20/12/2023
क्या व्यवसाय में या रोजी-रोटी कमाने के किसी भी कार्य में एक्टिंग या अभिनय का विशेष योगदान हो सकता है?
सुनने में अजीब लगता है। आइए चर्चा करते हैं।
हर आदमी अपने जीवन में सफल होना चाहता है लेकिन सफलता सबको नहीं मिलती या अपेक्षित नहीं मिलती। क्यों नहीं मिलती । इसके बारे में बहुत तरह की चर्चाएं चलती हैं। सब अपने कार्य की सफलता या असफलता को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करते हैं।
किसी भी संदेश को कहानी के माध्यम से कहने पर वह रोचक भी होता है और जनसाधारण को आकर्षित भी करता है लेकिन ऐसी क्षमता ईश्वर ने बहुत कम लोगों को दी है कि वह किसी सिद्धांत पर भी बात करें, तार्किक रूप से बात करें और उसको कहानी की शक्ल दे दे फिलहाल साधारण भाषा में ही चर्चा करते हैं।
किसी भी कार्य को सफलता से करने के लिए अभिनय करने का अभ्यास होना चाहिए और स्वयं को हर समय अभिनय के लिए तैयार रखना चाहिए। इस बात का एहसास भी होना चाहिए कि मैं यह अभिनय कर रहा हूं । जो कि इस कार्य की सफलता के लिए आवश्यक है। यह मैं नहीं हूं न तो यह मेरा स्वभाव है। लेकिन कार्य की सफलता के लिए यही आवश्यक है । क्योंकि संसार में जिस जिस कार्य के लिए जहां-जहां पर जैसा-जैसा अभिनय करना होता है वही करना चाहिए उसी से सफलता मिलती है। एक अध्यापक को ,एक डॉक्टर को, एक विद्यार्थी को, एक सेल्समैन को, एक दुकानदार को, एक नेता को, एक अधिकारी को या किसी भी विभाग के अध्यक्ष को या प्रभारी को लोगों से बात करने में और अपने काम को अंजाम देने में अलग-अलग तरह की भूमिका निभानी पड़ती है। उसके लिए अपने आप को अलग-अलग तरह से प्रेजेंट करना पड़ता है। यह अभिनय ही है।
जिस तरह से अच्छा अभिनेता अच्छे अभिनय को करने के लिए उस विषय की पूरी जानकारी भी हासिल करता है और पूरी कोशिश भी करता है कई बार तो बार बार अभ्यास करता है ताकि अभिनय वास्तविक लगे।
यहां पर यह कहना उपयुक्त होगा कि प्रायः लोग अभिनेताओं की सफलता और प्रसिद्धि से ईर्ष्या करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने तो खाली अभिनय किया। क्यों ना हम भी इसी अभिनय को किसी हद तक करके देखें।फिर परिणाम देखें।
इसी तरह से अन्य क्षेत्रों में जहां पर जिस प्रकार का अभिनय करना हो। उसी प्रकार की जानकारी प्राप्त करके बिल्कुल वास्तविक लगने वाला अभिनय करना चाहिए और इसको अभिनय मानने में ही सबसे ज्यादा आसानी है ।
क्योंकि मनुष्य का जो मूल स्वभाव है उससे हटकर उसे बहुत सारे कार्य करने होते हैं। तो ऐसा कार्य करते समय उसको कोफ्त होती है। कष्ट होता है ,मानसिक कष्ट होता है इससे बचने का यही तरीका है। समाज में, बाजार में आगे बढ़ने के लिए अभिनय करना ही पड़ेगा और उसको अभिनय मानना चाहिए यह मानना चाहिए कि मैं इससे अलग हूं मेरा व्यक्तित्व अलग है। लेकिन इस कार्य की ऐसी जरूरत है। कि मुझे यह अभिनय करना जरूरी है और ऐसा अभिनय करना जरूरी है कि वह वास्तविक लगे।
वास्तव में सुबह से शाम तक घर के अंदर भी तरह-तरह की भूमिकाएं निभाने के लिए तरह-तरह के अभिनय करने पड़ते हैं। माता-पिता के साथ दूसरी तरह का अभिनय, पत्नी के साथ अलग, बच्चों के साथ अलग, दोस्तों के साथ अलग तरह का अभिनय अपने कर्मचारियों के साथ अलग अभिनय, अपने बास या अधिकारी या सीनियर के सामने अलग तरह का, रिश्तेदारों के सामने अलग तरह का अभिनय।
