12/09/2026
भगवान, मैं आपका शिष्य हूं, आप हैं मेरे गुरु--इसे सारे जगत से कहना चाहता हूं,पर कह नहीं पाता हूं। क्या करूं?
इसे मौन अनुभव ही रहने दो। इसे कहने की कोई जरूरत भी नहीं है। नहीं तो अहंकार उपजेगा। क्यों कहना चाहते हो? क्या प्रयोजन है? अगर तुम शिष्य हो तो जगत जान ही लेगा।
फूल खिलते हैं, सुगंध पहुंच ही जाती है नासापुटों तक। सूरज निकलता है--बिना किसी दुदुंभि के, बिना किसी घोषणा के, बिना किसी विज्ञापन के--पक्षी जग जाते हैं। नींद में भी खबर हो जाती है कि सूरज निकल आया।
तुम्हारा गीत फूटेगा, बस उसी से खबर होगी। तुम्हारी गंध उड़ेगी, बस उसी से खबर होगी। और अतिरिक्त खबर देने की कोई जरूरत नहीं है। अहंकार की यात्राओं से सावधान रहो। अहंकार बड़ा कुशल, बड़ा चालबाज है, बड़ा चालाक है। हर तरह से अपने को बड़ा करने की चेष्टाएं खोजने लगता है। धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो--ठीक, चढ़ बैठता है, सवारी कर लेता है। इतना ही नहीं, ज्ञान हो, ध्यान हो, त्याग हो, संन्यास हो--वहां भी चढ़ बैठता है। वहां भी सवारी करने लगता है। रस को विषाक्त न करो। अहंकार विषाक्त कर देगा। चुप ही रहो।
चुप्पी भी कहती है। और चुप्पी खूब जोर से कहती है। कभी-कभी बड़े जोर से कहना भी इतने जोर से नहीं होता जितना मौन कह जाता है। मौन की क्षमता भी समझो।
तो पहली तो बात: कहने की कोई जरूरत नहीं है। तुम मेरे शिष्य हो, यह मुझसे कह दिया, काफी है। हालांकि मैं तुम्हारे भाव को समझ रहा हूं। तुम्हारा भाव बुरा भी नहीं है। लेकिन अहंकार बड़ा कुशल है, अच्छे भावों पर भी सवारी कर जाता है। इसलिए सावधान करना भी जरूरी है। अहंकार इतना कुशल है कि साधुता के पीछे भी छिप कर खड़ा हो जाता है; सरलता में से भी रास्ता निकाल लेता है; विनम्रता में भी दावेदार बन जाता है।
तुम्हारा भाव मैं समझा हूं। भाव तो सुंदर है। जब भी हमारे जीवन में कुछ आनंद घटता है, हम बांटना चाहते हैं। जिन्हें हम प्रेम करते हैं, उन्हें भी खबर पहुंचाना चाहते हैं। जिन्हें हमने चाहा है, जिन्हें हमने पहचाना है, चाहते हैं कि वे भी इस सन्मार्ग पर चलें, उन्हें भी यह प्रकाश मिले। तुम तृप्त होते हो किसी बात से, तो स्वभावतः तुम चाहते हो तुम्हारी पत्नी भी तृप्त हो, तुम्हारा पति भी तृप्त हो, तुम्हारे बच्चे भी तृप्त हों, तुम्हारे मित्र भी, तुम्हारे प्रियजन भी। तुम कहना चाहते हो।
तुम्हारा भाव बुरा नहीं है। लेकिन अहंकार अगर पीछे छिपा आया तो तुम चाहोगे कुछ, होगा उसके विपरीत। पति पत्नी को संन्यास में लाना चाहे तो मुश्किल पड़ जाती है, फिर पत्नी आती नहीं। जितना पति चेष्टा करता है, उतनी ही कठिनाई हो जाती है। पत्नी चाहती है कि पति आए, मुझे सुने, समझे, ध्यान करे--बस मुश्किल हो जाती है। बहुत मुश्किल हो जाती है। क्योंकि जिनसे तुम्हारे संबंध हैं, नाते हैं, वे कोई भी यह मानने को तैयार नहीं होते कि तुम उनसे ज्यादा बुद्धिमान हो। उनके अहंकार को चोट लगती है। वे कोई भी यह मानने को राजी नहीं होते। कोई पत्नी मान सकती है, कि मेरा पति और बुद्धिमान! ऐसा कभी हुआ है? कोई पति मान सकता है कि मेरी पत्नी और कभी कोई ऐसा काम करेगी जिसमें बुद्धि का लक्षण हो!
