Dr. Pravin Survashe

Dr. Pravin Survashe Consultant Neurosurgeon (Brain and Spine Surgeon)
at Manipal hospital. Kharadi
Pune
773812006

31/07/2026

Successful Lumbar Spine Decompression Surgery ✅

Another successful Lumbar Spine Decompression performed by Dr. Pravin Survashe, Neurosurgeon.

This procedure helps relieve pressure on the spinal nerves caused by conditions such as spinal stenosis, slipped disc, and nerve compression—reducing pain, numbness, and weakness while improving mobility and quality of life.

Every successful surgery is a step toward a pain-free and active life.

📍 Dr. Pravin Survashe – Neurosurgeon
🧠 Expert in Brain & Spine Surgery

SpineSpecialist BackPainRelief SpinalStenosis SlippedDisc NerveCompression BrainAndSpine DrPravinSurvashe PuneDoctor ManipalHospital SuccessfulSurgery PatientCare

18/07/2026

Pituitary Tumor Excision – Successfully Completed 🧠✨

Another successful Endoscopic Pituitary Tumor Excision performed with precision and advanced neurosurgical expertise.

This minimally invasive approach allows safe tumor removal through the nose, helping patients achieve faster recovery, minimal pain, and improved quality of life.

Every successful surgery is a step towards restoring hope and health.

Dr. Pravin Survashe
Consultant Neurosurgeon
Manipal Hospital, Kharadi, Pune

📞 Appointment: 9156738782

Neurosurgeon DrPravinSurvashe ManipalHospital Kharadi Pune BrainHealth SkullBaseSurgery MinimallyInvasiveSurgery PatientCare Healthcare SurgerySuccess MedicalExcellence NeuroCare HopeAndHealing Neuroscience

12/07/2026

⚡ Trigeminal Neuralgia – The "Su***de Disease" of Facial Pain

A sudden, electric shock-like pain on one side of the face can make even simple activities like talking, eating, brushing teeth, or smiling unbearable.

With timely diagnosis and advanced neurosurgical treatment, even severe trigeminal neuralgia can often be relieved, helping patients regain a pain-free life.

Don't ignore persistent facial pain—early evaluation can make all the difference.

👨‍⚕️ Dr. Pravin Survashe
Neurosurgeon | Manipal Hospital

Microsurgery Neurosurgeon ManipalHospital DrPravinSurvashe Neurology Healthcare PuneDoctors

हिंदी- संग्रह – "मेकिंग ऑफ अ न्यूरोसर्जन!" Full Story read 👇प्रसंग क्रमांक (8) –   FEW MORE DAYS.........(भाग -१)       ...
05/07/2026

हिंदी- संग्रह – "मेकिंग ऑफ अ न्यूरोसर्जन!" Full Story read 👇

प्रसंग क्रमांक (8) – FEW MORE DAYS.........

(भाग -१)
आज मैंने जानबूझकर मरीज़ का नाम नहीं बदला है। इस घटना को लगभग पाँच-छह वर्ष हो चुके हैं।

पाँच-छह साल पहले की एक ऐसी ही शाम थी। मेरे सामने ओपीडी में एक दंपति बैठा था। सामने उनकी ब्रेन स्कैन की फिल्म लगी हुई थी। उस स्कैन ने एक ऐसी सच्चाई सामने रख दी थी, जिसे सुनना किसी भी परिवार के लिए असहनीय होता है—रिची (रिचर्ड) को ब्रेन ट्यूमर था, और वह भी कैंसर का उन्नत (एडवांस) चरण।

रिची और मार्था पति-पत्नी थे। उनके दो बच्चे थे—एक बेटा, जो उस समय आठवीं-नौवीं कक्षा में पढ़ता था, और एक बेटी, जो पाँचवीं-छठी में थी।

मैंने दोनों बच्चों से बाहर बैठने का अनुरोध किया और रिची तथा मार्था से अकेले बात करना शुरू किया।

मैंने बहुत शांत और नरम शब्दों में उन्हें समझाया—

"ब्रेन ट्यूमर है... यह कैंसर है... और यह एडवांस स्टेज में है। जल्द से जल्द ऑपरेशन करना होगा।"

इतनी बड़ी बात सुनने के बाद दोनों कुछ देर तक बिल्कुल चुप बैठे रहे।

ऐसे समय में मरीज़ और उसके परिवार को इस सदमे को स्वीकार करने के लिए थोड़ा समय देना बहुत ज़रूरी होता है। इसलिए मैं उन्हें कुछ देर अकेला छोड़कर वार्ड राउंड पर चला गया। जाते समय मैंने स्टाफ नर्स से कहा कि ओपीडी में उनके लिए पानी और चाय भेज दें और उन दोनों पर नज़र भी रखें।

दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

बाहर बैठे उनके दोनों बच्चे घबराए हुए इधर-उधर देख रहे थे। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर अंदर क्या हो रहा है।

कुछ समय बाद जब मैं वापस लौटा, तब तक वे दोनों स्वयं को काफी हद तक संभाल चुके थे। अब वे आगे के इलाज के बारे में सोचने की स्थिति में आ गए थे।

मार्था ने धीमे स्वर में कहा—

"सर... कल रिची का जन्मदिन है। उसी दिन ऑपरेशन तय हो रहा है। मैंने उसके लिए और उसके दोस्तों के लिए एक छोटी-सी पार्टी रखी थी। होटल भी बुक कर लिया था। हम सब बहुत उत्साहित थे। लेकिन आज सुबह अचानक इसके सिर में तेज दर्द शुरू हुआ, इसलिए हम आपके पास आ गए... और देखिए... क्या से क्या हो गया।

पिछले कुछ समय से यह कई बातें भूलने लगा था। हमें लगा कि शायद मानसिक तनाव की वजह से ऐसा हो रहा होगा।

क्या एक बार स्कैन दोबारा नहीं कर सकते, सर?

मुझे लगता है कहीं कोई गलती हुई है। इतना बड़ा एडवांस स्टेज का ट्यूमर... और इतने दिनों तक हमें कुछ भी पता नहीं चला... ऐसा कैसे हो सकता है?"

