योग संस्कृति

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🧘‍♂️ आमाशय (Stomach) की संपूर्ण शुद्धि का सरल यौगिक अभ्यास: 'वमन धौति' 🌿योग विज्ञान में शरीर की आंतरिक सफाई का विशेष महत...
05/07/2026

🧘‍♂️ आमाशय (Stomach) की संपूर्ण शुद्धि का सरल यौगिक अभ्यास: 'वमन धौति' 🌿

योग विज्ञान में शरीर की आंतरिक सफाई का विशेष महत्व है। 'धौति' का अर्थ ही है— 'धोना'। इसके 4 मुख्य भेद माने गए हैं: वमन धौति, गजकरणी, दण्ड धौति और वस्त्र धौति।

आज हम विस्तार से जानेंगे **'वमन धौति'** की सरल विधि और इसके अचूक लाभ: 👇

💧 विधि (Method):
1️⃣ प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होकर 3-4 लीटर हल्का गुनगुना (मन्दोष्ण) जल लें और उसमें थोड़ा नमक मिला लें।
2️⃣ कागासन (उकड़ू) में बैठकर जितना संभव हो, उतना पानी लगातार पीने का प्रयत्न करें।
3️⃣ अब थोड़ा आगे की ओर झुककर, दाहिने हाथ की पहली तीन अंगुलियों को मुख में डालकर गले को गुदगुदाएं।
4️⃣ इससे वमन (Vomiting) होगा और जल बाहर निकलेगा। पेट में गए सारे पानी को इसी प्रकार बार-बार उंगली की सहायता से बाहर निकाल दें। (इस क्रिया को 'बाघी-क्रिया' भी कहते हैं।)

✨ अद्भुत लाभ (Benefits):
🔹 आमाशय में स्थित अतिरिक्त कफ, पित्त, अम्ल (Acid) और बिना पचा हुआ अन्न तुरंत बाहर निकल जाता है, जिससे चित्त प्रसन्न और हल्का हो जाता है।
🔹 जब कभी पेट भारी लगे या खट्टी डकारों का प्रकोप हो, तो यह क्रिया अत्यंत उपयुक्त रहती है।
🔹 मलेरिया ज्वर में भी वमन धौति करने से कुपित पित्त निकलकर स्वेद (पसीना) आता है, जिससे ज्वर का वेग मंद पड़ जाता है और सिरदर्द व चक्कर शांत हो जाते हैं। यह पूर्णतः निरापद (Safe) क्रिया है।

⚠️ ध्यान रहे :
यह 'वमन धौति' का अभ्यास है, 'गजकरणी' नहीं। वमन धौति में उंगलियों का प्रयोग किया जाता है, इसमें रूक - रूक कर पानी वमन द्वारा बाहर निकलता है जबकि गजकरणी एक भिन्न अभ्यास है, इसमें पानी एक प्रवाह से स्रोत की भांति बाहर गिरता है। अतः अभ्यास सदैव सही विधि से ही करें।

#योगसंस्कृति

10/06/2026

साधना करते समय युवक के शरीर से निकलने लगी दिव्य ऊर्जा

प्रस्तावना: जब भीतर का मौन बोलने लगता है
हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव था देवगिरी। चारों ओर चीड़ और देवदार के पेड़, बीच में बहती अलकनंदा की सहायक धारा, और सुबह शाम मंदिरों से आती घंटियों की आवाज़। इसी गाँव में रहता था 24 वर्षीय अर्जुन। शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर वह दो साल पहले यहाँ लौट आया था। कारण पूछो तो बस इतना कहता, "मन में कुछ खाली सा लगता है, उसे भरना है।"

अर्जुन के दादाजी गाँव के पुराने साधक थे। उनके जाने के बाद उनकी कुटिया, कुछ ग्रंथ और एक ध्यान की परंपरा अर्जुन को विरासत में मिली। शुरू में अर्जुन ने इसे सिर्फ शांति पाने का तरीका माना। पर धीरे धीरे यह उसकी दिनचर्या बन गई। ब्रह्ममुहूर्त में उठना, नदी में स्नान, फिर तीन घंटे अखंड साधना।

