Dr. Pankaj Kumar Chaudhary

Dr. Pankaj Kumar Chaudhary Dr. Pankaj Kumar Chaudhary, Senior Gynecologist & Obstetrician in Patna. Expert in IVF, infertility, laparoscopic surgery & high-risk pregnancy care.
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Dedicated to women’s health with 13+ years of trusted care at Devi Care Hospital.

गर्भावस्था में क्या खाना चाहिए?स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु के लिए संपूर्ण पोषण मार्गदर्शिका :गर्भावस्था केवल एक महिला के ज...
26/07/2026

गर्भावस्था में क्या खाना चाहिए?
स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु के लिए संपूर्ण पोषण मार्गदर्शिका :

गर्भावस्था केवल एक महिला के जीवन का नया अध्याय नहीं होती, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत भी होती है। इन नौ महीनों के दौरान माँ जो कुछ भी खाती है, उसका सीधा प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर पड़ता है। इसलिए यह सवाल लगभग हर परिवार में पूछा जाता है—गर्भावस्था में क्या खाना चाहिए?

इसका उत्तर केवल अधिक भोजन करना नहीं है, बल्कि संतुलित, पौष्टिक और सुरक्षित भोजन का चुनाव करना है। सही खान-पान माँ को स्वस्थ रखने के साथ-साथ शिशु के मस्तिष्क, हड्डियों, हृदय, रक्त, रोग प्रतिरोधक क्षमता और संपूर्ण शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

गर्भावस्था में संतुलित आहार क्यों आवश्यक है?

गर्भावस्था के दौरान शरीर को सामान्य दिनों की तुलना में अधिक ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और खनिजों की आवश्यकता होती है। यदि भोजन संतुलित न हो, तो माँ में एनीमिया, कमजोरी, बार-बार चक्कर आना, उच्च रक्तचाप, समय से पहले प्रसव तथा प्रसव के दौरान जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। वहीं शिशु का वजन कम रहना, विकास प्रभावित होना और जन्म के बाद स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी हो सकती हैं।

प्रोटीन है बच्चे के विकास की मजबूत नींव

गर्भावस्था में प्रोटीन सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में से एक है। यह शिशु की मांसपेशियों, मस्तिष्क, त्वचा और अन्य अंगों के निर्माण में मदद करता है। दालें, पनीर, दूध, दही, सोयाबीन, चना, राजमा, अंडा, मछली और अच्छी तरह पका हुआ चिकन प्रोटीन के उत्कृष्ट स्रोत हैं। यदि भोजन में पर्याप्त प्रोटीन नहीं होगा, तो बच्चे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

आयरन की कमी से बचना है बेहद जरूरी

गर्भावस्था में शरीर को अधिक मात्रा में रक्त बनाने की आवश्यकता होती है। यदि आयरन की कमी हो जाए, तो एनीमिया, अत्यधिक थकान, चक्कर, कमजोरी और समयपूर्व प्रसव का खतरा बढ़ सकता है। पालक, मेथी, सरसों का साग, चुकंदर, चना, मसूर, गुड़, किशमिश और अनार आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ हैं। इनके साथ संतरा, मौसमी, अमरूद या नींबू जैसे विटामिन C युक्त फल लेने से आयरन का अवशोषण बेहतर होता है।

कैल्शियम और विटामिन D क्यों जरूरी हैं?

बच्चे की मजबूत हड्डियों और दाँतों के विकास के लिए कैल्शियम अत्यंत आवश्यक है। यदि माँ के भोजन में पर्याप्त कैल्शियम नहीं होगा, तो उसका प्रभाव माँ की हड्डियों पर भी पड़ सकता है। दूध, दही, पनीर, तिल, रागी, बादाम और हरी पत्तेदार सब्जियाँ कैल्शियम के अच्छे स्रोत हैं। वहीं विटामिन D कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है, जिसके लिए सुबह की हल्की धूप और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए सप्लीमेंट लाभदायक होते हैं।

फोलिक एसिड बच्चे के मस्तिष्क के लिए आवश्यक

गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में फोलिक एसिड की पर्याप्त मात्रा शिशु के मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के सामान्य विकास के लिए अत्यंत आवश्यक होती है। हरी पत्तेदार सब्जियाँ, ब्रोकली, संतरा, मूंग, मसूर और बीन्स इसके अच्छे स्रोत हैं। अधिकांश मामलों में डॉक्टर गर्भधारण की योजना बनाते समय ही फोलिक एसिड की दवा शुरू करने की सलाह देते हैं।

