Dr. Som Shekhar Dixit - Shekhar

Dr. Som Shekhar Dixit - Shekhar डॉ सोमशेखर दीक्षित एक ईमानदार एवं परिश्रमी व्यक्ति हैं।

एम्स के प्रोफेसर द्वारा दिया जाएगा फालिज (लकवा) की बीमारी पर लेक्चर आजकल डायबिटीज और बीपी की बीमारियों के कारण फालिज या ...
02/05/2025

एम्स के प्रोफेसर द्वारा दिया जाएगा फालिज (लकवा) की बीमारी पर लेक्चर

आजकल डायबिटीज और बीपी की बीमारियों के कारण फालिज या पक्षाघात या स्ट्रोक के रोगी बढ़ रहे हैं। यह एक गंभीर बीमारी है। जिसमें रोगियों की जान जाने का खतरा भी रहता है । इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि जिन रोगियों का जीवन बच जाता है लेकिन फालिज बनी रहती है। वह हमेशा के लिए विकलांग हो जाते हैं। एक तो वृद्धावस्था ऊपर से पैरालिसिस ।

उनके लिए अपना जीवन दुखमय और भार स्वरूप हो जाता है। क्योंकि आजकल लोगों के पुत्र और परिवार के लोग भी जीविका के लिए प्रायः घर से दूर रहते हैं। ऐसे में वह लोग भी उनकी सेवा और सहायता पर्याप्त रूप से नहीं कर पाते।

इस परेशानी का मुख्य कारण यह नहीं है कि इलाज उपलब्ध नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि इलाज के विषय में और बीमारी के लक्षणों के विषय में लोगों को या तो जानकारी नहीं है। या अधूरी जानकारी है। या गलत जानकारी है अब ,चिकित्सा क्षेत्र में इतना ज्यादा विकास हो जाने के बाद, हार्ट अटैक के लिए लोग काफी सजग हो चुके हैं। सीने में किसी भी प्रकार के दर्द के लिए हार्ट की जांच कराते हैं। लेकिन इसके उलट ब्रेन अटैक या पैरालिसिस जो कि हार्ट अटैक के तरीके से ही होती है। इसके बारे में लोगों को जानकारी बहुत कम है। इस कारण से मरीज या तो दिखाने आते ही नहीं है,या बहुत देर में आते हैं, या झाड़ फूंक कराते हैं। नतीजा यह होता है जहां 100 में कम से कम 90 मरीज ठीक हो सकते हैं वहां 100में 10 का भी ठीक होना मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह होता है। कि जीवन भर के लिए पैरालिसिस को भुगतना पड़ता है ।

लोगों की इस समस्या को ध्यान में रखते हुए शेखर अस्पताल ने इस विषय पर जनता को जागरूक करने के लिए एक सेमिनार या लेक्चर , पैरालिसिस के विषय पर कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट दिल्ली से न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर डॉ सुमित सिंह 3 मई शनिवार को शाम को 5:00 से 7:00 बजे तक अटल सभागार में पैरालिसिस के बारे में उपयोगी जानकारी हिंदी में देंगे। ताकि समाज के सभी वर्गों के लोग इस जानकारी का लाभ उठा सकें।



गौरतलब है कि इस कार्य में शाहजहांपुर के जिलाधिकारी श्री धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने विशेष सहयोग किया है ताकि यह कार्य अच्छी तरह से संपन्न हो सके,जनता तक जानकारी पहुंच सके।

रोगियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण जानकारी (केवल तीन मिनट में)डाक्टरों की नजर में x-ray का भूलता महत्व अनावश्यक जांचों का बढ...
08/01/2025

रोगियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण जानकारी
(केवल तीन मिनट में)

डाक्टरों की नजर में x-ray का भूलता महत्व
अनावश्यक जांचों का बढ़ता महत्व

आजकल जब सब कुछ टेक्नोलॉजी पर आधारित है तो मेडिकल या चिकित्सा में भी इसका महत्व बढ़ गया है। पहले जमाने की तुलना में बहुत सी नई जांचें आ गई है। जिसमें अल्ट्रासाउंड , सीटी स्कैन, एम आर आई स्कैन और पैथोलॉजी में बहुत सारी जांच
हो रही है।

सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण जांच एक्स रे है। जिसने चिकित्सा विज्ञान में एक क्रांति पैदा कर दी थी। जिसके द्वारा शरीर के अंदर देखा जा सकता था। वैसे तो शरीर के सभी अंगों का तरह-तरह से एक्स-रे किया जाता है. लेकिन नई जांचों के कारण शरीर के कई भागों की जांच जैसे कि पेट और सर की जांच सीटी स्कैन और एम आर आई द्वाराअच्छी हो जाती है।
लेकिन एक्स-रे चेस्ट( छाती का एक्स रे )अभी भी एक बहुत महत्वपूर्ण जांच है। क्योंकि इसमें शरीर के दो सबसे महत्वपूर्ण अंग हृदय और फेफड़े दिखाई पड़ते हैं। जिसको कि शरीर का इंजन भी कह सकते हैं।
कोई भी बीमारी हो ,बुखार हो पेट की बीमारी हो, दिमाग की बीमारी हो ,गुर्दे की बीमारी हो, कोई इंफेक्शन हो, दिल की और फेफड़ों की बीमारी हो सभी में एक्स रे जरूरी जांच है क्योंकि दिल और फेफड़े सही काम कर रहे हैं कि नहीं यह जानना जरूरी है , इन पर दूसरे अंगों की बीमारियों का भी असर पड़ता है। ऐसे में एक्स रे चेस्ट न होने से इलाज में बड़ी चूक हो सकती है।
कई बार मरीजों के पास जांचों का गट्ठर होता है लेकिन उसमें एक्स रे चेस्ट नहीं होता।

चूंकि एक्स रे चेस्ट के लिए एक बड़ी मशीन चाहिए होती है। एक्स रे चेस्ट की रिपोर्ट भी आसान नहीं होती। इसलिए एक्स-रे चेस्ट की सुविधा भी कम उपलब्ध होती है। जहां है भी कई बार डिजिटल नहीं होता जो कि जरूरी है।दूसरे जिस चीज का प्रचार बंद हो जाता है। उस पर से लोगों का ध्यान हट जाता है इसीलिए एक्स रे पर से डाक्टरों का और मरीजों का ध्यान हट गया है।

अल्ट्रासाउंड का इतना ज्यादा प्रचार हो गया है। कि मरीज को लगता है कि इसी से सभी बीमारियां पता चल जाएगी। जबकि अल्ट्रासाउंड से 95% मरीजों में केवल गुर्दे और पित्त की पथरी का ही पता चलता है। कभी-कभी पेट में पानी होने का या लीवर में फोड़ा होने का पता चलता है। बाकी बीमारी के दृष्टिकोण से बहुत कुछ पता नहीं चलता।
असलियत में , सेक्स डिटरमिनेशन (गर्भावस्था में लड़का या लड़की) का पता करने के लिए बहुत तेजी से इसका प्रचार किया गया। शुरू में इसको रोकने के लिए कोई कानून भी नहीं था। इसी कारण से अल्ट्रासाउंड का प्रचार बहुत बढ़ गया और मरीज अब इसी को सबसे जरूरी जांच समझने लगे हैं। कभी कभी डॉक्टर लोग जिनके पास अल्ट्रासाउंड होता है। सांस फूलने वाले मरीज का भी अल्ट्रासाउंड करते हैं। एक्स रे नहीं करते।
अल्ट्रासाउंड का प्रचार बढ़ाने के साथ ही , एक्स रे का प्रचार अपने आप कम हो गया। अब तो डिजिटल एक्सरे आ गया है पहले एक्स रे करना भी बहुत झंझट का काम था। पुराने जमाने के फोटो की तरह फिल्म को डेवलप करना पड़ता था। इसलिए डॉक्टर लोग भी अक्सर एक्स रे नहीं लगाते हैं।

मरीजों को स्वयं जागरूक होकर अपनी बीमारियों में एक्स रे चेस्ट की मांग करनी चाहिए अगर एक्स रे नॉर्मल भी है। तो भी बहुत कम खर्चे में मोटे तौर से दिल और फेफड़ों का हाल पता चल जाता है। जो कि शरीर के जीवन का मुख्य आधार है।

क्या व्यवसाय में या रोजी-रोटी कमाने के किसी भी कार्य में एक्टिंग या अभिनय का विशेष योगदान हो सकता है?सुनने में अजीब लगता...
20/12/2023

क्या व्यवसाय में या रोजी-रोटी कमाने के किसी भी कार्य में एक्टिंग या अभिनय का विशेष योगदान हो सकता है?

