09/05/2026
दैनिक सत्ताजगत, जयपुर समाचार पत्र में दिनांक 08.05.2026 को प्रकाशित लेख - युवाओं में डिजिटल सेल्फ-हार्म का बढ़ता ख़तरनाक ट्रेंड
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जोश और उमंग से भरे दौर में किसी भी युवा को घायल अवस्था में देखना हमेशा पीड़ादायक होता है लेकिन उससे भी अधिक भयावह वह क्षण है जब कोई किशोर अस्पताल या सड़क पर नहीं बल्कि अपने कमरे में बैठकर अपने दर्द, आत्म-क्षति या आत्महत्या के प्रयास का वीडियो रिकॉर्ड करता है और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर देता है। कैमरा चालू होता है, वीडियो पोस्ट होता है और फिर शुरू होता है लाइक्स, कमेंट्स और इमोजी का सिलसिला। स्क्रीन के उस पार की ख़ामोशी में एक युवा इंतज़ार और उम्मीद कर रहा होता है शायद कोई उसकी तकलीफ़ को सचमुच देख-सुन-समझ ले।
वर्तमान समय में इस प्रकार की घटनाएं अब कोई दुर्लभ समस्या नहीं रह गई है बल्कि एक उभरती हुई जन स्वास्थ्य समस्या का रूप ले चुकी है। भारत सहित पूरी दुनिया में बड़ी संख्या में युवा अपने मानसिक तनाव, आत्म-क्षति, भावनात्मक दर्द और यहाँ तक कि आत्महत्या के प्रयासों तक को सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं। इसे केवल “ध्यान आकर्षित करने की कोशिश” कह देना वास्तविक संकट को नज़रअंदाज़ करना होगा। ऐसे हर वीडियो के पीछे सिर्फ ध्यान खींचने की चाहत नहीं बल्कि एकाकीपन, अनुपचारित मानसिक बीमारी, एल्गोरिदम का शोषण और एक ऐसी डिजिटल संस्कृति का दुखद संगम है जो पीड़ा को दृश्यता से पुरस्कृत कर रही है। भावनाओं को दिखाने और बेचने का बड़ा बाज़ार तैयार है जहाँ पीडाएं अब “एंगेजमेंट” और “कंटेंट” का रूप लेकर बिक रही है और इस बाज़ार में के मायाजाल में किशोर और युवा वर्ग लगातार फंसते जा रहे है।
भारत सरकार के अपने आँकड़े इस ओर तत्काल ध्यान की माँग करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में वर्ष 2023 में 1,71,418 आत्महत्याएँ दर्ज की गईं और आजादी के बाद छात्र आत्महत्याएँ अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गईं। देश में आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों में 15 से 30 वर्ष के युवाओं की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत से अधिक है जो कि भयावह तस्वीर पेश कर रहा है। ये मौतें किसी शून्य में नहीं बल्कि शोर के बीच उपजे सन्नाटे में हो रही है जिन्हें नजरअंदाज़ करना भारी त्रासदी उत्त्पन कर सकता है। यह स्थिति चिंताजनक इसलिए भी है क्यूंकि देश इस समय इतिहास के सबसे तीव्र डिजिटल विस्तार से गुजर रहा है और ये तेजी से बढ़ता डिजिटल वर्ल्ड और सुसाइड, यह दोनों ट्रेंड एक दूसरे से असंबंधित नहीं हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने भी चेतावनी दी है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया की लत और डिजिटल निर्भरता अब गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुके हैं। आज लगभग हर किशोर के हाथ में स्मार्टफोन है। इंटरनेट और सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे वे अब पहचान, स्वीकार्यता, सामाजिक तुलना और भावनात्मक सहारे के केंद्र बन गए हैं।