स्वस्थ वसा और विटामिन भी हैं जरूरी

शिशु के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के विकास के लिए स्वस्थ वसा की आवश्यकता होती है। अखरोट, बादाम, अलसी, मूंगफली, कद्दू के बीज और सीमित मात्रा में घी अच्छे विकल्प हैं। साथ ही रंग-बिरंगे फल और सब्जियाँ विटामिन A, C, E, K, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करती हैं, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और कब्ज जैसी समस्याओं से भी राहत मिलती है।

पर्याप्त पानी पीना न भूलें

गर्भावस्था में पानी की कमी कई समस्याओं का कारण बन सकती है। पर्याप्त पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है, कब्ज कम होती है, यूरिन संक्रमण का खतरा घटता है और बच्चे तक पोषक तत्वों का संचार बेहतर होता है। प्रतिदिन लगभग 8–10 गिलास पानी पीना चाहिए। नारियल पानी, छाछ और नींबू पानी भी अच्छे विकल्प हैं।

किन चीज़ों से बचना चाहिए?

गर्भावस्था के दौरान अधपका या कच्चा मांस, बिना पाश्चुरीकृत दूध, कच्चे अंडे, अत्यधिक जंक फूड, बहुत अधिक तला-भुना भोजन, अधिक मीठे पेय, धूम्रपान और शराब से पूरी तरह बचना चाहिए। बिना डॉक्टर की सलाह कोई भी दवा या सप्लीमेंट लेना भी सुरक्षित नहीं माना जाता। ऐसे खाद्य पदार्थ संक्रमण, पाचन संबंधी समस्याओं और गर्भावस्था की जटिलताओं का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

क्या गर्भवती महिला को दो लोगों जितना खाना चाहिए?

यह एक आम गलतफहमी है। गर्भावस्था में ज्यादा खाना नहीं, बल्कि सही खाना जरूरी होता है। दिनभर में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में संतुलित भोजन करना अधिक लाभदायक होता है। इससे गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याएँ भी कम होती हैं।

डॉक्टर की सलाह क्यों जरूरी है?

हर गर्भावस्था अलग होती है। यदि किसी महिला को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, एनीमिया या जुड़वाँ गर्भ जैसी स्थिति है, तो उसके भोजन की आवश्यकता भी अलग हो सकती है। इसलिए इंटरनेट या दूसरों की सलाह पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही डाइट प्लान अपनाना चाहिए।

निष्कर्ष

गर्भावस्था के दौरान लिया गया संतुलित और पौष्टिक आहार केवल माँ को स्वस्थ नहीं रखता, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास की मजबूत नींव भी रखता है। प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, फोलिक एसिड, विटामिन, स्वस्थ वसा और पर्याप्त पानी से भरपूर भोजन एक सुरक्षित और स्वस्थ गर्भावस्था की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

याद रखें, स्वस्थ भोजन केवल आज की जरूरत नहीं, बल्कि आपके बच्चे के उज्ज्वल भविष्य में किया गया पहला और सबसे महत्वपूर्ण निवेश है। सही खान-पान, नियमित प्रसवपूर्व जांच और विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह के साथ मातृत्व का यह सफर अधिक सुरक्षित, सुखद और यादगार बनाया जा सकता है।

👨‍⚕️ डॉ. पंकज चौधरी

MBBS | MS (Obstetrics & Gynaecology)
IVF Specialist | Laparoscopic Surgeon

🏥 Devi Care Hospital, Patna

📍 IAS Colony, Near Alankar Maruti, Bailey Road, Patna – 801503

📞 Appointment: 6207249942 | 8271879322

🕒 प्रत्येक मंगलवार निःशुल्क ओपीडी | 24×7 Mother & Child Care Services

🌍 विश्व IVF दिवस | आशा से विश्वास तक... ❤️हर दंपत्ति का सपना होता है कि उनके आँगन में भी नन्ही किलकारियाँ गूँजें। लेकिन ...
25/07/2026

