Dr. Achary Kalki Krishnan

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Dr. Achary Kalki Krishnan Best Astrologer, Numerologist and Vastu Expert & Logo Shastra Consultant having 30 years of teaching & practicing experience in these sciences.

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30/08/2026
ज्योतिष और वास्तु के लिए पिछले दो दिनों से जिस देश में हूँ, वहाँ की सरकार की तरफ़ से सुरक्षा के लिए एक इंस्पेक्टर की एवं...
30/08/2026

ज्योतिष और वास्तु के लिए पिछले दो दिनों से जिस देश में हूँ, वहाँ की सरकार की तरफ़ से सुरक्षा के लिए एक इंस्पेक्टर की एवं सामान वगैरह लेकर साथ चलने के लिए एक सामान्य सिक्योरिटी गार्ड की ड्यूटी मेरे साथ में प्रोटोकॉल के तहत लगायी गई है।
आज रविवार है। इंस्पेक्टर साहब ने कल ही अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में पूछा था कि कल रविवार को मुझे सुबह चर्च जाना है तो अगर आपको आपत्ति न हो तो वहीं से मैं सीधे सिविल ड्रेस में ही आपके पास आ जाऊँ। मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी तो आज सिविल ड्रेस में इंस्पेक्टर साहब ने मेरे साथ अपनी फोटो खिंचवाई।
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देश से करीब पाँच हज़ार किलोमीटर दूर से रक्षा बंधन की सभी मित्रों और शुभचिंतकों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।ज्योतिष ए...
28/08/2026

देश से करीब पाँच हज़ार किलोमीटर दूर से रक्षा बंधन की सभी मित्रों और शुभचिंतकों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।
ज्योतिष एवं वास्तु सेवाओं को प्रदान करने हेतु अंतरराष्ट्रीय यात्रा में बीच में एक एयरपोर्ट पर लगभग 3 घंटे का लेओवर था, तो उसी के बिज़नेस लाउंज में नित्य कर्म से निवृत्त होकर श्रावणी उपाकर्म की प्रक्रियाएं प्रतीकात्मक रूप से संपन्न की।
विश्व के प्रथम रक्षा बंधन की अविरल परंपरा में धर्मपत्नी द्वारा रक्षा बंधन के पवित्र कर्म का परदेश में सम्पादन हुआ।

बिज़नेस लाउंज में प्रातराश में वैसे तो सैकड़ों विकल्प थे, लेकिन अपनी रुचि के अनुसार फलों का विस्तृत विकल्प पाकर अपनी जिह्वा एवं क्षुधा को उन्हीं पर केंद्रित किया।

CMA डॉ आचार्य कल्कि कृष्णन्AstroDevam.comAnita BaranwalAstro DevamAstroDevam Astro VastuAstroVastu AnitaDr. Achary Kalki KrishnanĀchary Kalki Krishnan@

17/08/2026

जब से सनातन धर्म में कर्म की उपेक्षा और केवल कर्मकांड की प्रधानता होने लगी है, तभी से उसके वास्तविक स्वरूप का पतन प्रारंभ हुआ-सा लगता है।

साथ लगा वीडियो उत्तर प्रदेश के एक तीर्थस्थल में स्थित नागकुंड का है। नागपंचमी के अवसर पर जिलाधिकारी महोदय द्वारा कुंड का तथाकथित अभिषेक किया जा रहा है और कई पंडित मंत्रोच्चार कर रहे हैं। लेकिन कुंड की स्थिति ऐसी है कि कोई भी सामान्य विवेक रखने वाला व्यक्ति उसमें उंगली तक डालना पसंद नहीं करेगा।

विडंबना यह है कि पूजा हो रही है, मंत्रोच्चार हो रहा है, अभिषेक हो रहा है—लेकिन जिस जल को पवित्र मानकर पूजा जा रही है, उसकी स्वच्छता की चिंता दिखाई नहीं देती।

2013 में मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रयागराज में संगम आए थे। संगम के जल की स्थिति देखकर उन्होंने उसमें स्नान तो दूर, जल को स्पर्श करने से भी मना कर दिया था।