साधना का पहला वर्ष: बीज का टूटना
पहले कुछ महीने सिर्फ उबासी, पैरों में दर्द और विचारों की भीड़ थी। अर्जुन को लगता था कि वह कुछ गलत कर रहा है। दादाजी की डायरी में लिखा था: "बीज जब टूटता है तभी अंकुर फूटता है। पीड़ा साधना का पहला द्वार है।"

उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी साधना को तीन भागों में बाँटा:

1. कायिक तैयारी
सूर्य नमस्कार और सूक्ष्म क्रियाएँ, 40 मिनट
प्राणायाम: अनुलोम विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका
सात्विक भोजन: दिन में एक बार, सूर्यास्त से पहले

2. मानसिक अनुशासन
मौन व्रत: सुबह 4 से 8 बजे तक
स्वाध्याय: योगवासिष्ठ और पतंजलि योगसूत्र का एक श्लोक रोज
त्राटक: दीपक की लौ पर 15 मिनट

3. भाविक समर्पण
हर साधना से पहले प्रार्थना: "जो भीतर है, वही बाहर प्रकट हो"
दिन भर में किए हर काम को गुरु को अर्पण

धीरे धीरे शरीर हल्का लगने लगा। विचारों के बीच में अंतराल आने लगे। एक दिन त्राटक करते समय उसे लगा कि दीपक की लौ उसके भीतर जल रही है।

दूसरा वर्ष: ऊर्जा का पहला संकेत
साधना के 14वें महीने में शीत ऋतु थी। कुटिया के बाहर बर्फ गिर रही थी। अर्जुन रोज की तरह पद्मासन में बैठा था। अचानक उसे रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में गर्मी महसूस हुई। जैसे कोई कोयला सुलग रहा हो।

पहले तो उसने सोचा कि कम्बल की वजह से है। पर गर्मी बढ़ती गई। वह मेरुदंड के रास्ते ऊपर चढ़ने लगी। नाभि पर पहुँची तो पेट में अग्नि जैसी अनुभूति हुई। हृदय पर आई तो आँखों से आँसू बहने लगे बिना किसी कारण के। कंठ पर पहुँची तो एक अजीब सी झंकार पूरे कमरे में गूंज गई।

जब वह ऊर्जा भृकुटी पर पहुँची, अर्जुन का शरीर झटके से हिल गया। उसकी आँखें बंद थीं पर उसे कुटिया की हर चीज दिख रही थी। दीवार पर टंगी दादाजी की तस्वीर, कोने में रखी धूनी, यहाँ तक कि बाहर गिरती बर्फ का एक एक कण।

उस दिन के बाद हर साधना में यह होने लगा। गाँव के लोग कहने लगे कि अर्जुन के पास बैठने से मन शांत हो जाता है। छोटे बच्चे उसके आसपास खेलते तो लड़ना बंद कर देते।

दिव्य ऊर्जा क्या है: शास्त्र और विज्ञान के बीच
दादाजी की डायरी में इस ऊर्जा को "कुंडलिनी" कहा गया था। योगसूत्र इसे "प्राण का ऊर्ध्वगमन" कहते हैं। आधुनिक भाषा में हम इसे इस तरह समझ सकते हैं:
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अर्जुन को जो अनुभव हो रहे थे, वे किताबों में लिखे लक्षणों से मेल खाते थे: शरीर का गर्म होना, अनहद नाद सुनना, आँख बंद करके भी देख पाना, शरीर का हल्का हो जाना, और एक अजीब सी सुगंध का आना।

वह दिन: जब ऊर्जा शरीर से बाहर आई
फाल्गुन की पूर्णिमा थी। अर्जुन ने निर्णय लिया कि वह पूरी रात ध्यान करेगा। गाँव के मंदिर के पुजारी ने उसे कहा था कि पूर्णिमा को किए गए जप का फल हजार गुना होता है।