🌍 विश्व IVF दिवस | आशा से विश्वास तक... ❤️

हर दंपत्ति का सपना होता है कि उनके आँगन में भी नन्ही किलकारियाँ गूँजें। लेकिन कई बार प्राकृतिक रूप से गर्भधारण न हो पाने के कारण यह सपना अधूरा रह जाता है। अच्छी बात यह है कि आज आधुनिक चिकित्सा ने लाखों परिवारों की जिंदगी में खुशियाँ लौटाई हैं।

IVF (In Vitro Fertilization) केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि उन दंपत्तियों के लिए उम्मीद की नई किरण है जो लंबे समय से संतान सुख का इंतज़ार कर रहे हैं।

विश्व IVF दिवस के अवसर पर आइए यह समझें कि बांझपन कोई शर्म या कमजोरी नहीं, बल्कि एक चिकित्सीय स्थिति है, जिसका सही समय पर विशेषज्ञ से परामर्श लेकर सफल उपचार संभव है।

Devi Care Hospital, Patna में डॉ. पंकज चौधरी और उनकी अनुभवी टीम आधुनिक IVF तकनीक, वैज्ञानिक उपचार और व्यक्तिगत देखभाल के साथ हर मरीज को उसकी आवश्यकता के अनुसार सर्वोत्तम सलाह और उपचार प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

यदि आप एक वर्ष या उससे अधिक समय से गर्भधारण का प्रयास कर रहे हैं (या 35 वर्ष से अधिक आयु होने पर 6 महीने से), तो बिना देर किए विशेषज्ञ से परामर्श लें। सही समय पर सही मार्गदर्शन आपके मातृत्व और पितृत्व के सपने को साकार कर सकता है।

💗 आशा से विश्वास तक...
मातृत्व के सपने को मिल सकता है एक नया अवसर।

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🚨 क्या आपके परिवार की कोई महिला गंभीर (Critical) गायनी समस्या से जूझ रही हैं?ऐसी परिस्थितियों में हर मिनट और हर निर्णय ब...
24/07/2026

🚨 क्या आपके परिवार की कोई महिला गंभीर (Critical) गायनी समस्या से जूझ रही हैं?

ऐसी परिस्थितियों में हर मिनट और हर निर्णय बेहद महत्वपूर्ण होता है। कई बार मरीज पहले किसी अन्य डॉक्टर या हॉस्पिटल में इलाज शुरू कर चुका होता है, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं होता या ऑपरेशन जैसे बड़े निर्णय लेने की सलाह दी जाती है। ऐसे समय में एक अनुभवी विशेषज्ञ की Second Opinion कई बार सही दिशा और बेहतर उपचार का रास्ता दिखा सकती है।

Devi Care Hospital, Patna की ओर से महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण पहल।

✅ यदि किसी महिला ने पिछले 1 सप्ताह के भीतर किसी अन्य डॉक्टर या हॉस्पिटल में परामर्श या इलाज लिया है, तो वह डॉ. पंकज चौधरी से FREE SECOND OPINION प्राप्त कर सकती हैं।

डॉ. पंकज चौधरी
IVF Specialist | Laparoscopic Surgeon | Obstetrician & Gynaecologist

पटना ही नहीं, पूरे बिहार में गायनी के क्रिटिकल केस के सबसे बड़े नामों में से एक। जटिल एवं हाई-रिस्क महिला रोगों के उपचार, कठिन सर्जरी और सही चिकित्सकीय निर्णय के लिए वर्षों का अनुभव।

याद रखें, हर गंभीर निर्णय से पहले विशेषज्ञ की दूसरी राय (Second Opinion) लेना समझदारी है। सही समय पर लिया गया सही निर्णय अनावश्यक जटिलताओं से बचा सकता है और बेहतर उपचार की संभावना बढ़ा सकता है।

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आपकी सेहत हमारी प्राथमिकता है।

23/07/2026

प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद पहला अल्ट्रासाउंड क्यों ज़रूरी है?

