14/08/2026
शिव के सान्निध्य में—एकान्त, ऊर्जा और अन्तश्चेतना का संवाद
संलग्न चित्र तीन दिवस पूर्व, श्रावण शिवरात्रि की मध्यरात्रि का है।
दिन भर का कोलाहल समाप्त हो चुका था। वेदमन्त्रों का गम्भीर उद्घोष, रुद्राभिषेक की विधियाँ, पूजन-अर्चन की गतिविधियाँ—सब क्रमशः निस्तब्धता में विलीन हो चुकी थीं।
एक ऐसी नीरव, गहन और अद्भुत शान्ति व्याप्त थी, मानो स्वयं शिव भी समाधिस्थ विश्रान्ति में हों।
मैंने समस्त विद्युत-प्रकाश बन्द कर दिए थे। केवल एक दीपक प्रज्वलित था।
उस क्षण वहाँ न कोई अनुष्ठान था, न कोई जनसमूह, न मन्त्रों का घोष और न कर्मकाण्ड की बाह्य व्यस्तता।
केवल शिव थे—और मैं था।
यह शिवलिंग मेरे निज निवास में प्रतिष्ठित है। वास्तु के परंपरागत नियम शिवलिंग, खासकर इतने बड़े शिवलिंग की स्थापना गृहस्थ निवास में अनुमति नहीं देते हैं.। किन्तु लगभग चार दशकों तक वास्तु के सिद्धान्तों, उनके पारस्परिक सम्बन्धों, दिशाओं, आयामों, ऊर्जा-सन्तुलन तथा उनके सूक्ष्म व्यावहारिक प्रभावों का अध्ययन-अनुशीलन करने के उपरान्त मेरी समझ यह बनी कि किसी एक नियम को उसके व्यापक तन्त्र से पृथक करके देखना वास्तु की मूल आत्मा के साथ अन्याय ही है।
वास्तु केवल निषेधों की सूची नहीं, अपितु अनेक ऊर्जात्मक तत्त्वों के सामञ्जस्य का विज्ञान और दर्शन है।
उसी समग्र बोध और अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर इस शिवलिंग की प्रतिष्ठा यहाँ की गई।
वर्ष में न्यूनतम दो अवसरों—महाशिवरात्रि एवं श्रावण शिवरात्रि—पर विधि-विधानपूर्वक इसका रुद्राभिषेक सम्पन्न होता है। वेदमन्त्रों की ध्वनि, जल, दुग्ध, इक्षुरस, मधू, बिल्वपत्र, धूप, दीप और श्रद्धा के मध्य दिन भर अनुष्ठान चलता है।
किन्तु मेरे लिए वास्तविक यात्रा तब आरम्भ होती है, जब अनुष्ठान समाप्त हो जाता है।
जब मन्त्रों का स्वर बाह्य आकाश से लुप्त होकर अन्तःकरण में उतरने लगता है।
और जब केवल दीपशिखा के प्रकाश में मैं शिव के सम्मुख एकान्त में बैठता हूँ।
लगभग 188 वर्ष पूर्व किशोर मूलशंकर भी शिवरात्रि की एक रात्रि शिवलिंग के सम्मुख जागरण कर रहे थे। शिवलिंग के ऊपर मूषकों को निर्भयतापूर्वक विचरण करते देखकर उनके मन में तीव्र प्रश्न उत्पन्न हुआ। उसी प्रश्न ने आगे चलकर उनके चिन्तन की दिशा परिवर्तित की और एक दीर्घ आध्यात्मिक-बौद्धिक यात्रा के पश्चात् वही मूलशंकर महर्षि दयानन्द सरस्वती के रूप में प्रतिष्ठित हुए तथा वैदिक चिन्तन के पुनरुत्थान के महान् वाहक बने।
बाल्यकाल में मेरे घर के पुस्तकालय में महर्षि दयानन्द की कालजयी कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ उपलब्ध थी। मैंने उसका अनेक बार आद्योपान्त अध्ययन किया।
संस्कारों और अध्ययन ने सम्भवतः इतनी नीर-क्षीर-विवेक की क्षमता अवश्य प्रदान कर दी थी कि किसी मनीषी के प्रति श्रद्धा रखते हुए भी उनके प्रत्येक कथन से सहमत होना आवश्यक न लगे। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की अनेक स्थापनाओं ने मुझे चमत्कृत किया, अनेक से मैं सहमत हुआ, और कुछ विषयों पर मेरी अपनी जिज्ञासाएँ तथा असहमतियाँ भी बनी रहीं।
मेरे लिए यही भारतीय बौद्धिक परम्परा का सौन्दर्य है—
श्रद्धा विचार को निषिद्ध नहीं करती, और विचार श्रद्धा को नष्ट करना आवश्यक नहीं समझता।
आज भी अनेक बार रात्रि के एकान्त में शिवलिंग के आसपास मूषक, कीट अथवा अन्य क्षुद्र जीव स्वाभाविक रूप से विचरण करते दिखाई दे जाते हैं।