रात के 1:30 बजे। कुटिया में एक दीया जल रहा था। बाहर पूर्ण चंद्रमा खिड़की से झाँक रहा था। अर्जुन ने आँखें बंद कीं और "सोऽहम्" के साथ श्वास को देखना शुरू किया।

20 मिनट बाद उसका शरीर तपने लगा। पर इस बार गर्मी अलग थी। यह जलाती नहीं थी, नहला देती थी। उसे लगा कि उसकी रीढ़ कोई प्रकाश का स्तंभ बन गई है। सहस्रार चक्र पर पहुँचकर ऊर्जा रुकी नहीं। वह सिर के ऊपर से फव्वारे की तरह फूट पड़ी।

अर्जुन ने आँखें खोलीं तो देखा कि उसके शरीर से सुनहरी नीली आभा निकल रही है। वह आभा दीवारों को पार कर रही थी। कुटिया के बाहर बंधी गाय ने अचानक रंभाना बंद कर दिया और बैठ गई। पास के पेड़ पर सोए पक्षी जाग गए और चहचहाने लगे।

सबसे अद्भुत बात: अर्जुन को अपना शरीर पारदर्शी लग रहा था। जैसे वह प्रकाश का बना हो। उसे कोई डर नहीं लगा। बस एक असीम करुणा और शांति थी। उसे लगा कि वह पूरी देवगिरी को अपनी बाहों में ले सकता है।

यह स्थिति लगभग 40 मिनट रही। फिर धीरे धीरे प्रकाश सिमटकर वापस हृदय में समा गया। अर्जुन पसीने से तर था, पर थका नहीं था। वह उठा तो उसे लगा कि उसका वजन आधा रह गया है।

गाँव पर प्रभाव: जब एक दीया हजार दीये जलाए
अगली सुबह से बदलाव दिखने लगे। अर्जुन के पास जो भी आता, उसे अजीब सी शांति मिलती। गाँव की एक महिला जो 3 साल से सिरदर्द से परेशान थी, अर्जुन के पास 10 मिनट बैठी और दर्द गायब।

खबर फैलने लगी। लोग दूर दूर से आने लगे। अर्जुन ने किसी को चमत्कार का वादा नहीं किया। वह बस कहता: "आँख बंद करो, अपनी श्वास को देखो। जो मेरे भीतर है, वही तुम्हारे भीतर है।"

गाँव में तीन बदलाव साफ दिखे:
कृषि में वृद्धि: जिस खेत के पास अर्जुन ध्यान करता, वहाँ फसल 20% ज्यादा हुई। लोग इसे "ऊर्जा का प्रभाव" कहने लगे।
विवाद में कमी: पंचायत में केस आने बंद हो गए। लोग कहते, "अर्जुन भाई के सामने झूठ बोलते नहीं बनता।"
युवा पीढ़ी का जुड़ाव: शहर जा चुके 12 लड़के वापस आए और बोले कि हमें भी साधना सीखनी है।

पर हर प्रकाश के साथ छाया भी आती है। कुछ लोगों ने अफवाह फैलाई कि अर्जुन तंत्र कर रहा है। एक पत्रकार आया और बोला, "कैमरे पर ऊर्जा दिखाओ तो मानें।"

अर्जुन हँसा। बोला, "धूप को मुट्ठी में कैसे पकड़ोगे? इसे अनुभव करना पड़ता है।"

साधक के लिए चेतावनी: ऊर्जा वरदान भी, परीक्षा भी
दादाजी की डायरी का एक पन्ना अर्जुन को बार बार याद आता: "जब शक्ति जागे, तो साधक का अहंकार सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।"

अर्जुन के साथ भी ऐसा हुआ। एक दिन एक बड़े व्यापारी ने कहा, "मेरे बेटे को कैंसर है। ठीक कर दो, मुँह माँगा पैसा दूँगा।" अर्जुन के मन में आया कि वह कोशिश करे। उसने रात भर प्रार्थना की। पर सुबह खबर आई कि लड़का नहीं रहा।