मेरे पास अक्सर ऐसी मरीज आती हैं, जिन्हें प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद यह लगता है कि अब सब कुछ सामान्य है और अल्ट्रासाउंड कुछ सप्ताह बाद भी कराया जा सकता है। लेकिन एक स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में मैं हमेशा कहता हूँ कि प्रेग्नेंसी की पुष्टि होने के लगभग 4–5 सप्ताह बाद पहला अल्ट्रासाउंड अवश्य कराना चाहिए।

हाल ही में मेरे पास 31 वर्षीय एक महिला आईं। उन्हें कई दिनों से प्रेग्नेंसी का पता था, लेकिन किसी कारणवश समय पर अल्ट्रासाउंड नहीं कराया गया था। जब वे अस्पताल पहुँचीं, तो उन्हें तेज पेट दर्द और बेचैनी की शिकायत थी।

तुरंत अल्ट्रासाउंड कराया गया। जाँच में गर्भाशय (Uterine Cavity) खाली मिला। आगे पता चला कि गर्भ फ़ैलोपियन ट्यूब में था (Tubal/Ectopic Pregnancy) और दुर्भाग्यवश वह Ruptured Ectopic Pregnancy में बदल चुका था। अंदरूनी रक्तस्राव शुरू हो चुका था और मरीज की स्थिति तेजी से गंभीर होती जा रही थी।

ऐसी परिस्थिति में एक-एक मिनट महत्वपूर्ण होता है। हमने बिना समय गंवाए इमरजेंसी लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की। सौभाग्य से समय पर उपचार मिल गया और मरीज सुरक्षित हो गई। यदि थोड़ी भी और देरी होती, तो उसकी जान को गंभीर खतरा हो सकता था।

मैं यह अनुभव इसलिए साझा कर रहा हूँ क्योंकि ऐसी घटनाएँ रोकी जा सकती हैं।

याद रखिए, प्रेग्नेंसी टेस्ट केवल यह बताता है कि गर्भावस्था है। यह नहीं बताता कि गर्भ सही स्थान पर है या नहीं। यह जानकारी केवल समय पर किए गए अल्ट्रासाउंड से ही मिलती है।

इसलिए मेरी सभी महिलाओं और उनके परिवारों से अपील है कि जैसे ही प्रेग्नेंसी की पुष्टि हो, लगभग 4–5 सप्ताह बाद पहला अल्ट्रासाउंड अवश्य कराएँ। यह एक छोटी-सी जाँच है, लेकिन कई बार यही जाँच माँ की जान बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

आपकी और आपके शिशु की सुरक्षा, सही समय पर लिए गए सही निर्णय से शुरू होती है।

— डॉ. पंकज चौधरी
IVF Specialist | Laparoscopic Surgeon | Obstetrician & Gynaecologist
Devi Care Hospital, Patna

🤰 प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आया है? अब अगला सबसे ज़रूरी कदम क्या है?कई महिलाएँ सोचती हैं कि प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आन...
23/07/2026

🤰 प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आया है? अब अगला सबसे ज़रूरी कदम क्या है?

कई महिलाएँ सोचती हैं कि प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद सब कुछ सामान्य है। लेकिन सच यह है कि केवल प्रेग्नेंसी टेस्ट यह नहीं बता सकता कि गर्भ सही जगह पर है या नहीं।

इसलिए प्रेग्नेंसी के लगभग 4–5 सप्ताह बाद पहला अल्ट्रासाउंड कराना बेहद आवश्यक है।

अल्ट्रासाउंड से पता चलता है: ✅ गर्भाशय के अंदर प्रेग्नेंसी सही जगह पर है या नहीं। ✅ कहीं यह एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (Ectopic Pregnancy) तो नहीं। ✅ गर्भ का शुरुआती विकास सामान्य है या नहीं।

⚠️ समय पर अल्ट्रासाउंड कराने से कई गंभीर जटिलताओं की पहचान शुरुआती चरण में ही हो सकती है और माँ की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

👨‍⚕️ डॉ. पंकज चौधरी
IVF Specialist | Laparoscopic Surgeon | Obstetrician & Gynaecologist

🩺 प्रत्येक मंगलवार – FREE OPD

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एक छोटा-सा अल्ट्रासाउंड, माँ और शिशु—दोनों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है।

22/07/2026

🤰 प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आया है? अब अगला सबसे ज़रूरी कदम क्या है?

