Jyotish MARG

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16/05/2018

कृष्ण ओर काली स्वरूप बहुत ही दुर्लभ हैं इनका एक साथ स्मरण करने से कठिन समस्याओ का भी समाधान हो जाता हैं ।
जीवन मे विवाह की समस्या ,या पारिवारिक समस्या ,या पति पत्नी मे अनबन ,या घेरुलु जीवन मे अर्थ समस्या , प्रेम संबंधी समस्या , रोग संबंधी समस्या , साथ ही तंत्र ओर बाधाओ से मुक्ति होती हैं ।

ॐ क्लीं काली कृष्णाय क्रीं नमः

काली महाकाली कालिके परमेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलता कण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

हमारे सर्वेष्ठ पवित्र गर्न्थो में से एक है देवी पुराण, यह परम् पवित्र पुराण अपने अंदर अखिल शास्त्रो के रहस्यो के समेटे हुए, आगमो में अपना पवित्र स्थान रखता है. इस पुराण में 18000 श्लोक है. इस पवित्र ग्रन्थ के रचियता महृषि वेदव्यास जी है.

1 . देवी पुराण में यह उल्लेखित है की श्री कृष्ण भगवान विष्णु के नहीं बल्कि माँ काली के अवतार है. तथा यही नहीं भगवान श्री कृष्ण की प्रेमिका देवी लक्ष्मी नहीं बल्कि भगवान शिव की अवतार बताई गई है.
देवी पुराण में यह वर्णित है की भगवान शिव ने इस धरती में फैलते पाप का विनाश करने के लिए द्वापर युग के अंत में माँ काली को आदेश दिया था की वे मायापुरुष के रूप में देवकी के गर्भ से अवतरित हो व पापियो का नाश करे.
2 . देवी पुराण में यह भी वर्णित है की स्वयं महादेव शिव वृषभानु की पुत्री रूप में जन्मे थे तथा उनका नाम राधा था व भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख पटरानियाँ भी महादेव शिव की ही अंश थी.
देवी पार्वती की जया विजया नामक दो सखिया श्री दाम एवम वासुदाम नामक गोप के रूप में अवतरित हुए थे.
3 . देवी पुराण के अनुसार बलराम भगवान विष्णु के अवतार थे, तथा जब पांडव अपने वनवास में भटक रहे थे तो वे कामख्या पीठ पहुचे थे वहां पांडवो ने देवी की तपस्या करी थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुई तथा उन्होंने पांडवो को वरदान दिया था की वे श्री कृष्ण के रूप में उनकी सहायता करेंगी तथा कोरवो का नाश करेंगी.
4 . जब महाभारत युद्ध समाप्त हुआ तो माँ काली के रूप में अवतरित भगवान श्री कृष्ण ने वापस अपने धाम में जाने की इच्छा जताई. इसके लिए स्वयं नन्दी महाराज देवी माँ काली को वापस लेने के लिए रत्नजड़ित रथ जिसे सिंह घसीट रह था धरती में लेकर आये .
5 . भगवान श्री कृष्ण रूपी देवी काली जब अपने धाम कैलाश पर्वत को वापस लौटने के लिए रत्नजड़ित उस रथ पर बैठी तो उनके साथ उनकी आठ पटरानियां भी भगवान शिव में मिलकर कैलाश धाम को देवी काली के साथ वापस लोट चली....
Astro Nirudra Sharma (Avdhut Soul)
+918107155614

17/04/2016
05/08/2013

पीपल का पत्ता बना सकता है आपको मालामाल, जानिए कैसे
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‘नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥” कहते हैं कि यदि कोई विपत्ति आती है तो अंजनिपुत्र हनुमान का नाम लेने मात्र से ही समस्त दुःख मिट जाते हैं क्योंकि हनुमान जी कलियुग में बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवी देवताओं में से एक हैं|

जीवन में जब भी कोई अत्यधिक मुश्किल प्रतीत हो रहा हो या लाख कोशिशों के बाद भी वह पूर्ण नहीं हो पा रहा हो या बार-बार बाधाएं उत्पन्न हो रही हों तब हनुमानजी को प्रसन्न कर उन रुकावटों को दूर किया जा सकता है।