मैंने उन्हें पूरी स्थिति फिर से विस्तार से समझाई।

करीब एक घंटे बाद उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया और इलाज के लिए तैयार हो गए।

लेकिन जाते-जाते मार्था ने एक आखिरी सवाल पूछा—

"सर... क्या हम सिर्फ कल का दिन उसका जन्मदिन मना लें और उसके बाद अस्पताल में भर्ती हो जाएँ? क्या हमारे पास इतना समय है?"

मैं कुछ देर तक चुप रहा।

मैंने एक बार फिर स्कैन को ध्यान से देखा।

लेकिन ट्यूमर इतना बड़ा था कि वह किसी भी क्षण अचानक बेहोश होकर गिर सकता था।

इसलिए मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा—

"नहीं... अब एक दिन भी इंतज़ार करना सुरक्षित नहीं होगा।"

उन्होंने बिना कोई बहस किए उसी समय अस्पताल में भर्ती होने का निर्णय ले लिया।

अगले दिन की जन्मदिन की पार्टी रद्द कर दी गई।

होटल की बुकिंग भी कैंसल कर दी गई।

और विडंबना देखिए...

जिस दिन उसका जन्मदिन था, उसी सुबह मुझे उसका उसका ऑपरेशन करना पडा ।

मेकिंग ऑफ अ न्यूरोसर्जन!

प्रसंग क्रमांक (8) – कुछ और दिन... (भाग 2)

ट्यूमर बहुत बड़ा था। ऑपरेशन के बाद उसकी याददाश्त (मेमोरी) चली जाने की संभावना भी बहुत अधिक थी।

इसलिए ऑपरेशन थिएटर में ले जाने से पहले मैंने रिची, मार्था और उनके बच्चों को बुलाकर स्पष्ट शब्दों में कहा—

"संभव है कि ऑपरेशन के बाद रिची आपको पहचान न पाए। वह अपना अतीत, अपने अपने लोग—सब कुछ भूल जाए। लेकिन उसकी जान बचाने के लिए यह ऑपरेशन करना बेहद ज़रूरी है।"

मैंने रिची से कहा कि यदि उसके बैंक खातों के पासवर्ड, बीमा पॉलिसियों, शेयरों या अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की जानकारी हो, तो वह अभी अपने परिवार को बता दे।

कुछ ही देर बाद ऑपरेशन शुरू हुआ।

ट्यूमर वास्तव में बहुत बड़ा था। बेहद सावधानी से, एक-एक परत हटाते हुए अंततः पूरा ट्यूमर निकाल दिया गया।

ऑपरेशन सफल रहा।

और शायद ईश्वर की कृपा थी कि उसकी याददाश्त भी पूरी तरह सुरक्षित रही।

देखते ही देखते एक महीने के भीतर वह लगभग पूरी तरह स्वस्थ हो गया।

अगले दो-तीन महीने रेडियोथेरेपी और नियमित फॉलो-अप चलता रहा।

फिर अचानक उसका आना बंद हो गया।

मैंने एक दिन अलग से मार्था को बुलाकर कहा था—

"किस्मत ने इस बार आपका साथ दिया है। रिची बच गया है और उसकी याददाश्त भी सुरक्षित है।

लेकिन यह हाई-ग्रेड कैंसर है। इसके दोबारा लौटने की संभावना बहुत अधिक है।

सच कहूँ तो... अब शायद वह दो से तीन वर्ष से अधिक नहीं जी पाएगा।"
..

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा।

देखते ही देखते पाँच-छह साल बीत गए।

मैं भी रिची को लगभग भूल चुका था।

फिर चार-पाँच दिन पहले, एक शाम...

वही परिवार फिर से मेरी ओपीडी में मेरे सामने बैठा था।

सामने फिर एक नया ब्रेन स्कैन लगा हुआ था।

और जैसा मैंने वर्षों पहले कहा था...

कैंसर वापस आ चुका था।

इस बार ट्यूमर पहले से कहीं अधिक आक्रामक था।

हमने बहुत देर तक सारी संभावनाओं पर चर्चा की।

लेकिन अंत में निष्कर्ष सिर्फ एक ही था—

अब इलाज के नाम पर ऐसा कुछ भी नहीं बचा था जिससे उसकी ज़िंदगी सचमुच बचाई जा सके।

मैंने मार्था को बहुत शांत स्वर में समझाया—

"शायद अब उसके पास चार से छह महीने का ही समय है।

उसके बाद...

वह हमारे बीच नहीं रहेगा।

जो पिछले पाँच-छह साल आपको मिले...

उन्हें भगवान का बोनस समझिए।

अब दोबारा ऑपरेशन या दूसरे उपचारों के पीछे भागने का कोई अर्थ नहीं है।

ट्यूमर बहुत फैल चुका है।

अब उसे शांति से जीने दीजिए...

और शांति से विदा होने दीजिए।"

यह निर्णय किसी भी परिवार के लिए असहनीय था।

मार्था...

उसका बेटा...

उसकी बेटी...

तीनों लंबे समय तक मेरे सामने बैठे रहे।

किसी की ज़ुबान से एक शब्द भी नहीं निकला।

बस...

तीनों की आँखों से आँसू लगातार बहते रहे।

कमरे में ऐसी ख़ामोशी थी...

जिसे शब्दों में कभी बयान नहीं किया जा सकता।

मेकिंग ऑफ अ न्यूरोसर्जन!

प्रसंग क्रमांक (8) – कुछ और दिन... (भाग 3)

दो-तीन दिन बीत गए।

आज सुबह मार्था अकेली मुझसे मिलने आई।

वह कुछ देर तक ओपीडी के बाहर शांत बैठी रही। मैंने अपने सभी मरीज़ देख लिए, फिर उसे अंदर बुलाया।

इस बार वह पहले जैसी टूटी हुई नहीं लग रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी। ऐसा महसूस हो रहा था कि उसने मन ही मन इस कठोर सत्य को स्वीकार कर लिया है।

मैंने पूछा,

"बताइए... अब मन में क्या चल रहा है? क्या हम आपके लिए और कुछ कर सकते हैं?"

वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली,

"सर... आपने हमारे लिए पहले ही बहुत कुछ किया है।

आपने कहा था कि रिची शायद दो-तीन साल ही जी पाएगा।

लेकिन देखिए...

वह पूरे छह साल जिया...

