Tatva Chintamani

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11/04/2021

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11/04/2021

॥ श्रीहरिः ।॥

सम्पादकका निवेदन

सत्य-सुखके विधातक जड़वादके इस विकास-युगमें, जहाँ ईस्वर और ईश्वरीय चर्चाको व्यर्थ बतलाने के माननेका दुःसाहस किया जा रहा है, जहाँ परलोकका सिद्धान्त कल्पना-प्रसूत समझा जाता है, जहाँ जञान-वैग भक्तिकी बातोंको अनावश्यक और देख-जातिकी उन्रतिमें प्रतिबन्धकरूप बतलाया जाता है, जहां भौतिक उन्नतिक ही मनुष्य-जीवनका परम ध्येय समझा जाने लगा है, जहाँ केवल इन्द्रिय-सुख ही परम सुख माना जाता है और यह प्रायः समूचा साहित्य-क्षेत्र जड़-उन्नतिके विधायक ग्रन्थों, मौज-शौकके उपन्यासों और गल्पों एवं कुरुचि-उत्पादर शब्दाडम्बरपूर्ण कविताओंकी बाढ़से बहा जाता है, वहाँ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य ओर निष्काम कर्मयोग-विषक् तात्त्विक विषयोंकी पुस्तकसे सबको सन्तोष होना बहुत ही कठिन है तथापि गत तीन वर्षोंके अनुभवसे मुझे यह पत लगा है कि नास्तिकताकी इस प्रवल आँधीके आनेपर भी ऋषि-मुनि-सेवित पुण्यभूमि भारतके सुदढ़ मूल आध्यात्मिक सघन छायायुक्त विशाल तरुवरकी जड़ें अभी नहीं हिली हैं और उनका हिलना भी बहुत ही कठिन मालूम होता है। इस समय भी भारतके आध्यात्मिक जगत्में सच्चे जिज्ञासुओं और साधुस्वभावके मुमुक्षुओंका अस्तित्व है, यद्यपि उनकी संख्या घट गयी है। इस अवस्थामें यह आशा करना अयुक्त नहीं होगा कि इस सरल भाषामें लिखी हुई त्पूर्ण पुस्तकका अच्छा आदर होगा और लोग इससे विशेष लाभ उठावेंगे।

निवेदनप्रस्तुत ग्रन्थ-तत्वचिन्तामणि-गीताप्रेस तथा कल्याण' के संस्थापक ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाका है।...
11/04/2021

निवेदन

प्रस्तुत ग्रन्थ-तत्वचिन्तामणि-गीताप्रेस तथा कल्याण' के संस्थापक ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाका है। उनके द्वारा गौताप्रेसकी स्थापनाके मूल में गीताशास्त्रकी मूल प्रेरणाके अनुसार ' श्रीमद्भगवद्रीता' के सार्वभौम लोक-कल्याणकारी सिद्धान्तोंको जन-जनतक पहुंचाना ही निहित उद्देश्य और 'गीता-प्रचार' (गीताको सर्वजन-सुलभ बनाना, घर-घर, द्वार-द्वारमें प्रवेश करा देना ) ही उनका एकमात्र और सर्वोपरि जीवन-व्रत था; जिसके लिये आपने जीवनपर्यन्त अथक प्रयास किया।

यह बृहत् ग्रन्थ पहले 'तत्त्वचिन्तामणि' नामसे पुस्तकाकार कुल सात भागोंमें प्रकाशित हुआ था। वे सातों भाग अभी कुछ वर्षों पहले ही पुस्तकाकार अलग-अलग नामोंसे कुल तेरह भागोंमें भी पाठकोंके सुविधार्थ प्रकाशित हो चुके हैं। ये सभी अय अलगसे भी पुस्तकरूपमें उपलब्ध हैं प्रेमी पाठकों और जिज्ञासुओंके मनन-अनुशीलनकी सुविधाको ध्यान में रखकर उन्हीं सात भागोंकी सम्पूर्ण विषय-सामग्रीको एकस्थानीय करनेकी दृष्टिसे 'तत्वचिन्तामणि' पूर्व नामसे ही अब उसे ग्रन्थाकारमें प्रकाशित किया गया है; जिसे सहदय पाठकों और समस्त भगवत्रेमी महानुभावोंकी सेवामें अर्पित करते हुए हमें सात्त्विक आनन्द-भावकी अनुभूति हो रही है।

सभी से हमारा यह विनीत अनुरोध है कि वे कम-से कम एक बार इस ग्रन्थको मनोयोगपूर्वक अवश्य पढ़ें और अपने परिजन तथा मित्रोंको भी पढ़नेके लिये प्रेरित करें।

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