जिनसे हमारे नाते-रिश्ते हैं, उन सबको हम सोचते हैं कि उनमें कुछ समझ नहीं है। ऐसा ही वे भी तुम्हारे संबंध में सोचते हैं। इसलिए तो इतनी कलह होती है, इतने उपद्रव होते रहते हैं। संबंधों में सिवाय कलह के और कुछ होता दिखाई नहीं पड़ता। हर छोटी-छोटी बात पर कलह हो जाती है। छोटी-छोटी बात पर विवाद हो जाता है। व्यर्थ की बातों में से बातें निकल आती हैं।
तो तुम इस भ्रांति में मत रहना कि अपनी पत्नी को कहोगे कि मुझे बड़ा आनंद मिल रहा है, तो वह मानेगी। वह दुनिया में किसी के भी चरण छू सकती है। कोई भी ऐरा-गैरा-नत्थू उसके गांव में आ जाए, तो वह महाराज के चरण छू सकती है, कि बड़े ज्ञानी का आगमन हुआ है। मगर पति! यह तो आखिरी मामला है। अगर पत्नी पति को बुद्धिमान मान ले तो समझो क्रांति हुई। यह बिलकुल मुश्किल है। यह बहुत कठिन है।
जिनके साथ तुम बचपन से बड़े हुए हो वे तुम्हें ज्ञानी नहीं मान सकते। तुम्हारी तो बात ही छोड़ दो, उन्होंने बड़े-बड़े ज्ञानियों को ज्ञानी नहीं माना। जीसस अपने ही गांव में नहीं पूजे गए। जीसस की प्रसिद्ध उक्ति है कि पैगंबर को उसके ही गांव में नहीं पहचाना जाता। गांव के लोगों ने जीसस को बड़े होते देखा, उसी गांव में बड़े होते देखा, उसी गांव के रास्ते पर खेलते देखा। गांव के लोग जीसस को जानते थे, जीसस के बाप को जानते, बाप के बाप को जानते--सबको जानते थे। अचानक यह बेटा ईश्वरीय हो गया! यह असंभव है। यह बात भरोसे की नहीं होती। यह कैसे हो सकता है कि हम सब नहीं हो पाए ईश्वर और यह बेटा ईश्वर हो गया है! और यहीं लकड़ी ढोता था। क्योंकि बढ़ई का बेटा था। यहीं लकड़ी काटता था। इसके हाथ की बनाई हुई टेबल-कुर्सियां लोगों के घरों में हैं। और यह ईश्वर को पा गया! या तो पागल है, विक्षिप्त हो गया है; या धोखेबाज है, झूठे दावे कर रहा है। कौन मानेगा इसे!