इसके बाद एक संन्यासी मुख्यमंत्री बना और छह वर्ष बाद, 2019 के कुंभ में, उसी प्रयागराज में मॉरीशस के अगले प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल के साथ श्रद्धापूर्वक संगम में स्नान किया।

दृष्टि ऐसी होनी चाहिए, संकल्प ऐसा होना चाहिए और कर्म ऐसा होना चाहिए।

मुख्यमंत्री हर कुंड, हर तालाब और हर पोखरे की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं ले सकता। उसके लिए एक प्रशासनिक व्यवस्था बनी हुई है। लेकिन जिसे जिस व्यवस्था की जिम्मेदारी दी गई है, उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास तो होना ही चाहिए।

और आम जनता से तो क्या ही कहें!

कुछ ही महीनों में उत्तर भारत में दीपावली के छठे दिन छठ पर्व मनाया जाएगा। अनेक स्थानों पर मृतप्राय हो चुके तालाबों और नालों का रूप ले चुके छोटे-छोटे जलस्रोतों में लोग अपनी आस्था के कारण घंटों खड़े होकर पूजा करेंगे। फिर उन्हीं जलस्रोतों से होने वाले संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याओं के कारण डॉक्टरों के पास भीड़ लगेगी ।

लेकिन प्रश्न यह है कि जिस जल को हम अपनी आस्था का केंद्र मानते हैं, उसकी स्वच्छता की जिम्मेदारी कौन लेगा?

सनातन धर्म केवल मंत्र, पूजा, व्रत और कर्मकांड का नाम नहीं है।
सनातन धर्म का मूल है—शुद्ध दृष्टि, पवित्र संकल्प और उत्तरदायी कर्म।

यदि कर्म ही शुद्ध नहीं, व्यवस्था ही उत्तरदायी नहीं और हमारा पर्यावरण ही अपवित्र है, तो केवल कर्मकांड करके हम किस सनातन की रक्षा कर रहे हैं?

शिव के सान्निध्य में—एकान्त, ऊर्जा और अन्तश्चेतना का संवादसंलग्न चित्र तीन दिवस पूर्व, श्रावण शिवरात्रि की मध्यरात्रि का...
14/08/2026

शिव के सान्निध्य में—एकान्त, ऊर्जा और अन्तश्चेतना का संवाद

संलग्न चित्र तीन दिवस पूर्व, श्रावण शिवरात्रि की मध्यरात्रि का है।

दिन भर का कोलाहल समाप्त हो चुका था। वेदमन्त्रों का गम्भीर उद्घोष, रुद्राभिषेक की विधियाँ, पूजन-अर्चन की गतिविधियाँ—सब क्रमशः निस्तब्धता में विलीन हो चुकी थीं।

एक ऐसी नीरव, गहन और अद्भुत शान्ति व्याप्त थी, मानो स्वयं शिव भी समाधिस्थ विश्रान्ति में हों।
मैंने समस्त विद्युत-प्रकाश बन्द कर दिए थे। केवल एक दीपक प्रज्वलित था।

उस क्षण वहाँ न कोई अनुष्ठान था, न कोई जनसमूह, न मन्त्रों का घोष और न कर्मकाण्ड की बाह्य व्यस्तता।
केवल शिव थे—और मैं था।

यह शिवलिंग मेरे निज निवास में प्रतिष्ठित है। वास्तु के परंपरागत नियम शिवलिंग, खासकर इतने बड़े शिवलिंग की स्थापना गृहस्थ निवास में अनुमति नहीं देते हैं.। किन्तु लगभग चार दशकों तक वास्तु के सिद्धान्तों, उनके पारस्परिक सम्बन्धों, दिशाओं, आयामों, ऊर्जा-सन्तुलन तथा उनके सूक्ष्म व्यावहारिक प्रभावों का अध्ययन-अनुशीलन करने के उपरान्त मेरी समझ यह बनी कि किसी एक नियम को उसके व्यापक तन्त्र से पृथक करके देखना वास्तु की मूल आत्मा के साथ अन्याय ही है।
वास्तु केवल निषेधों की सूची नहीं, अपितु अनेक ऊर्जात्मक तत्त्वों के सामञ्जस्य का विज्ञान और दर्शन है।
उसी समग्र बोध और अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर इस शिवलिंग की प्रतिष्ठा यहाँ की गई।

