06/06/2026
एक डॉक्टर की वेदना
सरकारी अस्पताल में गए तो शिकायत थी—
भीड़-भाड़ है, धक्का-मुक्की है, गंदगी है,
यहाँ तो मुसीबतें घनघोर हैं।
पड़ोस के नर्सिंग होम में गए तो शिकायत थी—
सुविधाएँ कम हैं, मैनेजमेंट नहीं है,
ये दिल तो चाहे कुछ और है।
आलीशान कॉर्पोरेट अस्पताल में गए तो शिकायत थी—
महँगा है, मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं,
ये तो साले सब चोर हैं।
सौ रुपये फीस वाले फैमिली डॉक्टर से शिकायत थी—
अज्ञानी है, इसे न कोई तौर-तरीका है, न कोई शऊर है।
हज़ार रुपये फीस वाले मॉडर्न डॉक्टर ने
जब दस हज़ार की जाँचें लिखीं,
तो मुँह से निकला—
"हाय! ये तो मुआ कमीशनखोर है।"
झोलाछाप के हाथों मर भी गए तो कोई गिला नहीं,
पर अस्पताल में खरोंच भी आ जाए
तो शिकायतों का अंतहीन दौर है।
डेंगू में प्लेटलेट बढ़ जाएँ तो बकरी के दूध की माया,
और जो कभी घट जाएँ,
तो डॉक्टर को जमकर गरियाया।
बच्चे के जन्म पर डॉक्टर की फीस सुनकर आँख भर आई,
पर शिशु के जन्मोत्सव पर
मदिरा में खूब दौलत उड़ाई।
बेटे की चाह में खुद अपनी कोख उजड़वाई,
और अपनी विकृत सोच की सज़ा
सोनोलॉजिस्ट ने पाई।
संस्कृत के टीचर से क्या कभी
किसी ने बच्चों को साइंस पढ़वाई?
पर तुमने देसी वैद्य से
ज़िंदगी भर अंग्रेज़ी दवा हँसते-हँसते खाई।
जब फिजिशियन ने लिखी वही दवाई,
तो तुम्हें झट से
साइड इफेक्ट्स की याद आई।
मेरे प्यारे देशवासियो,
जिन ज़हीन चिकित्सकों को मारते हो,
पीटते हो, कोसते हो,
और जिनसे रखते हो इतना द्वेष—
तुम्हें पता है,
इन्हीं सपूतों का विदेशों में है दर्जा विशेष!
ये न रहेंगे तो बहुत पछताओगे,
नीम-हकीमों के हाथ
अपनी इकलौती जान गँवाओगे।
सदियों से सुनते आए हैं—
"पहला सुख निरोगी काया",
पर तुम्हारी सरकारों को
ये सत्य कभी समझ न आया।
नेताओं और अफसरों ने
घोटालों में इतना माल उड़ाया,
कि बजट में सेहत के लिए
कभी बची ही नहीं माया।।
— डॉ. राज शेखर यादव
M.D. (Medicine)
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