और बहुत खूबसूरती से जिया।

मुझे अपने पति पर बहुत गर्व है...

और मेरे दोनों बच्चों को भी अपने पापा पर बहुत गर्व है।"

कुछ पल रुककर उसने आगे कहा—

"सर, ऑपरेशन के लगभग दो महीने बाद वह पूरी तरह ठीक हो गया था।

हमने उससे उसकी बीमारी की गंभीरता छिपाने की बहुत कोशिश की।

लेकिन उसने खुद अपनी सारी रिपोर्टें पढ़ लीं।

फिर उसने इंटरनेट पर बहुत रिसर्च किया।

उसे सब समझ में आ गया...

कि उसके पास शायद सिर्फ दो या तीन साल का समय बचा है।

और उसी दिन से...

वह पूरी तरह बदल गया।

वह पहले से कहीं अधिक ज़िम्मेदार हो गया।"

"उसने अपनी कंपनी में किसी को भी यह नहीं बताया कि उसे कैंसर है।

उसे डर था कि अगर सबको पता चल गया तो नौकरी चली जाएगी...

या फिर प्रमोशन नहीं मिलेगा...

या उसे ज़िम्मेदारी वाले काम नहीं दिए जाएँगे।

इसलिए उसने अपनी छोटी-बड़ी तकलीफ़ें भी बताना बंद कर दिया।

आप हर छह महीने में स्कैन कराने के लिए कहते थे...

लेकिन वह अस्पताल आने के लिए भी तैयार नहीं होता था।

उसे हमेशा यही अपराधबोध रहता था कि वह अपने परिवार को बीच रास्ते में छोड़कर चला जाएगा।

बच्चों को देखकर वह कई बार चुपचाप रोता था...

लेकिन सर...

उसने कभी हार नही मानी... नाही वो निराश हुआ ।"

मार्था की आँखें भर आई थीं।

उसने फिर कहा—

"सर...

पिछले छह वर्षों में उसने जी-तोड़ मेहनत की।

बीमा करवाए...

नई-नई पॉलिसियाँ लीं...

ओवरटाइम किया...

हर संभव तरीके से पैसे बचाए।

उसने एक-एक रुपया सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य के लिए जोड़ा।

और आज भी...

आपने देखा न...

वह हमेशा मुस्कुराता रहता है।

उसे देखकर कोई कभी नहीं कह सकता कि उसके जीवन के आख़िरी चार-छह महीने बचे हैं।"

वह कुछ क्षण चुप रही।

फिर उसकी आवाज़ भर्रा गई।

"सर...

कल शाम हम चारों साथ बैठे थे।

रिची ने हम तीनों को अपने पास बुलाया...हमे गले लागाया..

और फिर...

वह लगभग आधे घंटे तक लगातार रोता रहा।

उसने हम सबसे माफ़ी माँगी।

वह कह रहा था—

'मुझे माफ़ कर दो...

मैं तुम्हें जिंदगी के बीच रास्ते में छोड़कर जा रहा हूँ।

बच्चों...

इस जन्म में मैं तुम्हारे लिए बस इतना ही कर पाया।

पहले सिर्फ मैं और मार्था थे।

फिर तुम दोनों हमारे जीवन में आए...

और हमारी दुनिया सचमुच महक उठी।

तुम्हारी छोटी-छोटी लड़खड़ाती चाल...

तुम्हारी मासूम हँसी...

इन्हीं में हमारी पूरी दुनिया बस गई थी।

मैं चाहता था कि दुनिया की हर खुशी तुम्हारे कदमों में रख दूँ।

लेकिन भगवान ने मुझे बहुत छोटा जीवन दिया।

इस जन्म में जो ज़िम्मेदारियाँ अधूरी रह गई हैं...

उन्हें मैं अगले जन्म में.... ज़रूर पूरी करूँगा।

अगले जन्म में भी तुम दोनों ही मेरे बच्चे बनकर आना।

ऊस जनम मे...तुम्हारी हर अधूरी इच्छा मैं पूरी करूँगा।

मार्था...

मुझे तुम्हे अपनी पलकोपे बिठाकर रखना था ...

तुम्हारा बहुत प्यार दुलार करना था...

लेकिन तुम्हारे हिस्से में तो पूरी ज़िंदगी सिर्फ संघर्ष ही आया।

एक पिता के रूप में मैं जितना कर सका...

मैंने पूरी ईमानदारी से करने की कोशिश की।

इन छह वर्षों में मैंने अगले बीस वर्षों का काम पूरा करने की कोशिश की...

लेकिन अब...

मैं थक गया हूँ...' "

मेकिंग ऑफ अ न्यूरोसर्जन!

प्रसंग क्रमांक (8) – कुछ और दिन... (भाग 4)

रिची ने बच्चों को अपनी बाँहों में भरते हुए कहा—

"तुम तीनों हमेशा एक-दूसरे का हाथ थामे रखना...

भगवान ने मुझे बहुत सुंदर जीवन दिया।

तुम जैसे संस्कारी और प्यारे बच्चे दिए....और मार्था जैसी समर्पित पत्नी मिली ।

अब मेरी बस एक ही इच्छा है...

कि आने वाले कुछ दिनों तक मैं तुम्हें जी-भरकर देखता रहूँ।

डॉक्टर कहते हैं कि शायद कुछ समय बाद मैं तुम्हें पहचानना भी बंद कर दूँ।

हो सकता है...

मैं तुम्हारे नाम भूल जाऊँ...

तुम्हारे चेहरे भूल जाऊँ...

यह घर भूल जाऊँ...

सब कुछ भूल जाऊँ...

लेकिन बच्चों...

अगर ऐसा हो जाए...

तो मुझे माफ़ कर देना।

अगर मेरी नज़रें तुम्हें अजनबी लगें...

तो भी हमेशा यह याद रखना—

'मेरा दिल तुम्हे पहचान लेगा।'

'भले ही मेरा दिमाग काम करना बंद कर दे... लेकिन मेरा दिल हमेशा तुम्हारे लिये ही धडकता रहेगा ।'

'मेरा प्यार तुम्हारे लिए आख़िरी साँस तक वैसा ही रहेगा।'

मेरे आख़िरी दिनों में तुम्हें मेरी वजह से बहुत तकलीफ़ होगी।

लेकिन मैं तुमसे एक विनती करता हूँ...