अर्जुन टूट गया। उसे लगा कि उसकी ऊर्जा व्यर्थ है। वह तीन दिन कुटिया से नहीं निकला। चौथे दिन उसे ध्यान में दादाजी की आवाज़ सुनाई दी: "तू कर्ता नहीं है। तू केवल बाँसुरी है। गीत तो वह बजाएगा। तेरा काम सिर्फ खाली होना है।"

उस दिन अर्जुन ने सीखा कि दिव्य ऊर्जा का अर्थ सिद्धियाँ दिखाना नहीं है। इसका अर्थ है हर स्थिति में सम रहना।

ऊर्जा को संभालने के नियम जो अर्जुन ने बनाए
अपने अनुभव से अर्जुन ने नए साधकों के लिए कुछ नियम लिखे:

1. शुद्धि पहले, शक्ति बाद में
बिना यम नियम के कुंडलिनी जगाना आग से खेलना है। क्रोध, लोभ, मोह का त्याग जरूरी है।

2. गुरु या मार्गदर्शन अनिवार्य
किताब पढ़कर तैरना सीखोगे तो डूबोगे। जीवित गुरु या परंपरा का सहारा लो।

3. ऊर्जा का संचय करो, प्रदर्शन नहीं
हर अनुभव लोगों को बताओगे तो ऊर्जा क्षीण होगी। माला के मनके की तरह इसे गुप्त रखो।

4. सेवा में लगाओ
अगर शक्ति मिले तो उसे बाँटो। बगीचे में फूल खिले तो सुगंध अपने आप फैलती है। ढोल पीटने की जरूरत नहीं।

5. शरीर का ध्यान रखो
ऊर्जा ज्यादा हो तो शरीर तप सकता है। घी, दूध, बादाम और भरपूर नींद जरूरी है।

अंतिम पड़ाव: "मैं" से "हम" तक की यात्रा
आज अर्जुन 32 साल का है। देवगिरी में अब "चेतना विद्यालय" है। वहाँ बच्चे आधुनिक पढ़ाई के साथ ध्यान भी सीखते हैं। सुबह किसान खेत जाने से पहले 20 मिनट सामूहिक साधना करते हैं।

क्या अर्जुन के शरीर से अब भी ऊर्जा निकलती है? गाँव वाले कहते हैं कि अमावस्या की रात कुटिया के ऊपर नीला प्रकाश दिखता है। पर अर्जुन इस पर हँस देता है।

वह कहता है, "दिव्य ऊर्जा कोई जादू नहीं है। यह हर व्यक्ति में सोई हुई संभावना है। क्रोध जब करुणा बन जाए, वासना जब प्रेम बन जाए, भय जब श्रद्धा बन जाए, तो समझो ऊर्जा जाग गई।"

उसकी आँखों में आज भी वही शांति है। पर अब वह शांति संक्रामक है। जो भी पास बैठता है, उसके भीतर भी कुछ खिलने लगता है।

शायद यही असली दिव्य ऊर्जा है। जो एक से दूसरे में दीपक की तरह जलती जाए, बिना कम हुए।

उपसंहार: तुम्हारे भीतर का हिमालय
अर्जुन की कहानी किसी एक युवक की नहीं है। यह उस पुकार की कहानी है जो हर दिल में कभी न कभी गूंजती है। नौकरी, रिश्ते, पैसा सब होकर भी लगता है कि कुछ छूट रहा है।

वह "कुछ" बाहर नहीं है। वह तुम्हारी रीढ़ में सोया हुआ सवेरा है। उसे जगाने के लिए हिमालय जाना जरूरी नहीं। बस रोज 10 मिनट अपने साथ बैठना शुरू करो। श्वास को देखो। विचारों से लड़ो मत।

धीरे धीरे तुम्हें भी लगेगा कि शरीर के भीतर कोई दीया जल रहा है। एक दिन वह दीया इतना बड़ा हो जाएगा कि तुम्हारी देह से छलकने लगेगा।

तब तुम समझोगे कि अर्जुन कोई और नहीं था। वह तुम्हारा ही भविष्य था, जिसने थोड़ा पहले चलना शुरू कर दिया था।