यदि आप पैसे की तंगी को लेकर परेशान है तो अब आपको परेशान होने की जरुरत नहीं है बस श्रद्धा और विश्वास के साथ नीचे दिए गए उपाय को हर मंगलवार और शनिवार को करें निश्चित ही आपकी समस्या धीरे-धीरे समाप्त हो जायेंगी|
https://www.facebook.com/pages/Astrologer-Hemlata/132762013556759
उपाय-
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हर मंगलवार व शनिवार को सुबह उठे उसके बाद नित्यक्रम के बाद स्नानादि कर लें तत्पश्चात किसी पीपल के पेड़ से 11 पत्ते तोड़ लें| पत्ते तोड़ते समय यह ध्यान रहे कि पत्ते कहीं से टूटे या फटे नहीं होने चाहिए क्योंकि फटे पत्ते खंडित माने जाते हैं| अब इन पत्तों को साफ़ पानी से धों लें उसके बाद इन पत्तों पर कुमकुम या चन्दन से श्रीराम का नाम लिखें| उसके बाद इन पप्तों की एक माला बनाये| अब इस माला को पास के किसी हनुमान मंदिर में जाकर उनको पहना दें| ध्यान रहे ऐसा करने के बाद कोई भी अधार्मिक कार्य न करें वर्ना यह टोटका निष्फल भी जा सकता है
व्यापार में वृद्धि के लिये एक और टोटका है।
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एक पीपल का पत्ता शनिवार को तोड़ कर घर ले आयें। उसे गंगा जल से अच्छी तरह धो लें। इसको 21 बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर इसे अपने कैश बाक्स में रखें। ऐसा हर शनिवार को करें। नया पत्ता रखने पर पुराना पत्ता वहां से हटा लें। इस जल में बहा दें या पीपल पर चढ़ा दें।

10/06/2013

पुस्तक की अंतर्वस्तु

अध्याय नाम

1.प्रथम अध्याय
विवाह के सन्दर्भ में साहित्यिक साक्ष्य
क- ज्योतिष की पुरातनता और विवाह के संदर्भ
ख- वैदिक संस्कृति में विवाह की जड़ें

2.द्वितीय अध्याय
तुला राशि की सप्तम भाव के रूप में भूमिका
क- तुला राशि की व्याख्या
ख- तुला --प्राकृतिक सप्तम स्थान एवं विवाह

3.तृतीय अध्याय
शुक्र ग्रह के सन्दर्भ में (चतुर्मुखी दृष्टिकोण)
क- शुक्र ग्रह का ज्ञान
ख- शुक्र ग्रह- अभिप्राय, और अन्य ग्रहों से संग व दृष्टि सम्बन्ध
ग- 12 राशियों में शुक्र की नियुक्ति व तात्पर्य
(ग्रंथों के साक्ष्य एवं मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण)
घ- 12 भावों में शुक्र की नियुक्ति व तात्पर्य
(ग्रंथों के साक्ष्य एवं मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण)

4.चतुर्थ अध्याय
सप्तम भाव (काम त्रिकोण का महत्वपूर्ण भाव)
क- सप्तम भाव- केन्द्र स्थान
ख- सप्तम भावेश का बलाबल एवं दोहरा राशि अधिपत्य
ग- सप्तम भाव- कारकत्व

5. पंचम अध्याय
सप्तम भाव - एक व्यापक दृष्टिकोण
निम्न अवधारणाओ से-
क- शिव और शक्ति
ख- बीज व क्षेत्र
ग- पुरूष व प्रकृति

6. छठा अध्याय
एनिमा एवं एनिमस की अवधारणा का विवरण-
सप्तम भाव एवं छाया सिद्धान्त-सी. जी. युंग द्वारा प्रदत्तछाया केसिद्धांत का
अर्धनारीश्वर मत की वैदिक अवधारणा से परस्पर सम्बन्ध

7. सप्तम अध्याय
सप्तम भाव एवं विवाह- जैमिनी पद्धति के सन्दर्भ से
क- लग्न पद/सप्तम भाव, दारा पद/सप्तम भाव, उपपद/सप्तम भाव
ख- दारा कारक
ग- कारकांश एवं विवाह
घ- ग्रहों के पद