किन्तु उन्हें देखकर मेरे भीतर उच्चाटन उत्पन्न नहीं होता।
क्योंकि मेरी साधना और मेरे दीर्घ अध्ययन ने मुझे शिवलिंग को केवल प्रस्तर-प्रतिमा के रूप में देखने तक सीमित नहीं रहने दिया। और न ही मेरी धारणा यह है कि अनन्त ईश्वर किसी प्रस्तर-खण्ड के भीतर सीमित होकर विराजमान है।
मेरी अनुभूति में शिवलिंग अनन्त सत्ता, सृष्टि के मूल स्पन्दन और वैश्विक ऊर्जा के उस निराकार सिद्धान्त का बिम्ब है, जिसे भारतीय मनीषा ने प्रतीक के माध्यम से अनुभवगम्य बनाने का प्रयास किया।
प्रतीक स्वयं परम सत्य नहीं होता; किन्तु यदि साधक की चेतना तैयार हो, तो वही प्रतीक परम सत्य की दिशा में एक द्वार अवश्य बन सकता है।
यहीं से मेरे लिए पूजा का बाह्य पक्ष धीरे-धीरे अन्तःसाधना में रूपान्तरित होने लगता है।
दीपक की एक छोटी-सी ज्योति के सामने बैठकर जब दृष्टि अन्तर्मुखी होती है, तब बाहर का शिवलिंग जैसे भीतर उपस्थित किसी मौन केन्द्र की ओर संकेत करने लगता है। विचारों की अनेक परतें खुलती हैं। व्यक्तित्व में सञ्चित सकारात्मक और नकारात्मक संस्कार सामने आते हैं। इच्छाएँ, भय, अहंकार, उपलब्धियाँ, असफलताएँ—सब एक-एक करके अन्तःचेतना के दर्पण में प्रतिबिम्बित होने लगते हैं।
और तब कबीर का वचन सहज ही स्मरण हो आता है—
“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।”
जीवन का वास्तविक मन्थन सम्भवतः बाहर नहीं, भीतर की गहराइयों में ही प्रारम्भ होता है।
चार दशकों से अधिक समय वास्तु के अध्ययन-अनुभव में और जीवन का एक बड़ा अंश ज्योतिष, ग्रहों के प्रभाव, कालचक्र तथा सूक्ष्म ऊर्जात्मक सम्बन्धों के अनुसन्धान में समर्पित करने के पश्चात् मेरी दृष्टि में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है—अब किसी धार्मिक अनुष्ठान को केवल कर्मकाण्ड के रूप में देख पाना सम्भव नहीं रहा।
काल, स्थान, चेतना, प्रतीक और साधक—इन सबका एक रहस्यमय अन्तर्सम्बन्ध है।
शिवरात्रि की रात्रियाँ मेरे लिए इसी अन्तर्सम्बन्ध के अनुभव का विशिष्ट अवसर हैं।
कभी-कभी ध्यान की गहन अवस्था में एक अत्यन्त संक्षिप्त क्षण ऐसा भी आता है, जब ‘मैं’ और ‘वह’ के बीच का भेद जैसे क्षीण होने लगता है।
सामने प्रतिष्ठित शिवलिंग का अस्तित्व, उसकी अनुभूत ऊर्जा और अपने भीतर प्रवहमान चेतना—क्षणमात्र के लिए एक ही स्पन्दन में समाहित होते प्रतीत होते हैं।
उस एक क्षण में दिन भर का रुद्राभिषेक, वेदमन्त्रों का घोष, समस्त पूजा-विधान और बाह्य कर्मकाण्ड जैसे अपना अन्तिम अर्थ प्राप्त कर लेते हैं।
तब अनुभव होता है कि अनुष्ठान का चरम उद्देश्य केवल देवता के सम्मुख कुछ अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस अवस्था तक पहुँचना है जहाँ अर्पण करने वाला, अर्पण और आराध्य—तीनों के मध्य की सीमाएँ क्षीण होने लगें।
मेरे लिए शिवरात्रि की साधना का सार सम्भवतः यही है—
बाहर के शिव से प्रारम्भ होकर भीतर के शिव तक पहुँचना।
प्रतीक से तत्त्व की ओर।
कर्मकाण्ड से चेतना की ओर।
और अन्ततः—द्वैत से अद्वैत की ओर।
उस मध्यरात्रि में दीपशिखा स्थिर थी।
चारों ओर गहन निस्तब्धता थी।
शिव मौन थे।
और सम्भवतः उसी मौन में सबसे गहन संवाद घटित हो रहा था।
ॐ नमः शिवाय।
ॐ नमः शिवाय।
— डॉ आचार्य कल्कि कृष्णन
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