तेजी से बदलते समाज, परिवार और आस-पास के वातावरण से सामंजस्य बिठाने में आज का युवा अपने आप को असक्षम महसूस कर रहा है। उसकी निर्णय लेने और उचित-अनुचित में भेद करने की क्षमता क्षीण होती जा रही है। वर्तमान दौर में घरों में संवाद कम हो रहे है, अधिकतर स्कूल और कॉलेज आज केवल शैक्षणिक प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गए है, रिश्ते टूटने लगें है और इंसान के भीतर का दर्द लगातार अनसुना रहता जा रहा है, ऐसी परिस्थितियों और मनोस्थिति में आज इंटरनेट ही कई युवाओं का “एकमात्र श्रोता” बनता जा रहा है। ऐसे में दर्द को ऑनलाइन पोस्ट करना मदद की एक खामोश पुकार बनती जा रही है। कई बार आत्म-क्षति का वीडियो मृत्यु की इच्छा नहीं बल्कि यह एक तीव्र पुकार या संदेश होता है कि “कृपया मुझे देखिए, मुझे सुनिए, मुझे समझिए।” सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस संकट में केवल निष्क्रिय दर्शक नहीं हैं। उनके एल्गोरिद्म ऐसे कंटेंट को अधिक बढ़ावा देते हैं जो भावनात्मक रूप से तीव्र हो क्योंकि वही अधिक “एंगेजमेंट” लाता है। उदासी, दुःख, डर, गुस्सा और पीड़ा सब डिजिटल बाजार में उपभोग की वस्तु बन चुके हैं। एक परेशान किशोर यदि दुख या अवसाद से जुड़ा कंटेंट देखना शुरू करे तो कुछ ही समय में वह आत्म-क्षति और निराशा से भरे वीडियो के अंतहीन चक्र में फँस सकता है।
विभिन्न शोध इस बात की पुष्टि करते है कि भावनात्मक दुःख, शोक, आक्रोश उपयोगकर्ताओं को घंटों स्क्रीन से बाँधे रखती है। आर्थिक सर्वेक्षण ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया की लत कम आत्मसम्मान, साइबरबुलिंग और अवसाद से जुड़ी है और डोपामिन-संचालित प्लेटफॉर्म विशेष रूप से 15 से 30 आयु वर्ग की मनोवैज्ञानिक कमजोरियों को निशाना बनाते हैं। अनुसंधान बताते हैं कि आत्महत्या या आत्म-क्षति से जुड़े कंटेंट को बार-बार देखना मानसिक रूप से संवेदनशील युवाओं में “कॉपीकैट व्यवहार” को बढ़ावा दे सकता है।परिणामस्वरुप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर डिजिटल सेल्फ-हार्म के वीडियो की बाढ़-सी आई हुई है जो कि एक बेहद ही खतरनाक ट्रेंड को बढ़ावा दे रहा है। इसके बावजूद देश में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बेहद सीमित है। चेतावनी संदेश और हेल्पलाइन दिखा देना पर्याप्त नहीं है। जब तक कानून की पालना सख्ती से लागू नहीं होती ऐसे कंटेंट पर रोक लगना बेहद मुश्किल है।
समस्या केवल तकनीक की नहीं, समाज की भी है। हमने बच्चों और युवाओं पर प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाओं और तुलना का इतना दबाव डाल दिया है कि वे भीतर ही भीतर टूट रहे हैं। दुखद यह है कि हम अक्सर उनकी भावनात्मक पीड़ा को “ड्रामा”, “कमज़ोरी” या “ओवररिएक्शन” कहकर टाल देते हैं और यही पर हम उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नजरअंदाज़ कर देते है जिसके भयावाह परिणाम आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास के रूप में देखने-सुनने को मिल रहे है। अब समय आ गया है कि भारत केवल “डिजिटल एक्सेस” नहीं, बल्कि “डिजिटल वेलबीइंग” की बात करे। स्कूलों में मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य शिक्षा और डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। माता-पिता और शिक्षकों को पीटीएम में मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षणों की पहचान और उसके उपाय के लिए प्रशिक्षित किया जाए। मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ छोटे शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों और समुदाय तक पहुँचानी होगी तथा सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बच्चों और युवाओं की सुरक्षा के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह बनाना होगा। क्योंकि हर दिन इस देश में कहीं न कहीं कोई युवा अपना दर्द रिकॉर्ड करके "अपलोड" कर रहा है इस उम्मीद में कि शायद इस बार कोई उसकी खामोश चीख सुन ले। समय की माँग है कि हम युवाओं की बात समानुभूति और गैर-आलोचनात्मक तरीके से सुनें तभी इस खतरनाक ट्रेंड पर रोक लग सकेगी और देश के युवाओं को मानसिक संबल और सुरक्षा मिल सकेगी जिसके वे हकदार हैं।
(यह लेखक के निजी विचार है)