कई महिलाएँ सोचती हैं कि प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद सब कुछ सामान्य है। लेकिन सच यह है कि केवल प्रेग्नेंसी टेस्ट यह नहीं बता सकता कि गर्भ सही जगह पर है या नहीं।

इसलिए प्रेग्नेंसी के लगभग 4–5 सप्ताह बाद पहला अल्ट्रासाउंड कराना बेहद आवश्यक है।

अल्ट्रासाउंड से पता चलता है: ✅ गर्भाशय के अंदर प्रेग्नेंसी सही जगह पर है या नहीं। ✅ कहीं यह एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (Ectopic Pregnancy) तो नहीं। ✅ गर्भ का शुरुआती विकास सामान्य है या नहीं।

⚠️ समय पर अल्ट्रासाउंड कराने से कई गंभीर जटिलताओं की पहचान शुरुआती चरण में ही हो सकती है और माँ की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

🎥 इस वीडियो में डॉ. पंकज चौधरी सरल भाषा में बता रहे हैं कि प्रेग्नेंसी टेस्ट के बाद पहला अल्ट्रासाउंड कब और क्यों कराना चाहिए। यदि आप या आपके परिवार में कोई गर्भवती है, तो यह जानकारी अवश्य देखें और दूसरों तक भी पहुँचाएँ।

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एक छोटा-सा अल्ट्रासाउंड, माँ और शिशु—दोनों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है।

पहली प्रेग्नेंसी में सबसे ज़रूरी 5 जांच: स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु के लिए सुरक्षित शुरुआतलेखक :डॉ. पंकज चौधरीIVF Special...
20/07/2026

पहली प्रेग्नेंसी में सबसे ज़रूरी 5 जांच: स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु के लिए सुरक्षित शुरुआत

लेखक :
डॉ. पंकज चौधरी
IVF Specialist | Laparoscopic Surgeon | Obstetrician & Gynaecologist
Devi Care Hospital, Patna

गर्भावस्था किसी भी महिला के जीवन का सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण चरण होता है। पहली बार माँ बनने की खुशी के साथ कई सवाल और चिंताएँ भी जुड़ी होती हैं। क्या बच्चा स्वस्थ है? कौन-कौन सी जांच करानी चाहिए? किस समय डॉक्टर के पास जाना चाहिए? क्या केवल अल्ट्रासाउंड ही पर्याप्त है?

इन सभी सवालों का एक ही जवाब है—समय पर सही जांच।

गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में कराई गई आवश्यक जांचें न केवल माँ और शिशु के स्वास्थ्य की सही जानकारी देती हैं, बल्कि भविष्य में होने वाली कई गंभीर जटिलताओं को भी समय रहते रोकने में मदद करती हैं। आज आधुनिक चिकित्सा के कारण अधिकांश गर्भावस्था संबंधी समस्याओं का समय पर पता लगाकर सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है, बशर्ते जांचें समय पर कराई जाएँ।

1. अल्ट्रासाउंड (Ultrasound / USG)

गर्भावस्था की सबसे महत्वपूर्ण जांचों में अल्ट्रासाउंड शामिल है। इसके माध्यम से यह पता चलता है कि गर्भ सही स्थान पर है या नहीं, भ्रूण की धड़कन सामान्य है या नहीं तथा गर्भ की वास्तविक आयु कितनी है।

आगे चलकर विभिन्न अल्ट्रासाउंड के माध्यम से बच्चे के विकास, प्लेसेंटा की स्थिति, जन्मजात विकृतियों तथा गर्भ में किसी भी असामान्यता का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

याद रखें, अल्ट्रासाउंड केवल बच्चे का फोटो देखने के लिए नहीं बल्कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।

2. खून की जांच (CBC, Blood Group, Hb)

पहली गर्भावस्था में खून की जांच बेहद आवश्यक होती है। इससे डॉक्टर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त करते हैं, जैसे—

हीमोग्लोबिन (Hb)

ब्लड ग्रुप एवं Rh Factor

एनीमिया

संक्रमण की संभावना

शरीर की सामान्य स्वास्थ्य स्थिति

भारत में बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएँ एनीमिया से प्रभावित होती हैं। यदि समय पर इसकी पहचान हो जाए तो उचित आहार और दवाओं से इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

3. यूरिन रूटीन एवं कल्चर टेस्ट

गर्भावस्था के दौरान यूरिन इन्फेक्शन (UTI) एक सामान्य लेकिन गंभीर समस्या बन सकता है। कई बार संक्रमण होने के बावजूद कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते।

यूरिन जांच से निम्न समस्याओं की पहचान की जाती है—

यूरिन इन्फेक्शन

प्रोटीन की मात्रा

शुगर

किडनी संबंधी समस्याएँ

यदि संक्रमण का समय पर उपचार न किया जाए तो समयपूर्व प्रसव, बुखार तथा अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।