#योगसंस्कृति

05/06/2026

शयन विधान
〰🌼🌼〰
*सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।*

सोने की मुद्रा:
उल्टा सोये भोगी,
सीधा सोये योगी,
डाबा सोये निरोगी,
जीमना सोये रोगी।

शास्त्रीय विधान भी है।

आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं,
बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।

शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।

सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र /नवकार मंन्त्र गिने जाए

"सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।

"सात भय:-"
इहलोक,परलोक,आदान,
अकस्मात ,वेदना,मरण ,
अश्लोक (भय)

दिशा घ्यान
〰🌼〰
दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।

यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।

1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।

2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।

3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।

4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से मृत्यु और हानि होती है ।

अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।

विशेष शयन की सावधानियाँ
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1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।*

2:-सोते समय मस्तक दिवार से कम से कम 3 हाथ दूर होना चाहिये।

3:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी।

4:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी।

5:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।

6:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।

7:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं।

8:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्सा उपचार हेतु छूट हैं ।

9:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है। (बेड टी पीने वाले सावधान)

10:- सोते सोते पढना नहीं।

11:-सोते-सोते तंम्बाकू चबाना नहीं। (मुंह में गुटखा रखकर सोने वाले चेत जाएँ )

12:-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। )

13:-शय्या पर बैठकर सरोता से सुपारी के टुकड़े करना अशुभ हैं।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#योगसंस्कृति

10/05/2026

23/04/2026

#कैसे #पहचानें कि #इड़ा, #पिंगला या #सुषुम्ना #सक्रिय है?

योग और प्राण विज्ञान में इड़ा (चंद्र नाड़ी), पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना नाड़ी का बहुत गहरा महत्व है।
यह केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान भी इसे नासिका चक्र (Nasal Cycle) के रूप में स्वीकार करता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हमारी नाक की दोनों नासिकाएँ हर 90 मिनट से 2 घंटे में बारी-बारी से अधिक सक्रिय होती हैं — इसे ही Nasal Cycle कहा जाता है।

1. पहचानने की आसान विधि (Evidence-based)
Step 1: Awareness (जागरूकता)
आराम से बैठें, आँखें बंद करें और अपनी श्वास को नाक के नीचे महसूस करें।

Step 2: Observe (निरीक्षण करें)
बायीं नासिका ज्यादा सक्रिय → इड़ा
मन शांत, रचनात्मकता, ठंडक (Parasympathetic activation)
दायीं नासिका ज्यादा सक्रिय → पिंगला
ऊर्जा, सक्रियता, गर्मी (Sympathetic activation)
दोनों बराबर → सुषुम्ना
संतुलन, ध्यान की श्रेष्ठ अवस्था

यह सिद्धांत प्राचीन ग्रंथ हठयोग प्रदीपिका में विस्तार से वर्णित है।

2. संतुलन कैसे करें (Proven Technique)
नाड़ी शोधन प्राणायाम (Alternate Nostril Breathing)
यह केवल योगिक परंपरा नहीं—आधुनिक रिसर्च भी इसे प्रभावी मानती है।
कई अध्ययनों (जैसे कि National Center for Biotechnology Information) के अनुसार:
यह Autonomic Nervous System को संतुलित करता है
तनाव (Stress) और Anxiety कम करता है
फोकस और मानसिक स्पष्टता बढ़ाता है
विधि:
बायीं नासिका से श्वास लें
दायीं से छोड़ें
फिर दायीं से लें, बायीं से छोड़ें
5–10 मिनट नियमित अभ्यास करें

3. सुषुम्ना को सक्रिय करने की सरल विधि
“सो-हम” ध्यान
श्वास अंदर → “सो”
श्वास बाहर → “हम”
यह अभ्यास माइंडफुल ब्रीदिंग का एक रूप है, जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में भी स्वीकार किया गया है।
रिसर्च के अनुसार (Mindfulness studies):
श्वास धीमी होती है
दिमाग की Alpha waves बढ़ती हैं
गहरी शांति और संतुलन आता है
इसी अवस्था में दोनों नासिकाएं संतुलित होने लगती हैं — यानी सुषुम्ना की झलक मिलती है