8. अष्टम अध्याय
उच्च एवं नीच स्थान- तुला राशि- एक स्पष्टीकरण
क- सूर्य की तुला राशि में नीच स्थिति,
ख- शनि की तुला राशि में उच्च स्थिति
ग- सूर्य एवं शनि -अन्तर्निहित सांझेदारी

9. नवम अध्याय
महत्वपूर्ण ग्रन्थों एवं पुस्तकों का संदर्भ- मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण
क- महत्वपूर्ण ग्रन्थों एवं पुस्तकों का संदर्भ
ख- सप्तमेश की 12 भावों में नियुक्ति
ग- आधुनिक लेखन कार्यों के सन्दर्भ से व्याख्या

10. दशम अध्याय
सप्तम भाव और उसमें स्थित व संबन्धित ग्रहों की भूमिका-
मेरा व्यक्तिगत मत व विश्लेषण- त्रिमुखी दृष्टिकोण
क- सप्तम भावस्थ ग्रहों का फलित-
ख- सप्तम/सप्तमेश के साथ अन्य ग्रहों का बहुकोणीय संबन्ध
व जातक पर प्रभाव
ग- सप्तम भाव पर वक्री ग्रहों के प्रभाव का फलित

11. एकादश अध्याय
विवाह के सन्दर्भ में नवांश कुण्डली की भूमिका एवं ज्ञान-

12. द्वादश अध्याय
स्वयं में निहित यिन व यांग बलों में संतुलन-एक विश्लेषण
(व्यक्तिगत कुण्डली में ग्रहों के परस्पर अक्ष स्थापन के माध्यम से)
क- कुण्डली में लग्न- चन्द्र की राशि अनुसार परस्पर स्थिति
ख- कुण्डली में सूर्य- चन्द्र की राशि अनुसार परस्पर स्थिति
ग- कुण्डली में मंगल- शुक्र की राशि अनुसार परस्पर स्थिति
घ- कुण्डली में लग्नेश - सप्तमेश की राशि अनुसार परस्पर स्थिति
ड- कुण्डली में चन्द्र लग्न से लग्नेश-सप्तमेश की राशि अनुसार परस्पर स्थिति

13.तेरहवां अध्याय
विवाह संबन्धो में जातक की क्षमता व सामर्थ्य निर्धारण- जन्म कुण्डली
के परिपेक्ष्य से
क- प्रमुख तत्वों का परीक्षण
ख- प्रमुख गुणवत्ता का परीक्षण
ग- पुरूष राशि/स्त्री राशि में स्थित ग्रहों द्वारा स्वभाव निर्धारण
घ-चन्द्र एवं शुक्र द्वारा भावनात्मक चित्रण

14.चौदहवां अध्याय
विवाह- ज्योतिष द्वारा समय निर्धारण
क- शीघ्र/ उपयुक्त आयु में विवाह समय निर्धारण
ख- विवाह में विलम्ब/विच्छेद/वैराग्य के योग
ग- विवाह समय निर्धारण

15.पंद्रहवां अध्याय
वैवाहिक भविष्य में सुधार की संभावनाओं हेतु उपचारात्मक उपाय
क- सकारात्मक/शुभ परिणाम में वृद्धि की चेष्टा
ख- नकारात्मक/अशुभ परिणाम में न्यूनता की चेष्टा

लेखिका- परिचय  अपर्णा शर्मा मूल रूप से पंजाब (भारत) से संबन्ध रखती हैं। व्यक्तिगत स्तर पर वह ज्योतिष के क्षेत्र में  लगभ...
10/06/2013

