30/08/2026
१. चैत्र (मार्च - अप्रैल) — गुड़
क्या न खाएं: गुड़
कारण: इस मौसम में सर्दियां खत्म हो रही होती हैं और शरीर में जमा हुआ कफ पिघलने लगता है। गुड़ की तासीर गर्म होती है, इसलिए इस मौसम में इसे खाने से पेट में गर्मी बढ़ सकती है, त्वचा पर दाने निकल सकते हैं और पाचन बिगड़ सकता है।
२. वैशाख (अप्रैल - मई) — तेल
क्या न खाएं: ज्यादा तेल और तली-भुनी चीजें
कारण: गर्मी तेज होने लगती है और शरीर की पाचन शक्ति धीमी पड़ जाती है। तेल वाली चीजें पचने में भारी होती हैं, जिन्हें खाने से सुस्ती, अपच और एसिडिटी की समस्या होती है।
३. ज्येष्ठ (मई - जून) — पन्थ (यात्रा)
क्या न करें: दिन के समय लंबी यात्रा या धूप में पैदल चलना
कारण: यह भयंकर गर्मी और 'लू' (गर्म हवाओं) का समय होता है। धूप में ज्यादा चलने से डिहाइड्रेशन (पानी की कमी), हीट स्ट्रोक और अत्यधिक थकान होने का खतरा रहता है।
४. आषाढ़ (जून - जुलाई) — बेल (Bael Fruit)
क्या न खाएं: बेल या बेल का शरबत
कारण: यह मानसून की शुरुआत का समय है। इस मौसम में पाचन तंत्र साल में सबसे ज्यादा कमजोर होता है। बेल पचने में भारी होता है और उमस भरे मौसम में इसे खाने से पेट फूलने या हाजमे की दिक्कत हो सकती है।
५. सावन (जुलाई - अगस्त) — साग (हरी पत्तेदार सब्जियां)
क्या न खाएं: पालक, मेथी, बथुआ आदि हरी सब्जियां
कारण: बारिश के मौसम में हवा में नमी होती है, जिससे पत्तों पर कीड़े-मकौड़े, फंगस और बैक्टीरिया बहुत तेजी से पनपते हैं। इसके अलावा, आयुर्वेद के अनुसार इस मौसम में शरीर में वात (गैस) बढ़ा हुआ होता है और पत्तेदार सब्जियां गैस बढ़ाती हैं।
६. भाद्रपद / भादों (अगस्त - सितंबर) — दही
क्या न खाएं: दही
कारण: यह उमस भरी गर्मी का समय होता है और शरीर में 'पित्त' जमा होने लगता है। आयुर्वेद में दही की तासीर गर्म बताई गई है। इसे खाने से पित्त भड़कता है, जिससे गले में खराश, बुखार, और त्वचा के रोग (मुंहासे आदि) होने का खतरा बढ़ जाता है।
७. आश्विन / क्वार (सितंबर - अक्टूबर) — करेला
क्या न खाएं: करेला
कारण: यह शरद ऋतु का समय है। इस मौसम में शरीर में पित्त अपने चरम पर होता है और शरीर को अंदर से रूखापन (Dryness) महसूस होता है। करेला रूक्ष (सूखा) होता है, जो वात बढ़ा सकता है। इस मौसम में शरीर को चिकने और हल्के भोजन की जरूरत होती है।
८. कार्तिक (अक्टूबर - नवंबर) — मही (छाछ/मट्ठा)
क्या न पिएं: छाछ या मट्ठा
कारण: इस महीने से सर्दियों की शुरुआत होने लगती है और मौसम में ठंडक आ जाती है। छाछ की तासीर बहुत ठंडी होती है। इसे पीने से शरीर में कफ बढ़ सकता है और सर्दी-जुकाम या जोड़ों में दर्द की समस्या हो सकती है।
९. मार्गशीर्ष / अगहन (नवंबर - दिसंबर) — जीरा
क्या न खाएं: जीरे का अत्यधिक सेवन
कारण: ठंड के मौसम में शरीर को गरिष्ठ (Heavy) और चिकनाई (घी, मक्खन) वाले भोजन की जरूरत होती है ताकि शरीर गर्म रहे। जीरे की तासीर वैसे तो पाचक है, लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल शरीर में रूखापन पैदा करता है।
१०. पौष (दिसंबर - जनवरी) — धना (धनिया)
क्या न खाएं: धनिया (विशेषकर हरा धनिया या इसके बीज का ज्यादा प्रयोग)
कारण: यह कड़ाके की ठंड का समय होता है। धनिये की तासीर अत्यधिक ठंडी होती है। सर्दियों में इसके अधिक सेवन से शरीर का तापमान गिर सकता है और कफ जनित रोग (खांसी-जुकाम, गले का संक्रमण) हो सकते हैं।
११. माघ (जनवरी - फरवरी) — मिश्री
क्या न खाएं: मिश्री
कारण: शीत ऋतु अपने अंत की ओर होती है। मिश्री की तासीर ठंडी होती है। इस समय शरीर में कफ जमा हो रहा होता है, ठंडी चीजें खाने से कफ और बढ़ता है जिससे सीने में जकड़न या बलगम की शिकायत हो सकती है।
१२. फाल्गुन (फरवरी - मार्च) — चना
क्या न खाएं: चना (खासकर कच्चा या सूखा चना)
कारण: यह वसंत ऋतु का समय है, जब सुबह-शाम ठंड और दिन में गर्मी होती है। चना पचने में काफी भारी होता है और शरीर में वात (गैस) बढ़ाता है। इस बदलते मौसम में इसे पचाना मुश्किल होता है।
निष्कर्ष: कहावत की अंतिम पंक्ति है— "जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहिं धरै।" यानी जो व्यक्ति अपनी जीभ पर नियंत्रण रखकर, मौसम के अनुसार इन 12 चीजों का त्याग करता है, वह प्राकृतिक रूप से इतना स्वस्थ रहता है कि उसके घर कभी किसी डॉक्टर या वैद्य को आने की जरूरत नहीं पड़ती।