4. कब करना सबसे प्रभावी है?
ब्रह्म मुहूर्त (4–6 बजे)
सूर्यास्त के समय
नींद से उठते ही
ध्यान के दौरान
इन समयों पर शरीर और मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से संतुलन की ओर होते हैं
एक गहरी सच्चाई (Rare Insight)
सुषुम्ना को “जबरदस्ती” सक्रिय नहीं किया जा सकता
यह तभी खुलती है जब:
श्वास संतुलित हो
मन शांत हो
शरीर पूर्णतः रिलैक्स हो

यानी यह Effort (प्रयास) से नहीं, बल्कि Awareness (सजगता) से होती है
आज का छोटा अभ्यास (Practical अनुभव)
5 मिनट सिर्फ श्वास को देखें
फिर चेक करें कौन-सी नासिका सक्रिय है
फिर 5 मिनट “सो-हम” करें
आप खुद अनुभव करेंगे—एक क्षण ऐसा आता है
जहाँ सब कुछ संतुलित हो जाता है
वही सुषुम्ना की झलक है
अंतिम संदेश
योग केवल मान्यता नहीं—अनुभव का विज्ञान है।
जब प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान मिलते हैं, तब सच्ची समझ पैदा होती है।

#योगसंस्कृति

20/04/2026

*हीटवेव के दौरान बरतें* *सावधानियां👇*

दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच बाहर जाने से बचें।

अगर जाना जरूरी हो, तो सिर (टोपी, दुपट्टा या छाते से) ढककर ही निकलें ।

हल्के और ढीले कपड़े पहनें ताकि शरीर ठंडा रहे।

दिन भर पर्याप्त पानी पिएं।

ORS, नींबू पानी, छाछ, और नारियल पानी का सेवन करें।

भारी और तला-भुना खाना कम खाएं। तरबूज, खीरा, ककड़ी जैसे पानी से भरपूर फल-सब्जियां खाएं।

बच्चों-बुजुर्गों का खास ध्यान रखें।

ये लोग लू के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, इन्हें धूप से दूर रखें।

खिड़‌कियों पर पर्दे लगाएँ या कूलर/पंखे का उपयोग करें। दिन में घर के अंदर रहें और ठंडी जगह पर आराम करें।

#संकल्पसेवाससंस्थानसीकर

#योगसंस्कृति

23/12/2025

🧘🏻‍♂️ *ध्यान का इतिहास* 🧘🏻‍♀️

इतिहासकारों का मानना ​​है कि ध्यान का अभ्यास 3000 ईसा पूर्व से ही किया जाता रहा है। भारत में ध्यान के सबसे पुराने प्रमाण वेदों और उपनिषदों में मिलते हैं, जो लगभग 1500 ईसा पूर्व के हैं। बौद्ध धर्म ने भारत के पड़ोसी देशों और विश्व भर में अंग्रेजों के बीच ध्यान को एक शक्तिशाली माध्यम बना दिया है।

*ध्यान के प्रकार:*
1) सगुण (वस्तु सहित) और निर्गुण (वस्तु रहित)
2) निष्क्रिय (बैठकर) और सक्रिय (किसी भी क्रिया के दौरान)
3) एकाग्र या ठोस (सीमित) और विस्तृत या अमूर्त (सचेतनता)

*घेरंड संहिता के अनुसार, 3 प्रकार हैं:*
स्थूल (वस्तु), तेजो (ज्योति), सूक्ष्म (सूक्ष्म)

*ध्यान के निषेध:*
ध्यान अवसाद, मनोविकार, गंभीर अस्थमा से पीड़ित लोगों, बच्चों और गर्भावस्था के दौरान उनकी समस्याओं को बढ़ा सकता है और पोस्टट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी), मिर्गी के दौरे और मनोविकार की स्थिति को और खराब कर सकता है।