मेरे जीवन के आख़िरी दिनों वाले उस असहाय पिता को कभी याद मत रखना।

हमेशा उसी हँसते-मुस्कुराते, निडर और मज़बूत पिता को याद रखना...

जिसने तुम्हें हँसना सिखाया।

और...

मैं जहाँ भी रहूँगा...

वहीं से तुम्हें देखता रहूँगा।

मेरे आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे।"

मार्था कुछ पल चुप रही।

फिर बोली—

"सर...

छह साल पहले जब मैं रिची को पहली बार आपके पास लाई थी...

तब मैं सिर्फ़ एक गृहिणी थी।

लेकिन जब मैंने देखा कि वह अपने परिवार के भविष्य को लेकर कितना बेचैन रहता है...

तो मैंने नौकरी शुरू कर दी।

भगवान की कृपा से मुझे लगातार प्रमोशन मिलते गए।

रिची की तड़प मैं देख नहीं पाती थी।

वह बच्चों के भविष्य के लिए पैसे जोड़ना चाहता था।

मैं चाहती थी कि जाते समय उसके मन में यह अपराधबोध न रहे कि वह अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कर पाया।

इसलिए पिछले छह वर्षों में मैंने भी दिन-रात मेहनत की...

एक-एक पैसा बचाया..."

उसकी आँखों से आँसू फिर बहने लगे।

वह बोली—

"सर...

मेरे बच्चे भी अचानक बड़े हो गए।

जिस दिन रिची का ऑपरेशन हुआ...

उसी दिन उनके बचपन का अंत हो गया।

मेरा बेटा पहले बहुत ज़िद्दी था।

हर रोज़ कोई न कोई नई फ़रमाइश होती थी—

कभी नए जूते...

कभी नई जैकेट...

कभी पिकनिक...

लेकिन पिछले पाँच-छह वर्षों में उसने कभी किसी चीज़ की माँग नहीं की।

आज वह कॉलेज के दूसरे वर्ष में है।

पार्ट-टाइम नौकरी भी करने लगा है।

वह बहुत अच्छा क्रिकेट खेलता था।

रिची को पूरा विश्वास था कि एक दिन वह राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेटर बनेगा।

लेकिन ऑपरेशन वाले दिन के बाद उसकी सारी प्रैक्टिस छूट गई।

आपने उसे देखा है न, सर...

कितना स्मार्ट और स्टाइलिश दिखता है।

उसे देखकर कौन कहेगा कि वही लड़का घर में अपने पिता को नहलाता है...

उन्हें वॉशरूम तक ले जाता है...

उनके हाथ-पैर दबाता है...

उनकी सेवा करता है..."

मार्था कुछ क्षण रुकी।

फिर अपनी बेटी की बात करते हुए बोली—

"और मेरी बेटी...

उसकी तो पूरी दुनिया ही बदल गई।

वह अब बारहवीं में है।

मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही है।

पहले उसकी हर छोटी-बड़ी बात सबसे पहले अपने पापा से होती थी।

हर फैसले में उसे रिची की राय चाहिए होती थी।

लेकिन अब...

वह बिना कुछ कहे दिनभर अपने पापा के आसपास ही घूमती रहती है।

उनके लिए नए-नए व्यंजन बनाती है...

उन्हें कहानियाँ और चुटकुले पढ़कर सुनाती है...

घंटों भगवान के सामने बैठकर प्रार्थना करती रहती है।

सर...

मेरे दोनों बच्चे अचानक बहुत बड़े हो गए।

हम कभी उनका बचपन छीनना नहीं चाहते थे...

लेकिन परिस्थितियों के सामने हम पूरी तरह बेबस थे।"

मेकिंग ऑफ अ न्यूरोसर्जन!

प्रसंग क्रमांक (8) – कुछ और दिन... (अंतिम भाग)

मार्था ने आगे कहा—

"सर...

जब हम पहली बार आपके पास आए थे, तब हमारी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बिखर चुकी थी।

लेकिन पिछले छह वर्षों में हमने दिन-रात मेहनत करके अपने जीवन को फिर से संभाला।

आज रिची के मन में कम-से-कम यह संतोष तो है कि उसके जाने के बाद उसके बच्चे बेसहारा नहीं होंगे।

अगर वह उसी समय चला गया होता...

या ऑपरेशन के बाद उसकी याददाश्त चली गई होती...

तो शायद हम सचमुच सड़क पर आ गए होते।

ये छह साल...

हमारे लिए भगवान का दिया हुआ बोनस थे।

भगवान से बहुत शिकायतें थीं...

लेकिन सौभाग्य से आप हमें मिल गए।

हमारे लिए यही किसी चमत्कार से कम नहीं था।"

वह कुछ क्षण चुप रही।

फिर धीमे स्वर में बोली—

"लेकिन सर...

अब आख़िरी पड़ाव आ गया है।

आज मैं आपसे सिर्फ़ एक मेडिकल सर्टिफिकेट लेने आई हूँ।

मुझे लगभग दो महीने की छुट्टी चाहिए।

वह सर्टिफिकेट मुझे अपनी कंपनी में जमा करना है।"

मैंने पूछा—

"अगर तुम अभी छुट्टी ले लोगी...

तो उसके आख़िरी समय में क्या करोगी?

क्या उस समय कंपनी तुम्हें दोबारा छुट्टी दे पाएगी?"

मार्था ने बिना एक पल गँवाए उत्तर दिया—

"सर...

मुझे नहीं पता कि उस समय कंपनी छुट्टी देगी या नहीं।

ज्यादा छुट्टी लूँगी तो शायद मेरी जॉब भी जा सकती है...

पर अगर अभी छुट्टी नहीं ली...

तो शायद बाद में अवसर ही न मिले।

और मैं ये छुट्टी अभी इसलिए लेना चाहती हूँ...

क्योंकि अभी...

रिची हमें पहचानता है।

अभी वह हमारे नाम जानता है...

हमारे चेहरे पहचानता है...

हमसे बातें करता है...

मुस्कुराता है...