4. संक्रमण स्क्रीनिंग (HIV, HBsAg, VDRL)

इन जांचों के माध्यम से HIV, हेपेटाइटिस-बी तथा सिफिलिस जैसे गंभीर संक्रमणों की पहचान की जाती है।

कई बार मरीज पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देता है, लेकिन संक्रमण मौजूद हो सकता है। यदि शुरुआती जांच में इसका पता चल जाए तो उचित इलाज और सावधानियों के माध्यम से माँ से बच्चे में संक्रमण फैलने की संभावना को काफी हद तक रोका जा सकता है।

इसलिए इन जांचों को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

5. थायरॉयड जांच (TSH)

थायरॉयड हार्मोन गर्भावस्था के दौरान माँ और शिशु दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

यदि थायरॉयड असंतुलित हो तो निम्न समस्याएँ हो सकती हैं—

गर्भपात का खतरा

समयपूर्व प्रसव

बच्चे के मानसिक एवं शारीरिक विकास पर प्रभाव

उच्च रक्तचाप की संभावना

सामान्य रक्त जांच के माध्यम से TSH की जानकारी प्राप्त की जाती है और आवश्यकता होने पर आसानी से उपचार शुरू किया जा सकता है।

क्या केवल ये पाँच जांच ही पर्याप्त हैं?

नहीं। प्रत्येक गर्भावस्था अलग होतीे है। आपकी उम्र, स्वास्थ्य, पारिवारिक इतिहास और मेडिकल स्थिति के अनुसार डॉक्टर अतिरिक्त जांच जैसे

NT Scan

Double Marker Test

Anomaly Scan

Glucose Tolerance Test (GTT)

Growth Scan

भी सलाह दे सकते हैं।

इसलिए इंटरनेट की सलाह के बजाय हमेशा स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही अपनी जांच कराएँ।

पहली प्रेग्नेंसी में किन बातों का रखें विशेष ध्यान?

गर्भावस्था की पुष्टि होते ही डॉक्टर से मिलें।

सभी जांच समय पर कराएँ।

आयरन, कैल्शियम एवं फोलिक एसिड नियमित लें।

संतुलित एवं पौष्टिक भोजन करें।

पर्याप्त पानी पिएँ।

बिना डॉक्टर की सलाह कोई दवा न लें।

नियमित हल्की शारीरिक गतिविधि करें।

सभी निर्धारित फॉलो-अप विज़िट पर जाएँ।

निष्कर्ष

पहली गर्भावस्था जीवन का एक अनमोल अनुभव है। इस सफर को सुरक्षित बनाने के लिए केवल खुश रहना ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से अपनी और अपने शिशु की देखभाल करना भी आवश्यक है। समय पर कराई गई सही जांचें भविष्य की कई जटिलताओं से बचाती हैं और सुरक्षित मातृत्व की मजबूत नींव रखती हैं।

यदि आप पहली बार माँ बनने जा रही हैं या गर्भधारण की योजना बना रही हैं, तो किसी भी जांच में देरी न करें। विशेषज्ञ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ की सलाह के साथ नियमित जांच करवाएँ और स्वस्थ माँ एवं स्वस्थ शिशु की ओर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाएँ।

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🚨 क्या आपके परिवार की कोई महिला गंभीर (Critical) गायनी समस्या से जूझ रही हैं?ऐसी परिस्थितियों में हर मिनट और हर निर्णय ब...
18/07/2026

🚨 क्या आपके परिवार की कोई महिला गंभीर (Critical) गायनी समस्या से जूझ रही हैं?

ऐसी परिस्थितियों में हर मिनट और हर निर्णय बेहद महत्वपूर्ण होता है। कई बार मरीज पहले किसी अन्य डॉक्टर या हॉस्पिटल में इलाज शुरू कर चुका होता है, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं होता या ऑपरेशन जैसे बड़े निर्णय लेने की सलाह दी जाती है। ऐसे समय में एक अनुभवी विशेषज्ञ की Second Opinion कई बार सही दिशा और बेहतर उपचार का रास्ता दिखा सकती है।

Devi Care Hospital, Patna की ओर से महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण पहल।

✅ यदि किसी महिला ने पिछले 1 सप्ताह के भीतर किसी अन्य डॉक्टर या हॉस्पिटल में परामर्श या इलाज लिया है, तो वह डॉ. पंकज चौधरी से FREE SECOND OPINION प्राप्त कर सकती हैं।