सुनने में अजीब लगता है। आइए चर्चा करते हैं।

हर आदमी अपने जीवन में सफल होना चाहता है लेकिन सफलता सबको नहीं मिलती या अपेक्षित नहीं मिलती। क्यों नहीं मिलती । इसके बारे में बहुत तरह की चर्चाएं चलती हैं। सब अपने कार्य की सफलता या असफलता को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करते हैं।

किसी भी संदेश को कहानी के माध्यम से कहने पर वह रोचक भी होता है और जनसाधारण को आकर्षित भी करता है लेकिन ऐसी क्षमता ईश्वर ने बहुत कम लोगों को दी है कि वह किसी सिद्धांत पर भी बात करें, तार्किक रूप से बात करें और उसको कहानी की शक्ल दे दे फिलहाल साधारण भाषा में ही चर्चा करते हैं।

किसी भी कार्य को सफलता से करने के लिए अभिनय करने का अभ्यास होना चाहिए और स्वयं को हर समय अभिनय के लिए तैयार रखना चाहिए। इस बात का एहसास भी होना चाहिए कि मैं यह अभिनय कर रहा हूं । जो कि इस कार्य की सफलता के लिए आवश्यक है। यह मैं नहीं हूं न तो यह मेरा स्वभाव है। लेकिन कार्य की सफलता के लिए यही आवश्यक है । क्योंकि संसार में जिस जिस कार्य के लिए जहां-जहां पर जैसा-जैसा अभिनय करना होता है वही करना चाहिए उसी से सफलता मिलती है। एक अध्यापक को ,एक डॉक्टर को, एक विद्यार्थी को, एक सेल्समैन को, एक दुकानदार को, एक नेता को, एक अधिकारी को या किसी भी विभाग के अध्यक्ष को या प्रभारी को लोगों से बात करने में और अपने काम को अंजाम देने में अलग-अलग तरह की भूमिका निभानी पड़ती है। उसके लिए अपने आप को अलग-अलग तरह से प्रेजेंट करना पड़ता है। यह अभिनय ही है।

जिस तरह से अच्छा अभिनेता अच्छे अभिनय को करने के लिए उस विषय की पूरी जानकारी भी हासिल करता है और पूरी कोशिश भी करता है कई बार तो बार बार अभ्यास करता है ताकि अभिनय वास्तविक लगे।

यहां पर यह कहना उपयुक्त होगा कि प्रायः लोग अभिनेताओं की सफलता और प्रसिद्धि से ईर्ष्या करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने तो खाली अभिनय किया। क्यों ना हम भी इसी अभिनय को किसी हद तक करके देखें।फिर परिणाम देखें।

इसी तरह से अन्य क्षेत्रों में जहां पर जिस प्रकार का अभिनय करना हो। उसी प्रकार की जानकारी प्राप्त करके बिल्कुल वास्तविक लगने वाला अभिनय करना चाहिए और इसको अभिनय मानने में ही सबसे ज्यादा आसानी है ।
क्योंकि मनुष्य का जो मूल स्वभाव है उससे हटकर उसे बहुत सारे कार्य करने होते हैं। तो ऐसा कार्य करते समय उसको कोफ्त होती है। कष्ट होता है ,मानसिक कष्ट होता है इससे बचने का यही तरीका है। समाज में, बाजार में आगे बढ़ने के लिए अभिनय करना ही पड़ेगा और उसको अभिनय मानना चाहिए यह मानना चाहिए कि मैं इससे अलग हूं मेरा व्यक्तित्व अलग है। लेकिन इस कार्य की ऐसी जरूरत है। कि मुझे यह अभिनय करना जरूरी है और ऐसा अभिनय करना जरूरी है कि वह वास्तविक लगे।