बहुत कठिन हो जाता है। अहंकार को भारी चोट लगती है। इसलिए तो मुर्दा गुरुओं की दुनिया में प्रतिष्ठा रहती है। जिंदा गुरु की प्रतिष्ठा नहीं होती। जिंदा गुरु को पत्थर पड़ते हैं, गालियां पड़ती हैं। मुर्दा गुरु पर फूल बरसते हैं। क्यों, मुर्दा गुरु के साथ तुम्हारा इतना प्रेम कैसे हो जाता है एकदम से? मुर्दा गुरु से तुम्हारे अहंकार की कोई टक्कर नहीं होती। अब बुद्ध से तुम्हारी क्या टक्कर है? रहे होंगे बुद्धिमान तो रहे होंगे। कौन झंझट करे! रहे ही होंगे। दो फूल चढ़ाओ और छुटकारा पाओ। जीसस रहे होंगे बुद्धिमान, कृष्ण रहे होंगे ईश्वर के अवतार। लेकिन तुम्हारे सामने कोई बैठा हो, तुम्हारे घर में कोई बैठा हो, तुम्हारा समसामयिक हो, तुम्हारा संबंधी हो, तुम्हारा बेटा हो, तुम्हारी बेटी हो, तुम्हारा पति हो, पत्नि हो, तुम्हारा पिता हो, तुम्हारा मित्र हो--बहुत कठिन हो जाती है बात, असंभव हो जाती है बात। बड़ी बोध की क्षमता चाहिए तो कोई सुनेगा, समझेगा।
तुम कहना चाहते हो, ठीक; लेकिन सुनेगा कौन, मानेगा कौन! और फिर एक तीसरी कठिनाई, कुछ बातें हैं जो कही जा सकती नहीं। उन बातों में एक बात यह भी है--प्रेम अनिर्वाच्य है। और शिष्य और गुरु के बीच जो प्रेम घटता है वह सर्वाधिक अनिर्वाच्य है, क्योंकि वह प्रेम की पराकाष्ठा है।
तीन तरह के प्रेम होते हैं। क्योंकि मनुष्य के भीतर जीवन के तीन तल हैं। एक तो शरीर का प्रेम होता है। उसे भी बताना कठिन होता है, लेकिन फिर भी इतना कठिन नहीं होता, क्योंकि स्थूल है; स्थूल स्थूल का नाता है। फिर दूसरा प्रेम मन का प्रेम होता है। उसे बताना और कठिन हो जाता है। क्योंकि मन को देखा किसने है! देखा नहीं, कल सुंदरदास कहते थे--न उसका माथा है, न उसका सिर है, न उसका शरीर है! अशरीरी है। इस मन के प्रेम को कैसे प्रकट करो! और कोई अगर इनकार करे तो सिद्ध न कर पाओगे। शरीर का प्रेम दिखलाने के तो उपाय हैं। किसी को छाती से लगा लो, तो शरीर का प्रेम पता चलता है।
मन के प्रेम को क्या करोगे? कैसे प्रकटाओगे? हां, जिससे प्रेम है उसे शायद समझ में आ जाए। वह शायद तुम्हारी भाव-भंगिमा में पहचान ले, तुम्हारी मुद्रा में पहचान ले। तुम्हारे शब्दों में छिपा हुआ रस, तुम्हारे उठने-बैठने में, तुम्हारी आतुरता में, तुम्हारी आंखों में--उसे थोड़ी झलक मिल जाए शायद--वह भी शायद! क्योंकि जिनसे हमारा प्रेम है उनसे भी हमें कहना पड़ता है; कहना पड़ता है, तो शायद उनकी समझ में आता है। अगर तुम न कहो तो उनकी समझ में नहीं आता। कहने का मतलब है कि मन को शरीर तक लाना पड़ता है। जो कही गई है बात, वह तो शरीर की हो जाती है। शब्द तो शरीर से पैदा होते हैं। मन की बात तो मन में रहती है। मन की बात तो मौन में होती है। लेकिन कभी-कभी प्रेमी इस ऊंचाई पर आ जाते हैं कि शब्दों की जरूरत नहीं होती। साथ बैठे होते हैं--चुप। नहीं कुछ कहा जाता। नहीं कुछ बोला जाता। नहीं कुछ लिया-दिया जाता। मगर एक संवाद चलता है। ऊर्जा से ऊर्जा कहती है। शक्ति की तरंगें एक-दूसरे तक पहुंचती हैं। एक उल्लास होता है। सिर्फ मौजूदगी काफी होती है।
लेकिन अगर दूसरे को समझाने जाओगे तो मुश्किल हो जाएगी। लेकिन शायद कोई काव्य में कह दे, कोई बांसुरी में बजा दे, कोई वीणा पर तारों में झंकृत कर दे। इसी से काव्य पैदा हुआ, संगीत पैदा हुआ, नृत्य पैदा हुआ। यह जो मन का प्रेम है उसको प्रकट करने के उपाय खोजे गए।
लेकिन फिर एक तीसरा प्रेम है--आत्मा से आत्मा का। वही शिष्य और गुरु का प्रेम है। उसको कहने के लिए न तो संगीत समर्थ है, न काव्य समर्थ है। उसे कहने का कोई उपाय ही नहीं है। वह तो इतना गूढ़ है कि सब अभिव्यक्तियों के पार है। उसे तो गुरु समझता है, शिष्य समझता है। वह तो बिलकुल चुप-चुप है। कोई निवेदन भी करने का कारण नहीं होता वहां। उसे तुम दूसरों को समझाना चाहोगे, तो बहुत मुश्किल में पड़ोगे। न समझा पाओगे। वह तो एक अंतःसलिला है, एक भीतर की गंगा है।
कुछ भौतिक कुछ मानसिक से तुम
कुछ किरन कुछ कुंकुम
बैठे हो हिले बिना मन में मेरे
जैसे गुलाब कोई खिले बिना
घेरे हो वातावरण अपनी सुगंध से
जैसे विचार कोई गीत बने बिना
रच जाए भीतर प्राणों में हिना
अव्यक्त!.