डॉ. पंकज चौधरी
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पटना ही नहीं, पूरे बिहार में गायनी के क्रिटिकल केस के सबसे बड़े नामों में से एक। जटिल एवं हाई-रिस्क महिला रोगों के उपचार, कठिन सर्जरी और सही चिकित्सकीय निर्णय के लिए वर्षों का अनुभव।

याद रखें, हर गंभीर निर्णय से पहले विशेषज्ञ की दूसरी राय (Second Opinion) लेना समझदारी है। सही समय पर लिया गया सही निर्णय अनावश्यक जटिलताओं से बचा सकता है और बेहतर उपचार की संभावना बढ़ा सकता है।

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15/07/2026

Advanced Laparoscopic Fibroid Surgery: Save the Uterus Whenever Possible

A diagnosis of Uterine Fibroid does not automatically mean that the uterus has to be removed.

With advances in Laparoscopic Myomectomy, many women can have only the fibroids removed while preserving the uterus—especially those who wish to retain their fertility or prefer uterus-conserving treatment.

Benefits of Advanced Laparoscopic Fibroid Surgery

✔ Uterus preservation whenever medically feasible
✔ Minimal blood loss
✔ Less post-operative pain
✔ Tiny keyhole incisions with excellent cosmetic results
✔ Faster recovery and shorter hospital stay
✔ Early return to normal activities
✔ Better fertility preservation in appropriately selected patients

Every fibroid is different. The size, number, location of fibroids, your age, symptoms, and future pregnancy plans all help determine the most appropriate treatment.

Remember: A fibroid diagnosis does not always mean hysterectomy. In many cases, advanced laparoscopic surgery can effectively treat fibroids while preserving the uterus.

Consult an experienced Laparoscopic Gynaecologist to know the best treatment option for you.

'sHealth

अगर नवजात शिशु की माता को दूध न आए तो क्या करें?घबराएँ नहीं, सही सलाह और समय पर उपचार से अधिकांश समस्याओं का समाधान संभव...
14/07/2026

अगर नवजात शिशु की माता को दूध न आए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं, सही सलाह और समय पर उपचार से अधिकांश समस्याओं का समाधान संभव है :

बच्चे के जन्म के बाद हर माँ की सबसे बड़ी चिंता होती है कि उसका शिशु स्वस्थ रहे और उसे पर्याप्त पोषण मिले। लेकिन कई बार प्रसव के बाद कुछ माताओं को ऐसा लगता है कि उनके स्तनों में दूध नहीं बन रहा है या बहुत कम आ रहा है। यह स्थिति नई माताओं और उनके परिवारों में चिंता का कारण बन जाती है। कई बार जल्दबाज़ी में परिवार बिना डॉक्टर की सलाह के फॉर्मूला मिल्क शुरू कर देता है, जबकि अधिकांश मामलों में इसकी आवश्यकता नहीं होती।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर माँ का शरीर अलग होता है। कुछ महिलाओं में प्रसव के तुरंत बाद दूध आने लगता है, जबकि कुछ में इसे आने में 24 से 72 घंटे तक का समय लग सकता है। विशेष रूप से यदि सीज़ेरियन (Cesarean Delivery) हुआ हो, अत्यधिक रक्तस्राव हुआ हो या प्रसव जटिल रहा हो, तो दूध आने में थोड़ी देरी हो सकती है। यह सामान्य बात है और इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में दूध नहीं बनेगा।

जन्म के बाद निकलने वाला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम (Colostrum) कहा जाता है, मात्रा में भले ही कम होता है, लेकिन यही बच्चे के लिए सबसे महत्वपूर्ण भोजन है। इसे बच्चे का पहला प्राकृतिक टीका भी कहा जाता है क्योंकि इसमें भरपूर एंटीबॉडी और रोग प्रतिरोधक तत्व होते हैं। इसलिए जन्म के पहले एक घंटे के भीतर ही बच्चे को स्तनपान कराने का प्रयास करना चाहिए।

यदि दूध कम बन रहा है, तो सबसे प्रभावी उपाय है बार-बार स्तनपान कराना। जितनी बार बच्चा स्तन चूसेगा, शरीर में प्रोलैक्टिन और ऑक्सीटोसिन हार्मोन सक्रिय होंगे और दूध बनने की प्रक्रिया तेज होगी। इसलिए बच्चे को हर 2–3 घंटे पर या उसकी मांग के अनुसार स्तनपान कराना चाहिए।