वर्ष में न्यूनतम दो अवसरों—महाशिवरात्रि एवं श्रावण शिवरात्रि—पर विधि-विधानपूर्वक इसका रुद्राभिषेक सम्पन्न होता है। वेदमन्त्रों की ध्वनि, जल, दुग्ध, इक्षुरस, मधू, बिल्वपत्र, धूप, दीप और श्रद्धा के मध्य दिन भर अनुष्ठान चलता है।

किन्तु मेरे लिए वास्तविक यात्रा तब आरम्भ होती है, जब अनुष्ठान समाप्त हो जाता है।
जब मन्त्रों का स्वर बाह्य आकाश से लुप्त होकर अन्तःकरण में उतरने लगता है।
और जब केवल दीपशिखा के प्रकाश में मैं शिव के सम्मुख एकान्त में बैठता हूँ।

लगभग 188 वर्ष पूर्व किशोर मूलशंकर भी शिवरात्रि की एक रात्रि शिवलिंग के सम्मुख जागरण कर रहे थे। शिवलिंग के ऊपर मूषकों को निर्भयतापूर्वक विचरण करते देखकर उनके मन में तीव्र प्रश्न उत्पन्न हुआ। उसी प्रश्न ने आगे चलकर उनके चिन्तन की दिशा परिवर्तित की और एक दीर्घ आध्यात्मिक-बौद्धिक यात्रा के पश्चात् वही मूलशंकर महर्षि दयानन्द सरस्वती के रूप में प्रतिष्ठित हुए तथा वैदिक चिन्तन के पुनरुत्थान के महान् वाहक बने।

बाल्यकाल में मेरे घर के पुस्तकालय में महर्षि दयानन्द की कालजयी कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ उपलब्ध थी। मैंने उसका अनेक बार आद्योपान्त अध्ययन किया।
संस्कारों और अध्ययन ने सम्भवतः इतनी नीर-क्षीर-विवेक की क्षमता अवश्य प्रदान कर दी थी कि किसी मनीषी के प्रति श्रद्धा रखते हुए भी उनके प्रत्येक कथन से सहमत होना आवश्यक न लगे। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की अनेक स्थापनाओं ने मुझे चमत्कृत किया, अनेक से मैं सहमत हुआ, और कुछ विषयों पर मेरी अपनी जिज्ञासाएँ तथा असहमतियाँ भी बनी रहीं।

मेरे लिए यही भारतीय बौद्धिक परम्परा का सौन्दर्य है—
श्रद्धा विचार को निषिद्ध नहीं करती, और विचार श्रद्धा को नष्ट करना आवश्यक नहीं समझता।
आज भी अनेक बार रात्रि के एकान्त में शिवलिंग के आसपास मूषक, कीट अथवा अन्य क्षुद्र जीव स्वाभाविक रूप से विचरण करते दिखाई दे जाते हैं।

किन्तु उन्हें देखकर मेरे भीतर उच्चाटन उत्पन्न नहीं होता।
क्योंकि मेरी साधना और मेरे दीर्घ अध्ययन ने मुझे शिवलिंग को केवल प्रस्तर-प्रतिमा के रूप में देखने तक सीमित नहीं रहने दिया। और न ही मेरी धारणा यह है कि अनन्त ईश्वर किसी प्रस्तर-खण्ड के भीतर सीमित होकर विराजमान है।

मेरी अनुभूति में शिवलिंग अनन्त सत्ता, सृष्टि के मूल स्पन्दन और वैश्विक ऊर्जा के उस निराकार सिद्धान्त का बिम्ब है, जिसे भारतीय मनीषा ने प्रतीक के माध्यम से अनुभवगम्य बनाने का प्रयास किया।
प्रतीक स्वयं परम सत्य नहीं होता; किन्तु यदि साधक की चेतना तैयार हो, तो वही प्रतीक परम सत्य की दिशा में एक द्वार अवश्य बन सकता है।