🧘🏻‍♂️🌱🌿🕉️🍀🌳🧘🏻‍♀️

#योगसंस्कृति
#ध्यान

07/09/2025

नाभि तक गहरी श्वास ले ये अतिआवश्यक है।
गहरी सांसों से गुपचुप हो जाते हैं 7 बड़े बदलाव
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सांस ही प्राण है। इसलिए हमारे यहां ऑक्सीजन को भी प्राणवायु कहा गया है। यही वजह है कि सदियों से हमारी संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन में प्राणायाम को प्रभावी माना गया है। नए दौर में विदेशी भी मानने लगे हैं कि यदि हमें अच्छा स्वास्थ्य और जीवन चाहिए तो अपनी हर एक सांस पर ध्यान देना होगा। अपनी आने-जाने वाली संास पर ध्यान देने से न सिर्फ हम शारीरिक बल्कि मानसिक विकारों से भी दूर रह सकते हैं। सांस हमारे तनाव, बेचैनी और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकती है। अच्छी सांस तन और मन में सात आश्चर्यजनक बदलाव ला सकती है लेकिन इसके लिए अभ्यास की जरूरत है।

दिमागी क्षमता में वृद्धि

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार मेडिटेशन से हमारे मस्तिष्क का आकार विस्तार लेता है (कार्टेक्स हिस्से की मोटाई बढऩे लगती है)। इससे मस्तिष्क की तार्किक क्षमता में बढ़ोतरी होती है। सोने के बाद गहरी सांस लेने का अभ्यास दिमागी क्षमता को बढ़ाता है।



दिल की धडक़न में सुधार

मेडिकल साइंस की रिसर्च में यह पाया गया कि दिल की दो धडक़नों के बीच अंतर होता है जिसे लो हार्ट रेट वैरिएबिलिटी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में दिल के दौरा का अंदेशा बहुत ज्यादा होता है। गहरी सांस वाले प्राणायाम के जरिए इस स्थिति को सुधारा जा सकता है।



तनाव में कमी, मन को शांति

कमजोर सांस तनाव की स्थिति में शरीर को लडऩे की पूरी ताकत नहीं देती। लेकिन यदि केवल सांसों पर ध्यान लगाएं तो मन की आकुलता घटती है। गहरी सांस से नर्वस सिस्टम उत्तेजना, प्रेरणा वाली पैरा सिम्पेथेटिक स्थिति में चला जाता है, जो मन को आराम, सुकून की स्थिति होती है।



नकारात्मकता से मुक्ति

अधिकांश लोग जब पीड़ा या तनाव में होते हैं तो उनकी सांसे उखड़ी रहती हैं। यह हमारे शरीर की कुदरती प्रतिक्रिया होती है। अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करने के किसी भी व्यायाम से बेचैनी, अवसाद, गुस्से और घृणा से भरे नकारात्मक विचारों को दूर करने में मदद मिलती है।

चुनौती की घड़ी में संयम

विदेशी पत्रिका ‘टीचिंग एंड लर्निंग’ में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया कि जो बच्चे अपनी परीक्षा से पहले गहरी सांस लेना सीख जाते हैं उनका ध्यान बढ़ता है और याद किए पाठ को दोहराने की योग्यता में सुधार होता है।

ब्लड प्रेशर पर काबू

हर रोज महज कुछ मिनटों के लिए गहरी सांस लेने और छोडऩे का अभ्यास काफी हद तक आपके ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकता है। गहरी सांस लेने से शरीर शांत स्थिति में आता है। ऐसा होने पर इससे रक्त वाहिनियों को अस्थायी रूप से खून को पूरे शरीर में नियंत्रित दबाव के साथ पहुंचाने में मदद मिलती है।