दूध कम आने का एक बड़ा कारण गलत Latch (बच्चे का स्तन पकड़ने का तरीका) भी होता है। यदि बच्चा सही तरीके से स्तन नहीं पकड़ता, तो वह पर्याप्त दूध नहीं पी पाता और स्तनों को दूध बनाने का पर्याप्त संकेत भी नहीं मिलता। इसलिए सही Position और Latch सीखना बेहद आवश्यक है। आवश्यकता होने पर Lactation Counselor या स्त्री रोग विशेषज्ञ की सहायता लेनी चाहिए।

माँ का खान-पान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रसव के बाद माँ को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए, संतुलित एवं पौष्टिक भोजन लेना चाहिए, पर्याप्त नींद लेनी चाहिए और तनाव से बचना चाहिए। परिवार का सहयोग भी इस समय अत्यंत आवश्यक होता है। जब माँ मानसिक रूप से शांत रहती है, तो दूध बनने की प्रक्रिया बेहतर होती है।

कई बार कुछ चिकित्सीय कारणों से भी दूध कम बन सकता है, जैसे हार्मोनल असंतुलन, थायरॉयड की बीमारी, अत्यधिक रक्तस्राव, कुछ दवाओं का प्रभाव या दुर्लभ परिस्थितियों में स्तन ग्रंथियों का पर्याप्त विकास न होना। ऐसी स्थिति में स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर से तुरंत सलाह लेनी चाहिए।

यदि जन्म के 3–5 दिन बाद भी दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं बन रहा, बच्चा लगातार भूखा रहता है, उसका वजन नहीं बढ़ रहा या वह पर्याप्त पेशाब नहीं कर रहा है, तो यह संकेत है कि तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

ऐसी परिस्थितियों में डॉक्टर बच्चे की स्थिति का मूल्यांकन करते हैं। यदि वास्तव में माँ का दूध पर्याप्त नहीं है, तो डॉक्टर की सलाह पर Infant Formula Milk अस्थायी रूप से दिया जा सकता है। लेकिन बिना चिकित्सकीय सलाह के गाय, भैंस या बकरी का दूध, शहद, घुट्टी या अन्य घरेलू पदार्थ नवजात को बिल्कुल नहीं देने चाहिए। इससे संक्रमण, एलर्जी और पाचन संबंधी गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं।

यदि फॉर्मूला मिल्क शुरू करना पड़े, तब भी स्तनपान का प्रयास बंद नहीं करना चाहिए। नियमित रूप से बच्चे को स्तन से लगाते रहने और आवश्यक होने पर Breast Pump का उपयोग करने से कई माताओं में धीरे-धीरे दूध बनने लगता है। बाद में डॉक्टर की सलाह के अनुसार फॉर्मूला कम करके केवल स्तनपान पर वापस आया जा सकता है।

यह भी याद रखें कि 90–95% माताओं में पर्याप्त दूध बनने की क्षमता होती है। अधिकांश मामलों में समस्या दूध की कमी नहीं, बल्कि सही जानकारी और सही तकनीक की कमी होती है। इसलिए इंटरनेट या आसपास के लोगों की सलाह पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेना सबसे सुरक्षित और सही विकल्प है।

एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में मेरा सभी नई माताओं और उनके परिवारों से आग्रह है कि यदि दूध कम आ रहा हो या न आ रहा हो, तो घबराएँ नहीं। सही समय पर सही सलाह, उचित तकनीक और चिकित्सकीय मार्गदर्शन से अधिकांश माताएँ सफलतापूर्वक अपने शिशु को स्तनपान करा सकती हैं।

याद रखें—माँ का दूध नवजात शिशु के लिए प्रकृति का सबसे अमूल्य उपहार है। यदि किसी कारणवश समस्या आ भी जाए, तो उसका समाधान संभव है। सही जानकारी, धैर्य और विशेषज्ञ चिकित्सक का मार्गदर्शन ही स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु की कुंजी है।

डॉ. पंकज चौधरी
IVF Specialist | Laparoscopic Surgeon | Obstetrician & Gynaecologist
Devi Care Hospital
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