कुछ भौतिक कुछ मानसिक से तुम
कुछ किरन कुछ कुंकुम
बैठे हो हिले बिना मन में मेरे
जैसे गुलाब कोई खिले बिना
घेरे हो वातावरण अपनी सुगंध से
जैसे विचार कोई गीत बने बिना
रच जाए भीतर प्राणों में हिना।
सब चुपचाप हो जाता है। न फूल खिलता है, और गंध बिखर जाती है। न गीत जगता है, लेकिन काव्य फैल जाता है। न वीणा बजती है, न वीणा के तार छेड़े जाते हैं--और संगीत का सागर लहराता है।
कुछ किरन कुछ धूप
कुछ पकड़ में आने लायक रूप
कुछ जड़ कुछ जंगम
यह सरस्वती संगम किसको समझाऊं
जो बह रहा है भीतर-भीतर
ओंठों पर कैसे लाऊं आकृति वह झुटपुटे में पड़ी हुई
जागृति में जड़ जिसकी
सपने में बड़ी हुई
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों पंखुरी दूं सौरभ ही सौरभ को
अतिचेतन को क्यों प्राण दूं
अंतःसलिला तुम्हारी स्मृति को
क्यों गंगा-जमुनी परिधान दूं!
नहीं, शब्द नहीं काम आएंगे। यह तो निःशब्द की लीला है। यह तो मौन का संगम है। यह तो बड़ी झुटपुटे में हुई बात है। न दिन, न रात--सांझ की घड़ी में घटी बात है।
कुछ किरन कुछ धूप
कुछ पकड़ में आने लायक रूप
कुछ जड़ कुछ जंगम
यह सरस्वती संगम किसको समझाऊं
तुमने देखा! हमारी प्रतीक-कथा है कि प्रयाग के महातीर्थ पर तीन नदियां आकर मिलती हैं। गंगा है, यमुना है और सरस्वती है। दो तो दिखाई पड़ती हैं, तीसरी दिखाई पड़ती नहीं। वह तीसरी ही प्रेम की अंतिम ऊंचाई है। वही सरस्वती है।
कुछ जड़ कुछ जंगम
यह सरस्वती संगम किसको समझाऊं
तो गंगा भी बताई जा सकती है, यमुना भी बताई जा सकती है, मगर सरस्वती को बताने चलोगे तो मुश्किल में पड़ोगे। कोई बता नहीं सका। उसे अदृश्य ही रखा है। दुनिया में बहुत संगम हैं, लेकिन जैसा महातीर्थ हमने बनाया है--एक अदृश्य नदी के साथ जोड़ कर, वैसा किसी ने कहीं बनाया नहीं है। दो दृश्य हैं, एक अदृश्य है। और जो अदृश्य है वही सारे दृश्यों का आधार है। सब दृश्य उसी से जन्मते और सब दृश्य उसी में एक दिन लीन हो जाते हैं।
जो बह रहा है भीतर-भीतर
ओंठों पर कैसे लाऊं.