जीन में सकारात्मक बदलाव

यह सबसे बड़ा और बेहद महत्वपूर्ण बदलाव है जो सचमुच इस तरह होता है कि हमें पता ही नहीं चलता। संभवत: इसके अच्छे परिणाम हमें हमारी आने वाली पीढिय़ों में नजर आते हैं। योगा, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से सांसों की गति को नियंत्रित करने से हमारी जेनेटिक संरचना में प्रभावी बदलाव होते हैं। इसमें केवल तन ही नहीं बल्कि मन के स्तर पर भी परिवर्तन होते हैं। इससे हमारे अच्छे जीन ज्यादा संवेदनशील बनते हैं।



भारतीय मनीषियों के कथन

सांस भावों से जुड़ी है। भाव को बदलो, सांस बदल जाएगी। क्रोध आए लेकिन अपनी सांस को डोलने मत देना। ऐसे समय में सांस को स्थिर रखना और शांत रहना। रजनीश ओशो, दार्शनिक

प्राणायाम फेफड़ों को स्वस्थ रखने वाला, रक्त को शुद्ध, शरीर के अंग-प्रत्यंगों को चैतन्यता देने वाला और पाचन शक्ति बनाए रखने वाला है इसलिए यह आरोग्य और दीर्घ जीवन देने वाला भी है।

#योगसंस्कृति #स्वस्थभारतअभियान

02/09/2025

*कुंडलिनी के सात चक्र और बीमारी*
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हिंदू धर्म के ये देवी-देवता हमारे शरीर के अंग और भावना की प्रकृति के आधार पर हमारे शरीर में भी सूक्ष्म रूप से मौजूद होते हैं और अगर आपको उन चक्रों की ऊर्जा को हील करना या संतुलित करना है, ताकि आप स्वस्थ रहें ।

मनुष्य की कुंडलिनी के सात चक्रों से कुछ देवी-देवताओं को उन चक्रों की प्रकृति और ऊर्जा संतुलन की आवश्यकता के आधार पर जोड़ा गया है।

1- मूलाधार चक्र
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सातों चक्रो में सबसे पहले मूलाधार चक्र का आता है मूलाधार चक्र के खराब होने से मुख्यता प्रोस्टेट, गठिया,वेरिकोज वेन, कूल्हे की समस्या, घुटनों में समस्या,खाना अच्छा न लगना, लूज मोशन या कब्ज की समस्या, बवासीर आदि है।

2- स्वाधिष्ठान चक्र
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कुण्डलिनी के द्वितीय चक्र स्वाधिष्ठान चक्र के खराब होने से निम्न बीमारी होती है। हर्निया, आतों की दिक्कत, महिलाओं में मासिक धर्म, खून की कमी, नपुंसकता, गुर्दे की समस्या, मूत्र संबंधि रोग आदि।

3- मणिपुर चक्र
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कुंडली के तृतीय चक्र मणिपुर चक्र के खराब होने से निम्न बीमारी होती है। लीवर सिरोसिस, फैटी लीवर, शुगर, किडनी संबंधित समस्या, पाचन संबंधी समस्या, पेट में गैस, अल्सर आदि।

4- अनाहत चक्र
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कुंडली के चतुर्थ चक्र हार्ट चक्र के खराब होने से ह्रदय की बीमारी,बी पी हाई या लो होना, लंग्स में दिक्कत, स्तन कैंसर, छाती में दर्द, रक्षाप्रणाली में विकार आदि।

5- विशुद्ध चक्र
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थ्रोट चक्र के खराब होने से मुख्यतः निम्न बीमारी होती है । थायराइड, जुकाम, बुखार, मुँह, जबड़ा, जिव्हा, कंधा और गर्दन, हार्मोन राजोवृति आदि।

6- आज्ञा चक्र
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षष्ठ चक्र आज्ञा चक्र के खराब होने से निम्न बीमारी होती हैं। आँख, कान, नाक, हार्मोन्स की प्रोब्लम, सिर दर्द, अनिंद्रा, अर्ध कपारी (माइग्रेन) आदि।

7- सहस्त्रार चक्र
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क्राउन चक्र के खराब होने से निम्न बीमारी होती है। मानसिक रोग, नाडी रोग, मिर्गी, अधरंग, लकवा, सिर दर्द, हाथ पैरों का सुन्न होना।

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