कहने का तात्पर्य यह है कि अभिनय तो हमें करना ही है प्राय जो अभिनय हमें अपनी रोजी-रोटी से संबंधित या मुख्य कार्य से संबंधित करने होते हैं। वहीं पर कभी-कभी मन में यह भाव आता है कि मैं मजबूरी में यह सब कर रहा हूं। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता है।
मेरा स्वभाव ऐसा नहीं है।
सबसे ज्यादा जरूरी भी रोजी-रोटी से संबंधित कार्य ही होता है। जबकि पारिवारिक सामाजिक कार्यों में जो अभिनय करना पड़ता है। प्रायः उसको हम खुशी से करते हैं। इससे साबित होता है। कि अभिनय तो हम करते ही हैं अभिनय करने की क्षमता भी है। सिर्फ मन से करने और मन से न करने का सवाल है। उदाहरण के लिए अपने अतिथि या मित्र के सामने हमारा व्यवहार बहुत अच्छा होता है जबकि अपने ग्राहक या कर्मचारी से रूखा या उदासीन व्यवहार हो सकता है जो कि हानिकारक है। मित्र का फोन आने पर वाणी में उत्साह होता है। जबकि ग्राहक या कर्मचारी का फोन आने पर उतना उत्साह नहीं भी हो सकता है। इसी तरह से हम मित्र या अन्य व्यक्ति के द्वारा कोई मदद मिलने पर भरपूर धन्यवाद देते हैं जबकि घर में माता-पिता पति /पत्नी बच्चों को धन्यवाद देने या उनकी तारीफ करने में कंजूसी करते हैं।
मुख्य कार्य में मन से अभिनय न करने के कारण हम लोग प्राय पीछे रह जाते हैं। अपने काम में पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं करते और प्राय मुख्य कार्य में मानसिक रूप से प्रसन्न नहीं रहते हैं।
(अक्सर लोग बात करते हैं कि इस समय काम की नहीं मनोरंजन की बात करेंगे या यह काम का समय नहीं है मनोरंजन का है अर्थात काम और मनोरंजन अलग-अलग है जबकि दोनों एक में ही होने चाहिए)
मुझे लगता है कि अगर अपना दृष्टिकोण इस प्रकार से बदल लिया जाए कि यह मेरा मुख्य कार्य है इसमें भी अभिनय करना ही है जिसको कि मैं पूरे मन से करूंगा और इसके लिए जो भी सीखना होगा वह भी सीखूंगा करते समय यह भी एहसास रखूंगा कि मेरे मूल स्वभाव से भिन्न है लेकिन जरूरी है और यही मेरी काबिलियत और योग्यता भी है कि मैं अपने मूल स्वभाव से अलग कार्य को खुशी से कर सकता हूं। जैसे कार सड़क पर दौड़ सकती है लेकिन अगर कीचड़ में भी आसानी से निकल जाए तो उसको अच्छी कार माना जाएगा। कार का मूल स्वभाव है सड़क पर दौड़ना लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति आ सकती है की बारिश के कारण पानी भर जाए या अनजाने रास्ते पर कीचड़ आ जाए ऐसे में अगर कार निकल जाएगी तो लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है और दूसरी तरफ अगर कार ऐसी स्थिति में बिल्कुल नहीं चल पाएगी तो इतनी दूर तक आना भी बेकार हो जाएगा इतना प्रयास भी बेकार हो जाएगा और सफलता भी नहीं मिलेगी।
इसलिए यह स्वीकार करना कि जीवन में हर दिन अभिनय करना जरूरी है। मन लगाकर अभिनय करने से सफलता एवं संतुष्टि में वृद्धि हो सकती है। भारतीय दर्शन भी जीवन को एक नाटक ही मानता है।
हम एक सप्ताह के लिए इस सिद्धांत पर कार्य करके देखें।
कृपया अपनी राय अवश्य व्यक्त करें।