वास्तव में सुबह से शाम तक घर के अंदर भी तरह-तरह की भूमिकाएं निभाने के लिए तरह-तरह के अभिनय करने पड़ते हैं। माता-पिता के साथ दूसरी तरह का अभिनय, पत्नी के साथ अलग, बच्चों के साथ अलग, दोस्तों के साथ अलग तरह का अभिनय अपने कर्मचारियों के साथ अलग अभिनय, अपने बास या अधिकारी या सीनियर के सामने अलग तरह का, रिश्तेदारों के सामने अलग तरह का अभिनय।
कहने का तात्पर्य यह है कि अभिनय तो हमें करना ही है प्राय जो अभिनय हमें अपनी रोजी-रोटी से संबंधित या मुख्य कार्य से संबंधित करने होते हैं। वहीं पर कभी-कभी मन में यह भाव आता है कि मैं मजबूरी में यह सब कर रहा हूं। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता है।
मेरा स्वभाव ऐसा नहीं है।

सबसे ज्यादा जरूरी भी रोजी-रोटी से संबंधित कार्य ही होता है। जबकि पारिवारिक सामाजिक कार्यों में जो अभिनय करना पड़ता है। प्रायः उसको हम खुशी से करते हैं। इससे साबित होता है। कि अभिनय तो हम करते ही हैं अभिनय करने की क्षमता भी है। सिर्फ मन से करने और मन से न करने का सवाल है। उदाहरण के लिए अपने अतिथि या मित्र के सामने हमारा व्यवहार बहुत अच्छा होता है जबकि अपने ग्राहक या कर्मचारी से रूखा या उदासीन व्यवहार हो सकता है जो कि हानिकारक है। मित्र का फोन आने पर वाणी में उत्साह होता है। जबकि ग्राहक या कर्मचारी का फोन आने पर उतना उत्साह नहीं भी हो सकता है। इसी तरह से हम मित्र या अन्य व्यक्ति के द्वारा कोई मदद मिलने पर भरपूर धन्यवाद देते हैं जबकि घर में माता-पिता पति /पत्नी बच्चों को धन्यवाद देने या उनकी तारीफ करने में कंजूसी करते हैं।

मुख्य कार्य में मन से अभिनय न करने के कारण हम लोग प्राय पीछे रह जाते हैं। अपने काम में पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं करते और प्राय मुख्य कार्य में मानसिक रूप से प्रसन्न नहीं रहते हैं।

(अक्सर लोग बात करते हैं कि इस समय काम की नहीं मनोरंजन की बात करेंगे या यह काम का समय नहीं है मनोरंजन का है अर्थात काम और मनोरंजन अलग-अलग है जबकि दोनों एक में ही होने चाहिए)

मुझे लगता है कि अगर अपना दृष्टिकोण इस प्रकार से बदल लिया जाए कि यह मेरा मुख्य कार्य है इसमें भी अभिनय करना ही है जिसको कि मैं पूरे मन से करूंगा और इसके लिए जो भी सीखना होगा वह भी सीखूंगा करते समय यह भी एहसास रखूंगा कि मेरे मूल स्वभाव से भिन्न है लेकिन जरूरी है और यही मेरी काबिलियत और योग्यता भी है कि मैं अपने मूल स्वभाव से अलग कार्य को खुशी से कर सकता हूं। जैसे कार सड़क पर दौड़ सकती है लेकिन अगर कीचड़ में भी आसानी से निकल जाए तो उसको अच्छी कार माना जाएगा। कार का मूल स्वभाव है सड़क पर दौड़ना लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति आ सकती है की बारिश के कारण पानी भर जाए या अनजाने रास्ते पर कीचड़ आ जाए ऐसे में अगर कार निकल जाएगी तो लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है और दूसरी तरफ अगर कार ऐसी स्थिति में बिल्कुल नहीं चल पाएगी तो इतनी दूर तक आना भी बेकार हो जाएगा इतना प्रयास भी बेकार हो जाएगा और सफलता भी नहीं मिलेगी।
इसलिए यह स्वीकार करना कि जीवन में हर दिन अभिनय करना जरूरी है। मन लगाकर अभिनय करने से सफलता एवं संतुष्टि में वृद्धि हो सकती है। भारतीय दर्शन भी जीवन को एक नाटक ही मानता है।
हम एक सप्ताह के लिए इस सिद्धांत पर कार्य करके देखें।

कृपया अपनी राय अवश्य व्यक्त करें।

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