥
बाग उजारि सिन्धु महँ बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा॥
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुरपुर में भई॥
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी॥
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होइ दुःख करहु निपाता॥
जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर॥
ॐ हनु-हनु-हनु हनुमन्त हठीले। वैरिहि मारु वज्र सम कीले॥
गदा वज्र लै वैरिहि मारो। महाराज निज दास उबारो॥
सुनि हुंकार हुंकार दै धावो। वज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥
ॐ हीं हीं हीं हनुमन्त कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा॥
सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दूत धरु मारु धाय कै॥
जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहीं जानत है दास तुम्हारा॥
वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥
पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं॥
जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमन्ता॥
बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर सालक॥
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मरा॥
इन्हेंहिं मारु, तोहि शपथ राम की। राखु नाथ मर्यादा नाम की॥
जनकसुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ॥
जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा॥
उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥
अपने जन को कस न उबारो। सुमिरत होत आनन्द हमारो॥
ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी॥
ऐसो बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा॥
है बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ॥
है कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ॥
जन की लाज जात एहि बारा। धावहु है कपि पवन कुमारा॥
जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना॥
जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई॥
जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे॥
जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता॥
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा॥
राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना॥
विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुण बहु भाँति॥
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउँ विधि नाना॥
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई॥
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे॥
एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी॥
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना॥
मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं॥
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की॥
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासै॥
भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई॥
प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई॥
आवत बारह प्रतिदिन जापै। ता की छाँह काल नहिं चापै॥
दै गुग्गुल की धूप हमेशा। करे पाठ तन मिटे कलेषा॥
यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौं फिर कौन उबारे॥
शत्रु समूह मिटे सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै॥
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहे सदा कपिराज सहाई॥
दोहा
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरें उर ध्यान॥
तेहि के कारज तुरत ही। सिद्ध करें हनुमान॥