लाया जा सकता नहीं। लाओगे तो बहुत पछताओगे। क्योंकि जो आएगा वह कुछ का कुछ होगा। जो कहने चले थे, न कहा जाएगा। कुछ और निकल आएगा।
लाओत्सु का प्रसिद्ध वचन है--सत्य कहा जा सके तो सत्य नहीं। जो सत्य बोला जा सके, असत्य हो जाता है--बोलते ही असत्य हो जाता है। तब तो सारे शास्त्र असत्य हो गए। और लाओत्सु ठीक ही कहता है। सारे शास्त्र चेष्टाएं हैं उसको कहने की, जो नहीं कहा जा सकता। और सब हार गए हैं, और हारते ही रहेंगे।
और यह हमारा सौभाग्य है कि शास्त्र जीते नहीं। अगर शास्त्र जीत जाते, शब्द कूड़ा-कचरे जैसे हैं, सत्य भी कूड़ा-कचरा हो जाता। अच्छा है कि शास्त्र हारते रहे और शास्त्र हारते रहेंगे। अच्छा है कि न कभी सत्य कहा गया और न कभी कहा जाएगा। खोजना पड़ता है। स्वयं ही जानना पड़ता है। अंतःप्रज्ञा होती है उसकी। एक-एक को अपना-अपना सत्य खोजना होता है। एक-एक को अपना-अपना सत्य जानना होता है। उधार सत्य काम नहीं आते। दूसरे के कहे सत्य काम नहीं आते।
ओंठों पर कैसे लाऊं आकृति वह झुटपुटे में पड़ी हुई
जागृति में जड़ जिसकी
सपने में बड़ी हुई
जो फैली है सारे जीवन में--जागृति से लेकर स्वप्न तक, स्वप्न से लेकर जाग्रत तक। जब प्रेम तुम्हें सघनता से पकड़ता है तो तुम्हारे जीवन के सब तलों पर फैल जाता है। तुम जाग्रत में भी प्रेमी को याद रखते हो। हजार कामों में लगे रहते हो और प्रेम की धुन बनी रहती है। हजार काम में उलझे रहते हो, मगर भूल नहीं होती। एक अंतःसलिला बहती रहती है। रात सपने में भी प्रेमी की छाया पड़ती है। और जो जानते हैं और जो जागे हैं, उन्होंने पाया है कि गहरी से गहरी निद्रा में भी जब स्वप्न भी शांत हो जाते हैं, तब भी प्रेम की अंतःसलिला बनी रहती है।
प्रेम जगता है तो तुम्हारे चौबीसों घंटों को घेर लेता है। तुम्हारी हर घड़ी फूल जैसी टंक जाती है माला में। और तुम्हारे सब फूलों के भीतर प्रेम का धागा अनस्यूत होता है।
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों फिकर करते हो? जो हुआ है, उसे सम्हालो। उसे चकाचौंध में खींच कर लाभ भी क्या होगा? उसे किसी से कहने जाओगे, कह भी न पाओगे। उलझन में भी पड़ोगे, संकोच भी खाओगे, हाराहारापन भी मालूम होगा। फिर ठीक न कह पाओगे तो अपराध भी जगेगा, कि कुछ कहने गए, कुछ कह गए। विवाद में जीत भी न सकोगे, सिद्ध भी न कर पाओगे, क्योंकि ये बातें सिद्ध करने की नहीं।
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों पंखुरी दूं सौरभ ही सौरभ को
जो सुगंध ही सुगंध है, जो सौरभ ही सौरभ है, उसे क्यों खींच कर पंखुरी बनाओ? जो इत्र ही इत्र है, अब उसे क्यों फिर वापस फूल बनाओ? उसे क्यों शब्द में लाओ? उसे क्यों प्रकट करो? उसे अप्रकट ही रहने दो। और मैं तुमसे कहता हूं: जितना तुम उसे अप्रकट रहने दोगे, उतना ही गहन होगा, उतना ही सघन होगा, उतना ही प्रगाढ़ होगा। और एक ऐसी घड़ी आती है कि उसकी प्रगाढ़ता ही औरों को चकित करेगी। उसकी प्रगाढ़ता ही दूसरों के तार झनझना जाएगी। लोग तुमसे पूछने लगेंगे: ‘क्या हुआ तुम्हें? कैसे हुआ तुम्हें?’ तुम्हारी मौजूदगी एक ठंडक लाएगी। तुम किसी के पास बैठोगे तो उस आदमी के भीतर की तरंगें बदल जाएंगी। मगर इतना इकट्ठा होने दो। इतना इकट्ठा होने दो कि जो भी तुम्हारे पास आए वह आंदोलित हो उठे, संक्रमित हो जाए। ये बातें कहने की नहीं हैं--संक्रमित होने की हैं।
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों पंखुरी दूं सौरभ ही सौरभ को
अतिचेतन को क्यों प्राण दूं
अंतःसलिला तुम्हारी स्मृति को
क्यों गंगा-जमुनी परिधान दूं!