मैं उसके साथ उसके होश में रहते हुए हर पल जी लेना चाहती हूँ।

पूरी ज़िंदगी उसने सिर्फ़ परिवार के लिए संघर्ष किया।

अब मैं उसके हर छोटे-बड़े शौक पूरे करना चाहती हूँ।

इन वर्षों में वह अपने लिए कभी नहीं जिया।

मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसा जीवनसाथी मिला।

जो डेढ़-दो महीने हमारे पास हैं...

उन्हीं यादों के सहारे हमें आनेवाली पूरी ज़िंदगी बितानी है।

इसलिए...

अब आगे का हर पल...

मैं अपने दिल में हमेशा के लिए संजो लेना चाहती हूँ..."

इतना कहते-कहते उसकी आवाज़ भर आई।

जिस दर्द को वह अब तक अपनी आँखों में रोककर बैठी थी...

वह आँसुओं बनकर बह निकला।

वह कुछ देर तक चुपचाप रोती रही।

जब मन हल्का हो गया...

तो उसने अपने आँसू पोंछे...

खुद को संभाला...

और खड़ी हो गई।

उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी...

और आँखों में अटूट साहस।

अब वह अपने पति और अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया से लड़ने के लिए तैयार थी।
..

पिछले कई वर्षों में मेरी ओपीडी ने न जाने कितनी नम आँखें देखी हैं...

कितने टूटे हुए परिवार...

कितनी असहाय चुप्पियाँ...

और जीवन के कितने विचित्र मोड़।

शायद अब मुझे इन सबकी आदत हो गई है।

सचमुच...

ज़िंदगी कितनी अजीब होती है।

हम पूरी उम्र एक ऐसी दौड़ में लगे रहते हैं...

एक बड़ी गाड़ी चाहिए...

फिर बड़ा घर...

फिर दूसरा फ्लैट...

फिर और भी बहुत कुछ...

लेकिन किस्मत ...

उसके मन में कोई और ही योजना चल रही होती है।

और एक दिन...

वह अचानक अपनी चाल चल देती है।

जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है...

तब हम कभी कल्पना भी नहीं करते कि एक दिन ऐसा भी आएगा...

जब जीने के लिए...

हमें एक-एक दिन उधार माँगना पड़ेगा।

और जब वह दिन आता है...

तब समझ में आता है...

कि जिन चीज़ों के पीछे हम सारी उम्र भागते रहे...

उनकी असली कीमत कितनी कम थी।
..

मैंने मार्था के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट लिख दिया।

मैंने उसमें सिर्फ़ इतना लिखा—

"Her husband is diagnosed with advanced stage brain cancer and HE NEEDS assistance for routine activities."

लेकिन...

उस छोटे-से सर्टिफिकेट की चार पंक्तियों में बहुत-सी बातें लिखी ही नहीं जा सकती थीं।

पर मैं लिखना चाहता था—

HE ALSO NEEDS..to see his children grow...
HE ALSO NEEDS... to see his son's first salary in his trembling hands.....
HE ALSO NEEDS... to walk his daughter to her wedding....
HE ALSO NEEDS...to see the silver replace the black in his wifes hair .....
HE ALSO NEEDS..... to tell his stories to his grandchildren....
Its unfair to him... and
HE NEEDS... FEW MORE DAYS OF LIFE..........

— डॉ. प्रविण तुकाराम सुरवशे
कंसल्टेंट न्यूरोसर्जन, पुणे Mo. 077381 20060

04/07/2026

संग्रह - " मेकिंग ऑफ अ न्युरोसर्जन!"
प्रसंग क्रं.(8)- FEW MORE DAYS ...........

