12/11/2025
21वीं सदी के भारत में पत्रकारिता में एंकर ही पत्रकार समझे जाने लगे और असली पत्रकार पीछे हो गए इसका नतीजा यह हुआ कि खबरों की जगह प्रोपेगेंडा और सच्चाई की जगह झूठ और फैक्ट की जगह गलत खबरें फैलने लगीं
सनसनी फैलाने के लिए झूठ बोले जाने लगे, असलियत दबकर रह गई, आरोपियों के नाम और उन की पालिटिकल टिल्ट देखकर उनके ऊपर सॉफ्ट होना और किसी 'अलग' तरह के नाम को ढूंढने की कोशिश--इस वजह से पत्रकारिता की मान्यताएं यानी वैल्यूज खत्म हो गईं
नतीजा यह हुआ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पत्रकारिता के स्तर को बहुत ही ज्यादा निम्न माना जाने लगा, जग हंसाई होने लगी, किसी भी मामले में सजायाफ्ता या आरोपी या ऐसा शख्स जिसके खिलाफ सुबूत हों उसके बारे में कोई भी नेगेटिव शब्द न लिखना मगर..
. जिस व्यक्ति का कोई भी लिंक ना मिले और न सुबूत हो मगर फिर भी सिर्फ उसका नाम किसी 'और तरह' का हो तो उसको ही बगैर सुबूत के आरोपी बना देना और जांच से पहले ही इस तरह पेश करना जैसे वह क्रिमिनल हो..
उसे बदनाम करना और टार्गेट करना, यह दोहरी मानसिकता और विकृत माइंडसेट इसकी वजह से पूरा समाज ही नहीं बल्कि विश्व भर में बदनामी शुरू हो गई...
रिजल्ट यह हुआ कि देश के बाहर के बाहर इमेज बन गई कि भारत की पत्रकारिता स्टैंडर्ड नहीं, ये बात है भी कि सेगमेंट, सेक्शन, पार्टी कनेक्शन, आइडेंटिटी यानी आपकी कोई भी पहचान जैसे धर्म या जाति के आधार पर होती है
यानी यहां अगर एक व्यक्ति एक धर्म का है तो उसकी किसी भी घटना में नाम आने पर न फोटो छापा जाएगा, न हैडलाइन में उसका नाम होगा और न उसके कृत्यों के बारे में कुछ लिखा जाएगा बल्कि सब कुछ सॉफ्ट कर दिया जाएगा
और अगर दूसरे धर्म का व्यक्ति होगा तो उसकी सजा तो दूर, केस चलने बल्कि एफआईआर से पहले ही उसका नाम न भी आया हो तो भी जबरदस्ती उसकी फोटो छाप कर उसको बदनाम किया जाएगा
मिसाल के तौर पर घटना कुछ और है मगर वहां एक गाड़ी के मालिक का नाम देवेंद्र है तो ये नहीं बताया जाएगा बल्कि कई साल पहले देवेंद्र ने किस से गाड़ी खरीदी थी, उसका नाम अलग तरह का हो तो उसको ही घटना से जोड़ दिया जाएगा
इस तरह से ज्यूडिशल प्रोसेस को भी डिस्टर्ब करना यानी जो काम प्रॉसिक्यूशन और कोर्ट का है, वह कोर्ट में पहुंचने से पहले ही एक तरफ माहौल बना कर और झूठ फैला कर, लीगल प्रोसेस को subvert करने की कोशिश
समाज में नफरत बढ़ाना, शांति भंग करना और इस तरह से मीडिया ने जो किया, इससे पूरे विश्व में भारत की पत्रकारिता को इस तरह से देखा जाने लगा कि यहां आदमी निष्पक्ष नहीं है
एंकर या गटर जर्नलिज्म के प्रैक्टिशनर किसी तरह के आंकड़े से मतलब नहीं रखते और न वह साल भर में बाकी दर्जनों मामलों पर लिखेंगे, उनको आंकड़े नहीं पता, हकीकत से मतलब नहीं
वह सिर्फ ऐसा केस चाहते हैं जहां उनको एक खास एंगल या कम्यूनल माहौल बनाने का मौका मिले और जांच से पहले ही नफरत का एनवायरनमेंट बना कर समाज को इसमें झोंक दें
वह सिर्फ यह चाहते हैं कि किसी तरह सही धर्म के आधार पर किसी भी घटना को टीवी या अखबार में छापें, जब आप सिर्फ झूठ और नफरत का कारोबार करें, देश और समाज को धोखा दें
इसीलिए लोग जब विदेश में जाते हैं तो उनको अंदाजा होता है कि उनके यहां हो रही पत्रकारिता और राजनीति को बाहर अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता बल्कि हैरानी का इजहार होता है
क्योंकि वहां के समाज में लोग कोई बात इतनी ज्यादा बाएस से नहीं देखते और कुछ सिस्टम्स हैं, जैसे जस्टिस के सिस्टम में फेयरनेस है, बाहर लोगों को अंदाजा हो चुका है कि यह न्याय पर आधारित व्यवस्था नहीं है
क्योंकि मीडिया हाउस एक खास सेगमेंट के लोगों के हाथ में है उसी प्रकार के लोगों को एंकर बनाते हैं जिनका न पत्रकारिता का कोई खास तजुर्बा होता है और ना उनको फेयरनेस के बारे में कुछ मालूम होता है
वह सिर्फ एक चीज जानते हैं कि Hate sells यानी सांप्रदायिकता, भेदभाव, नफरत, प्रोपेगेंडा, झूठ और ऐसी खबरें जिसकी वजह से समाज में खौफ या सनसनी फैले और समाज में दरार आए, वही उनको छापना है
सिर्फ एक मिसाल है, ये लोग एक केस में सनसनी फैला कर पचास करोड़ लोगों को पच्चीस करोड़ लोगों के खिलाफ गुस्सा दिलाने और भड़काने की कोशिश करते हैं
इससे समाज का इतना बड़ा नुकसान होता है, देश में पूरे पूरे समाज आपस में एक दूसरे पर शक और सस्पिशन करने लगें, तो ये कितना घातक है, आधा समाज मिडिया देखना बंद कर चुका है, एंकरों की तनख्वाहें पांच से पचास लाख हैं
सिस्टम तो बर्बाद कर ही दिया, आने वाले दिनों में मीडिया में जो नौकरियां हैं वह खत्म होती चली जाएंगी और गवर्नमेंट एडवर्टाइजमेंट का सिलसिला भी तीन से पांच साल में कम हो जायदा
मगर एंकरों के बल पर होने वाली इस विकृत पत्रकारिता के दौर को हमेशा याद रखा जाएगा, ये वह भयावह दौर है जब कई आ-त - की केस में आरोपी को इलेक्शन में लड़ाया और जिताया जाता है मगर मीडिया की आवाज नहीं निकलती
अ-मीश से अंज*ना, सा*वंत से &रूर, अ*रनब से चि*त्रा, इस्मिता अंधकार तक ये ज्यादातर लोग आज इस हालत के जिम्मेदार हैं कि इंटरनेशनली भारत का मीडिया अब 180 देशों में 159 वें नंबर पर है, बस 180 तक पहुंचने की देर है
[Shams Ur Rehman Alavi]