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07/02/2026

Kagaj ki yah kaya...

कारवां जो साधकों का बढ़ चला वो रुके नहीं,साधना का क्रम हमारा अब कभी टूटे  नहीं lLetd Meditate, enjoy uour being.
22/01/2026

कारवां जो साधकों का बढ़ चला वो रुके नहीं,
साधना का क्रम हमारा अब कभी टूटे नहीं l

Letd Meditate, enjoy uour being.

Jay Adinath Let's Meditate in veetrag mudra.May we all live in peace and harmony,may we all spreading the same. Wishing ...
15/01/2026

Jay Adinath

Let's Meditate in veetrag mudra.
May we all live in peace and harmony,may we all spreading the same. Wishing upu all a peaceful and prosperous day.

इस युग के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के पुत्र एवं इस युग के प्रथम चक्रवर्ती राजा भारत का नाम सब ने सुना ही होगा जिनके न...
14/01/2026

इस युग के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के पुत्र एवं इस युग के प्रथम चक्रवर्ती राजा भारत का नाम सब ने सुना ही होगा जिनके नाम से आज यह भारत देश जाना जाता है l

जैन आगम ग्रंथों में कर्क संक्रांति के दौरान भरत चक्रवर्ती सूर्ययान में अकृत्रिम जिन बिम्ब के दर्शन वंदन करते हैं, क्यूंकि उस दौरान सूर्य पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है l संभवत: मकर संक्रांति के दिन भी वे ऐसा करते होंगे l

जैन दर्शन के अनुसार भरत चक्रवर्ती के आंखों से देखने की क्षमता लगभग 47000 योजन से अधिक या उसके आसपास अर्थात 13 करोड़ मिल के उपर या उसके आसपास) की दूरी तक देखने की होती है l

जैन आगम ग्रंथों (जैसे त्रिलोकसार, नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती द्वारा) में कर्क संक्रांति के दिन भरत चक्रवर्ती के सूर्ययान (सूर्य विमान) में अकृत्रिम जिनबिंब दर्शन का स्पष्ट उल्लेख है, क्योंकि तब सूर्य पृथ्वी के सबसे निकट होता है।

मकर संक्रांति के लिए आगमों में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन लोक मान्यता और जैन परंपरा इसे संभावित मानती है—सूर्य के उत्तरायण प्रवेश पर भी दर्शन संभव, क्योंकि भरत चक्रवर्ती की दृष्टि क्षमता 47,000 योजन (लगभग 60,000 किमी या 13 करोड़ मीटर ऊपर) तक थी।

आगम प्रमाण
त्रिलोकसार गाथा 389-391 में कर्क संक्रांति का वर्णन है: भरत अपने षड्खंड महल से सूर्य में जिनालय और अर्हंत बिंबों का वंदन करते हैं।

मकर संक्रांति को कुछ जैन आचार्य (जैसे सुधासागरजी) विस्तार देते हैं, पर आगम सीमित है।

# # दृष्टि क्षमता
जैन दर्शन में चक्रवर्ती की दृष्टि "क्षीरसागर पार" तक (47,000 योजन ≈ 59,200 किमी व्यास) थी, जो सूर्य विमान (लोकालोक पर्वत से परे) तक पहुँचती थी। यह उनकी लैणिक शक्ति से संभव।

ज्ञानियों से सन आई पड़ी बातों के आधार पर यह पोस्ट किया गया है फिर भी निश्चय में जिनवाणी के विरुद्ध कुछ कहा हो या कोई त्रुटि हुई है तो मन वचन काया से क्षमा याचना और मिच्छामी दुक्कडम l

The secret of Mahavir's spiritual practice may be stated in one phrase - "only knowing, only seeing". That is the starti...
08/01/2026

The secret of Mahavir's spiritual practice may be stated in one phrase - "only knowing, only seeing". That is the starting point of spiritual practice, also its consummation.The art of seeing lies in being free from attachment and delusion.
~Acharya Mahapragya

श्रेष्ठ कौन ?--------------अभयकुमार - भंते ! आप भिक्षु को श्रेष्ठ मानते हैं या गृहस्थ को ?महावीर - मैं संयम को श्रेष्ठ म...
06/01/2026

श्रेष्ठ कौन ?
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अभयकुमार - भंते ! आप भिक्षु को श्रेष्ठ मानते हैं या गृहस्थ को ?
महावीर - मैं संयम को श्रेष्ठ मानता हूं |
संयमरत गृहस्थ और भिक्षु दोनों ही श्रेष्ठ हैं और असंयम रत गृहस्थ और भिक्षु दोनों ही श्रेष्ठ नहीं है |

Who is the best ?

Abhayakumar Asks to Mahavira - My Lord! Do you consider the monk is highest good or the householder?

Mahavira - I consider abstemiousness as highest good. Both gentlemen and monks are excellent but the incontroverted householder and monk are not the best.

"एक क्षण का सच्चा ध्यान अनंत शांति देता है  l आचार्य शिवमुनि
05/01/2026

"एक क्षण का सच्चा ध्यान अनंत शांति देता है l आचार्य शिवमुनि

ध्यान जीवन का आधार है, भोग नहीं। आचार्य विद्यासागर
05/01/2026

ध्यान जीवन का आधार है, भोग नहीं। आचार्य विद्यासागर

"भीतर की आराधना-ध्यान से अद्भुत शक्ति जागृत होती है; घंटों ध्यान से दिव्य अनुभूति होती है।" आचार्य कलापूर्ण
05/01/2026

"भीतर की आराधना-ध्यान से अद्भुत शक्ति जागृत होती है; घंटों ध्यान से दिव्य अनुभूति होती है।" आचार्य कलापूर्ण

Is jineahwar the source of yoga and meditation ?? Please share your view point on comment.
05/01/2026

Is jineahwar the source of yoga and meditation ?? Please share your view point on comment.

ध्यान काल के चरमसुख में दिगंबर,श्वेतांबर अर्थात सभी पथ, संत, मत, धर्म, जाति भेद आदी सब कुछ धूमिल हो जाता है, बचता है सिर...
04/01/2026

ध्यान काल के चरमसुख में दिगंबर,श्वेतांबर अर्थात सभी पथ, संत, मत, धर्म, जाति भेद आदी सब कुछ धूमिल हो जाता है, बचता है सिर्फ सिद्ध बुद्ध मुक्त चैतन्य स्वरूप आत्मा, जिसे जिन भी कहते हैं l

इसलिए क्रिया कांड के साथ ध्यान को सबसे अधिक मह्त्व दो l क्यूंकि ध्यान के जुड़ने से क्रियाकांड अधिक फलदायी होते हैं l

इस तनाव पूर्ण जीवन में ध्यान का अभ्यास नियमित रूप से करे, यह जैन ध्यान की पद्धतियां बहुत ही सरल और सम्यक है l

अगर ध्यान सीखना है तो Instagram पर डायरेक्ट मेसेज करिये,जितने अधिक लोग होंगे उस हिसाब से आपके क्षेत्र में शिविर लगाएंगे l

Bhagvan from जैसलमेर मंदिर l
03/01/2026

Bhagvan from जैसलमेर मंदिर l

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