'रिची ( रिचर्ड !').. आज मुद्दामहून पेशंटचं नाव चेंज करत नाही. पाच सहा वर्षे झालीअसतील या घटनेला. पाच- सहा वर्षांपूर्वी अशाच एका संध्याकाळी हे दोघे माझ्या ओपीडीत, माझ्या समोर बसले होते.समोर स्कॅन लावला होता आणि रिचीला ब्रेन ट्यूमर (कॅन्सर)चं निदान झालं होतं.
रिची आणि मार्था हे दोघे नवरा बायको आणि त्यांना दोन मुलं. मुलगा त्यावेळी आठवी- नववीला असेल आणि मुलगी पाचवी- सहावीला असावी. मी दोन्ही मुलांना बाहेर बसायला सांगितलं आणि रिची आणि मार्था शी संवाद चालू केला.
ब्रेन ट्यूमर आहे...कॅन्सर आहे .... ॲडव्हान्स स्टेज आहे... अर्जंट ऑपरेशन करावे लागेल. हळुवारपणे हे सगळं मी त्यांना समजावून सांगितलं. बराच वेळ दोघे शांत होते. अशावेळी डायग्नोसिस डिक्लेअर केल्यानंतर पेशंटला आणि नातेवाईकांना त्या धक्क्यातून सावरण्यासाठी थोडा वेळ द्यावा लागतो. मी त्यांना एकमेकांबरोबर बोलण्यासाठी थोडा वेळ दिला आणि त्यांना ओपीडीतच बसवून, मी वॉर्ड राऊंडला निघून गेलो. बाहेर जाताना मी सिस्टरना सांगितलं, ओपीडी मध्ये थोडं पाणी आणि चहा नेऊन देण्यासाठी आणि त्या दोघांवर लक्ष ठेवण्यासाठी.
खूप रडले दोघं आणि बराच वेळ रडत होते.बाहेर मुलं कवरीबावरी होऊन इकडंतिकड बघत होती. मी थोड्या वेळाने परत आलो त्यावेळी ते बऱ्यापैकी सावरले होते आणि मनाने पुढच्या गोष्टी करण्यासाठी तयार झालेले होते. मार्था म्हणाली, " सर उद्याच रिचीचा बर्थडे आहे. बरोबर त्याच दिवशी ऑपरेशन ठरतंय.मी त्याच्यासाठी आणि त्याच्या मित्रांसाठी पार्टी ऑर्गनाइझ् केली होती.हॉटेल पण बुक केलं होतं. सगळेच खूप एक्साईटेड होतो पण सकाळपासून याचं डोकं दुखायला लागलं म्हणून तुमच्याकडं घेऊन आलो आणि बघा काय होऊन बसलं. तसा तो हल्ली बऱ्याच गोष्टी विसरत होता... पण आम्हाला वाटलं तो मेंटल स्ट्रेस मुळं काही गोष्टी विसरतोय. आपण एकदा स्कॅन रिपीट करून बघूया का सर ? मला वाटतय काहीतरी चुकतंय. एवढा मोठा ॲडव्हान्स स्टेजचा ट्यूमर आणि एवढे दिवस काहीच समजलं नाही असं कसं होईल?' पण पुढच्या एक तासाभरामध्ये त्यांनी तो आजार एक्सेप्ट केला आणि पुढच्या ट्रीटमेंट साठी तयारी दर्शवली.तरी मार्थाने शेवटचा प्रश्न विचारलाच,'उद्याचा एक दिवस त्याचा बर्थडे सेलिब्रेट करून ऍडमिट होऊ का? तेवढा वेळ आहे का आमच्याकडं?' मी थोडा वेळ विचार केला, परत स्कॅन बघितला....पण त्याची गाठ एवढी मोठी होती की तो कधीही कोलॅप्स होऊ शकेल,म्हणून मी नको म्हणालो आणि ते लगेचच ऍडमिट झाले.
दुसऱ्या दिवशीची पार्टी,हॉटेल बुकिंग सगळं कॅन्सल झालं आणि दुसऱ्या दिवशी सकाळी त्याच्या बर्थडेच्याच दिवशी मी त्याला ऑपरेशनला घेतलं. गाठ मोठी होती.ऑपरेशन नंतर त्याची मेमरी लॉस होण्याचे खूप जास्त चान्सेस होते. त्यामुळे ऑपरेशनला आत घ्यायच्या आधी मी त्या तिघांनाही बोलून सांगितलं, की कदाचित ऑपरेशन नंतर असं होऊ शकतं की, तो तुम्हाला ओळखू शकणार नाही, तो सगळ्या गोष्टी विसरून जाईल पण जीव वाचवण्यासाठी हे ऑपरेशन गरजेचं आहे. मी रिचीला त्याचे सगळे बँक अकाउंट पासवर्ड्स,पॉलिसी, शेअर्स आणखी काही डिटेल्स असतील तर फॅमिलीला देऊन ठेवायला सांगितलं.थोड्या वेळानी ऑपेरेशन सुरु झालं. गाठ मोठी होती पण हळू हळू करत पूर्ण गाठ निघाली.ऑपरेशन छान झालं. नशिबाने त्याची मेमरी पण व्यवस्थित राहिली आणि बघता बघता महिन्याभरात तो पूर्ण ठणठणीत बरा झाला. पुढ दोन-तीन महिने रेडिओथेरपी आणि फॉलोअप चालू होते...पण त्यानंतर फॉलोअप बंद झाला. मार्थाला मी सेपरेट बोलून सांगितलं होतं की, नशिबाने तो आता वाचलाय आणि त्याची मेमरी पण व्यवस्थित आहे.पण हा हाय ग्रेडचा कॅन्सर आहे. तो परत रिकर होईलच. जास्तीत जास्त इथून पुढे वेंकी दोन ते तीन वर्ष जगू शकेल...
पुढे पाच सहा वर्षे अशीच निघून गेली. मी देखील रिचीला विसरून गेलो. परत तो कधीच दिसला नाही...आणि चार पाच दिवसापूर्वी ही फॅमिली परत एका संध्याकाळी माझ्या ओपीडीत बसलेली होती. समोर स्कॅन लावला होता आणि मी म्हटल्याप्रमाणे यावेळी कॅन्सर परत आला होता. यावेळी ट्यूमर खूपच अग्रेसिव्ह दिसत होता. बराच वेळ डिस्कशन झालं, पण पुढे काही करण्यासारखं नाही हेच कन्क्लूजन होतं. मी मार्थाला बसून सांगितलं की पुढचे चार ते सहा महिने कदाचित तो आपल्यात आहे त्यानंतर तो नसेल.जी काही मागची पाच- सहा वर्षे आपल्याला मिळाली ती कदाचित बोनस होती म्हणून समजू आपण. आता परत ऑपरेशन आणि या सगळ्याच्या नादाला नको लागायला. कारण ट्यूमर पसरलेला आहे.... वेंकीला आता शांतपणे जाऊ दे!... हा निर्णय घेणं फॅमिली साठी खूप कठीण होतं. बराच वेळ मार्था आणि दोन्ही मुलं माझ्यासमोर बसून होती. डोळ्यातून पाणी घळा घळा वाहत होतं. थोड्या वेळ कुणीच कुणाशी बोललं नाही.
