22/08/2026
🚨 महामना की विरासत दांव पर: क्या बीएचयू (BHU) आयुर्वेद फार्मेसी का निजीकरण ही एकमात्र समाधान है?
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के आयुर्वेद संकाय की जिस फार्मेसी की स्थापना स्वयं महामना मदन मोहन मालवीय जी ने 1932 में की थी, आज वह अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। जिस रस शास्त्र विभाग का मूल उद्देश्य भारतीय चिकित्सा पद्धति से बनी सस्ती और शुद्ध दवाओं के ज़रिए 'लोक कल्याण' था, उसे अब निजी हाथों (PPP मॉडल) में सौंपने की तैयारी चल रही है।
📉 पतन के मुख्य कारण जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं:
उत्पादन में भारी गिरावट: कभी जहाँ च्यवनप्राश सहित 250 से अधिक औषधियों का निर्माण होता था, आज वह संख्या सिमट कर मात्र 30-35 रह गई है।
कमीशनबाज़ी और लापरवाही: सबसे अधिक निराशाजनक बात यह है कि इस दुर्दशा का कारण कथित तौर पर कुछ डॉक्टरों की कमीशन के लालच में बाहरी कंपनियों की दवाएं लिखने की प्रवृत्ति है।
प्रशासनिक विफलता: नीचीबाग में चलने वाला दवा विक्रय काउंटर बहुत पहले ही बंद हो चुका है, जो सीधे तौर पर कुप्रबंधन को दर्शाता है।
🤔 एक बड़ा सवाल:
आयुर्वेद क्षेत्र से जुड़े एक पेशेवर और चिकित्सक होने के नाते, यह स्थिति आत्ममंथन का विषय है। क्या किसी प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान को सिर्फ इसलिए प्राइवेट सेक्टर को सौंप देना चाहिए क्योंकि वहां का प्रशासन कमीशनखोरी और लापरवाही रोकने में नाकाम रहा?
यह केवल बीएचयू की एक फार्मेसी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि कैसे स्वार्थ और कुप्रबंधन के कारण हमारे ऐतिहासिक आयुर्वेद संस्थानों को खोखला किया जा रहा है। समिति का गठन तो हो गया है, लेकिन क्या वह वास्तव में जवाबदेही तय करेगी या सिर्फ निजीकरण का रास्ता साफ करेगी?
आयुर्वेद को आगे ले जाने के लिए हमें अपने संस्थानों की जड़ों को मज़बूत करना होगा, उन्हें बेचना नहीं। इस पर आपकी क्या राय है?