सरस्वती को सरस्वती ही रहने दो। उसे न गंगा बनाओ न जमुना बनाओ। उसे वस्त्र न पहनाओ शब्दों के। उसे निर्वस्त्र, शून्य रहने दो। उसमें बल होगा, तो जो जान सकते हैं, जिनमें जानने की पात्रता है, वे जान लेंगे। और उसमें बड़ा बल है।
तुमने देखा? किसी ने कभी सोचा था कि पदार्थ के सबसे छोटे हिस्से अणु में, जो आंखों से दिखाई नहीं पड़ता, जो इतना छोटा है कि जिसे अभी यंत्रों से भी देखा नहीं गया है, जिसे किसी ने नहीं देखा है, जिसके छोटेपन का अंदाज तुम ऐसा लगा सकते हो कि अगर एक अणु के ऊपर दूसरा अणु, दूसरे के ऊपर तीसरा, ऐसे एक लाख अणु एक के ऊपर एक रखे जाएं तो आदमी के बाल के बराबर उनकी मोटाई हो--उस एक छोटे से अणु में कितनी शक्ति का आविर्भाव हुआ है! उसका विस्फोट. तो उसकी कथा नागासाकी और हिरोशिमा में लिखी है। उसका विस्फोट--और एक लाख आदमी क्षण में राख हो गए। अगर पदार्थ के एक अणु की इतनी क्षमता है तो चैतन्य के एक अणु की कितनी क्षमता न होगी! अगर पदार्थ के एक अणु का विस्फोट होता है, लाखों लोग मर जाते हैं--तो क्या तुम सोचते हो जब एक बुद्ध का विस्फोट होता होगा तो करोड़ों लोग जीवित न हो जाते होंगे! जिन्होंने जीवन कभी न जाना था, जिनकी शाखाओं पर कभी पत्ते न खिले थे, कभी फूल न लगे थे, उनकी शाखाओं पर पत्ते-फूल न लग जाते होंगे! जिन रेगिस्तानों में कभी धारा न बही थी जल की--क्या उनमें जलधाराएं न बह उठती होंगी?
बुद्धत्व चैतन्य का विस्फोट है। चैतन्य का विस्फोट कहो या प्रेम का विस्फोट, एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। एक ज्ञानी का ढंग है, एक प्रेमी का ढंग है। एक भक्त का, एक ध्यानी का।
तुम कहते हो: ‘मैं आपका शिष्य हूं, आप हैं मेरे गुरु--इसे सारे जगत से कहना चाहता हूं, पर कह नहीं पाता।’
चुप रहो! यह अपने से कहा जाएगा। तुम साधो इसे। तुम इसे गहराते जाओ। तुम सींचो इसकी जड़ों को। तुम अपने पूरे प्राण से इसे सींचो। तुम फिकर ही छोड़ दो शेष सब। जिस दिन होना है, अभिव्यक्ति उस दिन होगी।
कौन है जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है
आंख करना चाहता हूं चार
वह आगे न आता है
हर सुबह में जब उघड़ती आंख
लगता है कि बैठा था सिरहाने
हर निशा में जब झपकती आंख
लगता है कि आया है सुलाने
हर उदय में शक्ति देता
यामिनी में गीत गाता है
किसी क्षण में, अभी यह लगता है
कि जैसे बरजता है, यह न कर
किसी क्षण में धीर देता जान पड़ता है
कि इसको कर, न डर
किसी क्षण में हर द्विधा से हीन करता
प्राण को ऊपर उठाता है
कौन है, जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है!