मधे दोन तीन दिवस गेले असतील आणि आज सकाळी मार्था मला एकटीच भेटायला आली. थोडा वेळ हवा आहे म्हणून शांतपणे ओपीडी समोर बसली. मी माझे ओपीडीचे पेशंट संपून घेतले आणि मग मार्थाला आत बोलवलं. यावेळी ती शांत दिसत होती. तिने मनाने सर्व एक्सेप्ट केलेलं आहे हे जाणवत होतं. मी म्हणालो, 'बोला, अजून काय विचार चालू आहे डोक्यात, अजून काय करू शकतो आपण?' ती म्हणाली,' सर तुम्ही ऑलरेडी खूप केलं आमच्यासाठी. आपण रिची दोन तीन वर्षेच जेमतेम जगेल असं म्हणत होतो, पण बघता बघता तो सहा वर्ष जगला... आणि खूप छान जगला. I am so proud of my husband and our kids are also very proud of him.
'तुम्हाला माहिती आहे सर, वेंकी इथून गेल्यानंतर दोन महिन्यातच पूर्ण बरा झाला. अपण त्याच्यापासून कॅन्सरविषयी काही गोष्टी लपवयाचा प्रयत्न केला, पण त्याने स्वतःचेच रिपोर्ट वाचून बघितले. त्यांनं पूर्ण रिसर्च केला आणि त्याला समजलं की त्याचं आयुष्य दोन ते तीन वर्षाचच उरलेलं आहे. त्या दिवशीपासून तो खूपच जबाबदारीने वागायला लागला सर.....' त्याच्या कंपनीमध्ये त्यांनं कोणालाच नाही सांगितलं की, त्याला कॅन्सर आहे म्हणून. सांगितलं तर जॉब जाईल किंवा प्रमोशन होणार नाही किंवा महत्त्वाची कामं त्याला देणार नाहीत असं समजून त्याच्या छोट्या मोठ्या कंप्लेंट्स त्यांनं सांगणं बंदच केलं. तुम्ही दर सहा महिन्यांनी स्कॅन करायला सांगितला होता पण तो हॉस्पिटल मध्ये यायलाच तयार नव्हता.त्याला खूप गिल्टी वाटत होतं की तो संसार अर्ध्यावरती सोडून चाललाय म्हणून. मुलांकडे बघून खूप रडायचा सर पण तो हरला नाही.....
' सर त्यांनं मागच्या सहा वर्षात भयंकर कष्ट केले. इन्शुरन्स काढले. पॉलिसी काढल्या.कधी कधी ओव्हरटाईम करून पण पैसे मिळवले.एक एक पैसा जोडला त्यांनी सर फक्त मुलांसाठी....आणि अजून पण बघितला ना कसा हासतमुख असतो. त्याच्याकडं बघितलं तर असं वाटतच नाही की त्याच्या आयुष्यातले शेवटचे चार सहा महिने राहिलेत.
सर,काल आम्ही संध्याकाळी सगळे एकत्र बसलो होतो रिचीने आम्हाला जवळ घेतलं आणि खूप रडला. सर, जवळपास अर्धा तास रडत होता.... त्यांनी आमच्या सगळ्यांची माफी मागितली..तो म्हणे, संसार अर्धवर सोडून चाललो. मुलांनो या आयुष्यात, या जन्मात, एवढच करता आलं तुमच्यासाठी. आधी मी आणि मार्थाच होतो. मग आमच्या आयुष्यात तुम्ही दोघं आलात आणि आमचं आयुष्य खऱ्या अर्थानी बहरत गेलं. तुमच्या दुडक्या चालीमध्ये आणि निखळ हसण्यांमध्ये आम्ही दोघंही स्वतःला हरवत गेलो. जगातली सगळी सुखं तुमच्या समोर उभी करायची होती...पण देवानं मला आयुष्यच कमी दिलं. या जन्मात बाकी राहिलेली तुमची सगळी जबाबदारी,मी पुढच्या जन्मात पार पाडीन... पुढच्या जन्मी तुम्हीच आमची मुलं म्हणून परत या... तुमचे राहिलेले सगळे हट्ट मी पूरवेन.. सॉरी मार्था तुझं किती कौतुक करायचंय होतं मला पण......आयुष्यभर कष्टच आलं तुझ्या वाट्याला..... एक बाप म्हणून मला जेवढं करता आलं तेवढं मी केलं...या पाच सहा वर्षात पुढच्या वीस वर्षाचं काम करायचा प्रयत्न केला....पण मुलांनो आता मी थकलो....तिघंही एकमेकाला घट्ट धरून रहा आयुष्यभर....खूप सुंदर आयुष्य दिलं मला देवानी... तुमच्यासारखी गुणी मुलं दिली....आता मला फक्त तुम्हाला सर्वाना डोळे भरून बघायचं आहे पुढचे काही दिवस......डॉक्टर म्हणतात की, कदाचित महिन्याभराने मी तुम्हाला ओळखणं बंद करीन.असं होईल की मी तुमची नावं, चेहरे, हे घर, हे सर्व विसरून जाईन.....पण मुलांनो त्यावेळी मला माफ करा. जरी माझी नजर तुम्हाला अनोळखी वाटली तरी always remember.... my heart will always recognize you...जरी माझ्या मेंदूनं काम करणं बंद केलं तरी हृदयातून माझं प्रेम कधीच कमी नाही होणार.... ते शेवटपर्यंत तुमच्यासाठीच धडधडत राहील....शेवटच्या दिवसात माझ्यामुळे तुम्हाला खूप त्रास होईल पण, शेवटच्या दिवसातला तुमचा बाप तुम्ही लक्षात ठेऊ नका प्लीज..... एवढ्या वर्षात तुम्ही ज्या निर्भीड आणि हसतमुख बापाला बघितलंय तोच बाप कायम लक्षात ठेवा.... आणि मी इथं नसलो तरी.. जिथ कुठ असेन तिथून तुमच्याकडं बघत राहीन आणि माझे आशीर्वाद कायम तुमच्या बरोबर राहतील....
सर सहा वर्षांपूर्वी मी रिचीला तुमच्याकडे घेऊन आले होते , त्यावेळी मी फक्त हाऊस वाईफ होते. पण रिचीची संसाराची तळमळ बघून मी जॉबला लागले. नशिबाने देवानं मला बॅक टू बॅक प्रमोशन दिली. रिचीची तडफड मला बघवत नव्हती. त्याला मुलांच्या पुढच्या आयुष्याच्या खर्चासाठी पैसे जोडून ठेवायचे होते. त्याला पण जाताना गिल्ट राहू नये म्हणून गेल्या पाच सहा वर्षात मी पण खूप धडपडले सर.... पैशाला पैसा जोडला.