लेखिका- परिचय
अपर्णा शर्मा मूल रूप से पंजाब (भारत) से संबन्ध रखती हैं। व्यक्तिगत स्तर पर वह ज्योतिष के क्षेत्र में
लगभग 15 वर्षों से कार्यरत हैं। अब वह पुस्तक लेखन द्वारा, ज्योतिष पत्रिकाओं के लिए लेखन कार्य एवं ज्योतिषीय संगोष्ठियों में भाग लेकर ज्योतिष के क्षेत्र में व्यवसायिक रूप से अपना योगदान दे रही हैं। अपर्णा का विभिन्न विषयों जैसे कला व संस्कृति, हिन्दू धर्म व दर्शन आदि में अनुभव है। उन्होने मेडिकल लाईन में स्नातक (B.Sc.) के पश्चात कला व संस्कृति में गहरी रूचिवश, इन विषयों को समझने की चेष्टा में स्नातकोत्तर उत्तीर्ण किया। M.A. लोक कला व संस्कृति एवं M.A.प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्वद्ध विषयों को सर्वोच्च श्रेणी में उत्तीर्ण करने पर उन्हे पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला एवं पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ द्वारा पदक प्रदान करके सम्मानित किया गया।
बचपन से अपर्णा की असाधारण व आध्यात्मिक विषयों में गहन रूचि होने के कारण जीवन के प्रारंभिक चरण में ही उन्होने इतिहास, कला व संस्कृति, ज्योतिष, भारतीय धर्म व दर्शन इत्यादि क्षेत्रों में अननुशीलन एवं शोध कार्य का दृढ निश्चय कर लिया था। ज्योतिष के क्षेत्र में उन्होने ज्योतिष प्रवीण, ज्योतिष विशारद एवं हस्त रेखा शास्त्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया एवं उन्हें INDIAN COUNCIL OF ASTROLOGICAL SCIENCES (REGD.) द्वारा प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया। विभिन्न संगठनों द्वारा उन्हें ज्योतिष सुश्री, ज्योतिष रत्न, ज्योतिष ऋषि जैसे विशेषणों से एवं प्रमाण पत्र प्रदान करके सम्मानित किया गया।
अपर्णा शर्मा विभिन्न ज्योतिषीय संघों के साथ संलग्न होकर कार्यरत हैं एवं उन संगठनों की आजीवन सदस्या भी हैं। वह संगठन हैं- AMERICAN COUNCIL OF VEDIC ASTROLOGY, INDIAN COUNCIL OF ASTROLOGICAL SCIENCES CHENNAI,INDO GLOBAL ASTROLOGERS ASSOCIATION CHANDIGARH, ALL INDIA FEDERATION OF ASTROLOGICAL RESEARCH (U.S.A.) , ALL INDIA FEDERATION OF ASTROLOGICAL STUDIES ,NEW DELHI(AIFAS) .
अपर्णा अब विभिन्न ज्योतिष पत्रिकाओं में लेखन कार्य करने एवं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों व पहलूओं को ज्योतिषीय दृष्टिकोण द्वारा समझने की चेष्टा कर रही हैं। मुख्यतः वैवाहिक प्रकरणों पर अध्ययन व शोध कार्य के फलस्वरूप अपर्णा शर्मा पुस्तक लेखन में कार्यरत हैं व ज्योतिष के अन्य विषयों पर भी
अनुसंधानरत हैं जैसे- वर्षफल की जन्म कुण्डली से संगतता, जैमिनी ज्योतिष के विभिन्न पहलूओं का पाराशरी पद्धति के मापदण्डों से संबन्ध का परीक्षण एवं जातक की कुण्डली में रोग व स्वास्थ्य संबन्धी दोषों का परीक्षण इत्यादि। अपर्णा शर्मा कला व संस्कृति के गहन अध्ययन पश्चात, उत्तर भारत के लोक
जीवन व संस्कृति एवं पंजाब की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पहलूओं को भी अपने लेखन कार्य द्वारा परिलक्षित करने के लिए योजनाबद्ध हैं। उनके अध्ययन के विशेष विषय हैं, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ में भारत के विभिन्न पहलू एवं प्राचीन वैदिक साहित्य आदि। अपर्णा शर्मा प्राचीन भारतीय वास्तुकला , स्तूप, गुफाओं एवं मन्दिरों की वास्तुकला पर भी लेखन कार्य के लिए तत्पर हैं। वह प्रत्येक धार्मिक संस्कार के लिए मुहूर्त विचार की विषयवस्तु पर एवं धार्मिक अनुष्ठानों का बेहतर मूल्यांकन करके आधुनिक समाज को एक दिशा देने में एवं पुरातन मान्यताओं की आधुनिक सन्दर्भ में उपयोगिता को प्रमाणिकता देने की दिशा में भी अग्रसर हैं। अपर्णा शर्मा सदैव पाठकों की प्रतिक्रिया, प्रश्न एवं सुझाव के प्रति उत्तरदायी रहेंगी।
लेखिका के संपर्क सूत्र
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[email protected]
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25/05/2013

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