शिष्य होने का अर्थ है: गुरु को अपने हृदय में बिठा लेना। शिष्य होने का अर्थ है, अब अपने से नहीं जीएंगे, अब उसकी आवाज से जीएंगे। अब उसकी प्रेरणा ही हमारे जीवन की व्यवस्था, हमारे जीवन का अनुशासन होगी। और तब निश्चित ही तुम्हारे अंतःकरण से उसकी आवाज आने लगती है।
ऐसे मैं तुमसे बाहर से बोल रहा हूं, लेकिन जिन्होंने मुझे भीतर लिया है, उनसे मैंने भीतर से बोलना शुरू कर दिया है।
कौन है जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है!
कभी जब मैं तुम्हारे भीतर मुस्कुराऊं तो घबड़ाना मत! क्योंकि तब तुम्हें मुस्कुराहट पागल जैसी मालूम पड़ेगी, क्योंकि तुम तो नहीं मुस्कुरा रहे हो। और कभी जब मैं तुम्हारे भीतर रोऊं, तो चिंतित मत हो जाना, व्यथित मत हो जाना। क्योंकि आंसू तो गिरेंगे और तुम्हें कारण कुछ भी न दिखाई पड़ेगा। कारण तो धीरे-धीरे समझ में आएगा। धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे! एक दिन तुम पहचानोगे--कौन हंसा था, कौन रोया था?
आंख करना चाहता हूं चार
वह आगे न आता है
हर सुबह में जब उघड़ती आंख
लगता है कि बैठा था सिरहाने
शिष्य और गुरु का नाता कुछ ऐसा-वैसा नाता नहीं है कि बने और मिट जाए। बनता है तो मिटता ही नहीं। और मिट जाए, तो समझना कि बना ही नहीं था। तुम भ्रांति में पड़े होओगे। तुमने मान लिया होगा।
हर सुबह में जब उघड़ती आंख
लगता है कि बैठा था सिरहाने
हर निशा में जब झपकती आंख
लगता है कि आया है सुलाने
हर उदय में शक्ति देता
यामिनी में गीत गाता है
किसी क्षण में अभी यह लगता है
कि जैसे बरजता है, यह न कर
किसी क्षण में धीर देता जान पड़ता है
कि इसको कर, न डर
किसी क्षण में हर द्विधा से हीन करता
प्राण को ऊपर उठाता है
कौन है जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है!
इसे धीरे-धीरे भीतर-भीतर साधे जाओ। इसे धीरे-धीरे भीतर-भीतर बांधे जाओ। बड़ा बांध बनाओ। जल्दी न करो इसे कह देने की। यह अपनी ही ऊर्जा से किसी दिन प्रकट होगा। तुम इसे प्रकट न कर पाओगे। जब प्रकट होगा, अपनी ही ऊर्जा से प्रकट होगा, फिर तुम रोकना चाहो तो रोक न पाओगे। तुम्हारे किए प्रकट भी नहीं होगा, तुम्हारे किए रोका भी न जा सकेगा।
और तब एक सौंदर्य है, तब एक अनूठा सौंदर्य है! जब तुम नहीं करते और अपने से होता है! जब गीत अपने से फूटता है, नाच अपने से उठता है! तुम सिर्फ दर्शक होते हो, या कि दर्शक भी नहीं होते! तुम साक्षीमात्र होते हो, या कि साक्षी भी नहीं होते! सब मिट गया होता है, तुम होते ही नहीं।
जिस दिन शिष्य बिलकुल नहीं बचता, उस दिन जो बात फूटनी शुरू होती है वही जगत को खबर ले जा सकती है।
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 04