यहीं से मेरे लिए पूजा का बाह्य पक्ष धीरे-धीरे अन्तःसाधना में रूपान्तरित होने लगता है।
दीपक की एक छोटी-सी ज्योति के सामने बैठकर जब दृष्टि अन्तर्मुखी होती है, तब बाहर का शिवलिंग जैसे भीतर उपस्थित किसी मौन केन्द्र की ओर संकेत करने लगता है। विचारों की अनेक परतें खुलती हैं। व्यक्तित्व में सञ्चित सकारात्मक और नकारात्मक संस्कार सामने आते हैं। इच्छाएँ, भय, अहंकार, उपलब्धियाँ, असफलताएँ—सब एक-एक करके अन्तःचेतना के दर्पण में प्रतिबिम्बित होने लगते हैं।
और तब कबीर का वचन सहज ही स्मरण हो आता है—
“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।”

जीवन का वास्तविक मन्थन सम्भवतः बाहर नहीं, भीतर की गहराइयों में ही प्रारम्भ होता है।

चार दशकों से अधिक समय वास्तु के अध्ययन-अनुभव में और जीवन का एक बड़ा अंश ज्योतिष, ग्रहों के प्रभाव, कालचक्र तथा सूक्ष्म ऊर्जात्मक सम्बन्धों के अनुसन्धान में समर्पित करने के पश्चात् मेरी दृष्टि में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है—अब किसी धार्मिक अनुष्ठान को केवल कर्मकाण्ड के रूप में देख पाना सम्भव नहीं रहा।
काल, स्थान, चेतना, प्रतीक और साधक—इन सबका एक रहस्यमय अन्तर्सम्बन्ध है।

शिवरात्रि की रात्रियाँ मेरे लिए इसी अन्तर्सम्बन्ध के अनुभव का विशिष्ट अवसर हैं।

कभी-कभी ध्यान की गहन अवस्था में एक अत्यन्त संक्षिप्त क्षण ऐसा भी आता है, जब ‘मैं’ और ‘वह’ के बीच का भेद जैसे क्षीण होने लगता है।

सामने प्रतिष्ठित शिवलिंग का अस्तित्व, उसकी अनुभूत ऊर्जा और अपने भीतर प्रवहमान चेतना—क्षणमात्र के लिए एक ही स्पन्दन में समाहित होते प्रतीत होते हैं।
उस एक क्षण में दिन भर का रुद्राभिषेक, वेदमन्त्रों का घोष, समस्त पूजा-विधान और बाह्य कर्मकाण्ड जैसे अपना अन्तिम अर्थ प्राप्त कर लेते हैं।

तब अनुभव होता है कि अनुष्ठान का चरम उद्देश्य केवल देवता के सम्मुख कुछ अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस अवस्था तक पहुँचना है जहाँ अर्पण करने वाला, अर्पण और आराध्य—तीनों के मध्य की सीमाएँ क्षीण होने लगें।

मेरे लिए शिवरात्रि की साधना का सार सम्भवतः यही है—
बाहर के शिव से प्रारम्भ होकर भीतर के शिव तक पहुँचना।
प्रतीक से तत्त्व की ओर।
कर्मकाण्ड से चेतना की ओर।
और अन्ततः—द्वैत से अद्वैत की ओर।
उस मध्यरात्रि में दीपशिखा स्थिर थी।
चारों ओर गहन निस्तब्धता थी।
शिव मौन थे।
और सम्भवतः उसी मौन में सबसे गहन संवाद घटित हो रहा था।
ॐ नमः शिवाय।
ॐ नमः शिवाय।
— डॉ आचार्य कल्कि कृष्णन

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14/08/2026

श्रावण शिवरात्रि के शुभ अवसर पर निज निवास ‘पूर्ण वास्तु’ में स्थापित शिवलिंग के रुद्राभिषेक का दिव्य कार्यक्रम वेदमंत्रों के उद्घोष के साथ स्वजनों एवं शुभ चिंतकों की शुभ उपस्थिति में संपन्न हुआ।
साम्बसदाशिव आपका सर्वतोभाव कल्याण करें।
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