माझी मुलं पण अचानक मोठी झाली सर.... ज्या दिवशी रिचीचं ऑपरेशन झालं, त्या दिवशीपासून माझ्या दोन्ही मुलांचं बालपणच संपलं....माझा मुलगा आधी खूप हट्टी होता. रोज त्याचे नवनवीन हट्ट असायचे. कधी शूज पाहिजेत, कधी जॅकेट पाहिजे तर कधी पिकनिक. मुलीच पण तसंच होतं भैयाला काहीपण आणलं की ते तीला पण पाहिजेच असायचं. पण गेल्या पाच वर्षात त्यांनी कधीच कुठलीच गोष्ट मागितली नाही सर....मुलगा तर खूपच मोठा झाल्यासारखं वागतो. आता कॉलेजच्या सेकंड ईयरला आहे पण आत्ताच पार्ट टाइम जॉबला लागतोय. क्रिकेट खूप छान खेळायचा तो... रिचीला तर त्याच्यावर खूप कॉन्फिडन्स होता की तो चांगला नॅशनल लेवल चा क्रिकेटर होईल म्हणून पण ऑपेरेशन झाल्या दिवसापासून त्याची प्रॅक्टिस सुटली...तुम्ही बघितला ना त्याला सर, किती स्टायलिश आहे तो. त्याच्याकडे बघून कोणाला वाटेल का, की हा घरी वडिलांना आंघोळ घालत असेल, वॉशरूमला घेऊन जात असेल,हात पाय दाबून देत असेल...
दीदींच तर पूर्ण जगच बदललंय.ती आता बारावीला आहे. मेडिकल एंट्रन्स ची तयारी चालू आहे तिची . आजपर्यंत प्रत्येक छोटीमोठी गोष्ट घरी येऊन रिचीला सांगायची ती. प्रत्येक डिसिजन मधे तीला रिचीचं ओपिनियन लागायचं.आता मात्र बिचारी उगीचच रिचीच्या आजूबाजूला घुटमळत राहते. त्याला नवनवीन पदार्थ बनवून खायला घालते, स्टोरीज आणि जोक्स वाचून दाखवते.तासंतास देवासमोर बसून राहते.... अचानकच मोठी झाली आमची मुलं......त्यांचं बालपण आम्हाला हिरावून घ्यायचं नव्हतं... पण परिस्थिती पुढे आमचं काहीच चाललं नाही. तुमच्याकडे आलो त्यावेळी आमची आर्थिक घडी पूर्ण विस्कटलेली होती,पण गेली सहा वर्ष आम्ही धडपडून आर्थिक घडी नीट बसवली. त्यामुळे रिचीला आता एवढं समाधान तरी आहे की, तो गेल्यानंतर मुलं उघड्यावर नाही येणार. तो त्यावेळीच गेला असता किंवा त्याची मेमरी गेली असती तर आम्ही अक्षरशः रस्त्यावर आलो असतो. ही सहा वर्षे आम्हाला तुमच्यामुळे बोनस मिळाली. देवावर खूप नाराजी होती पण सुदैवानं तुम्ही भेटला....हे पण काही कमी नाही....'
'पण आता शेवटची स्टेज आली आहे सर...आता मला एक सर्टिफिकेट हवं आहे तुमच्याकडून. मला पुढचे दोन महिने सुट्टी घ्यायची आहे त्यासाठी मला ते ऑफिसमध्ये सबमिट करायचे आहे. मी तिला म्हणालो,' पण आत्ताच सुट्टी घेतली तर त्याच्या शेवटच्या क्षणी कस काय करणार? त्यावेळी सुट्टी देईल का कंपनी?' मार्था म्हणाली, 'सर कंपनी मला त्यावेळेस सुट्टी देणार की नाही माहित नाही... पण मी मॅक्सिमम दीड दोन महिनेच सुट्टी घेऊ शकते. नाहीतर माझा जॉब जाईल. पण ते दीड दोन महिने मला आत्ताच वापरायचे आहेत....कारणकी, अजून रिची आम्हाला सगळ्यांना ओळखतो आहे.तो जोपर्यंत चांगल्या स्थितीत आहे तोपर्यंत मला त्याच्या बरोबर राहायचं आहे.... संसारासाठी खूप धडपडला तो. आता मला त्याचे सगळे लाड पुरवायचे आहेत... एवढ्या वर्षाच्या धडपडीत तो स्वतःसाठी कधीच जगला नाही...खूप नशीबवान आहे मी की असा नवरा मिळाला...ह्या दीड दोन महिन्यात जे ही क्षण आम्ही एकत्र घालवू तेच क्षण आम्हाला पुढे आयुष्यभर पुरवायचे आहेत.त्यामुळ या पुढचा प्रत्येक क्षण हृदयात साठवायचाय आम्हाला..... एवढं बोलून तिचा हुंदका दाटून आला.... डोळ्यात अडवलेलं पाणी घळाघळा व्हायला लागलं...थोडा वेळ ती शांतपणे रडत राहिली.....पूर्ण रडून झाल्यावर तिनं डोळे पुसले आणि उठून उभी राहिली. चेहऱ्यावरती एक समाधान होतं आणि डोळ्यात एक वेगळाच निर्धार होता. आता ती तयार होती स्वतःच्या मुलांसाठी आणि नवऱ्यासाठी, पूर्ण जगाशी लढायला!
गेल्या सात-आठ वर्षात माझ्या ओपीडी मध्ये एवढे पाणवलेले डोळे बघितले आहेत आणि एवढे विचित्र क्षण अनुभवलेले आहेत की आता मला आता त्याची सवय झाली आहे. किती विचित्र आयुष्य आहे खरंच.आपण आयुष्यभर एका वेगळ्याच धावपट्टीवर धावत राहतो. गाडी पाहिजे,बंगला पाहिजे मग अजून एक फ्लॅट पाहिजे. पण नीयतीच्या मनामध्ये वेगळाच डाव चालू असतो आणि नीयती तो डावं अचानक टाकते.आपण ज्यावेळी चांगल्या स्थितीत असतो, त्यावेळी आपण कधी कल्पनाही नाही करू शकत की, आपल्यावर कधी अशीही वेळ येऊ शकते की, जगण्यासाठी एक एक दिवस पण उधार मागावा लागेल!आणि ज्यावेळी तो क्षण येतो त्यावेळी समजतं की आजपर्यंत आपण ज्या गोष्टीसाठी धडपड करत होतो त्या गोष्टींच आता काहीच मूल्य नाही!!
मी तिला सर्टिफिकेट दिलं. मी लिहीलं,
Her husband is diagnosed with advanced stage of brain cancer and HE NEEDS assistance for routine activities......पण अश्या बऱ्याच गोष्टी होत्या,ज्या त्या सर्टिफिकेटच्या चार ओळींमध्ये मी लिहू शकत नव्हतो. पण मला लिहायच होतं की,
HE ALSO NEEDS..to see his children grow...
HE ALSO NEEDS... to see his son's first salary in his trembling hands.....
HE ALSO NEEDS... to walk his daughter to her wedding....
HE ALSO NEEDS...to see the silver replace the black in his wifes hair .....
HE ALSO NEEDS..... to tell his stories to his grandchildren....
Its unfair to him... and
HE NEEDS... FEW MORE DAYS OF LIFE..........

डॉ. प्रविण तुकाराम सुरवशे.
कन्सल्टन्ट नुरोसर्जन
पुणे.
फोन नं. 7738120060

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