धर्म कर्म

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the predictions. Marriage Compatibility
Vedic Astrology has an excellent and proven method of compatibility matching based on nakshatras (Lunar Constellations), which is called Ashtakoot match or simply guna milap. It assigns points for factors that influence marriage. More the points, more chances of success of the marriage. Though this method is not restricted to marriage only and can be used for compatibility analysis between boy and girl with slight modification. Are you compatible with your spouse or your girl friend/ boy friend? Check your horoscope matching here

21/07/2026

चंद्रमा का गोचर

21 जुलाई को प्रातः 8:00 बजे चंद्रमा देवता कन्या राशि से गोचर करते हुए तुला राशि में प्रवेश करेंगे और 23 जुलाई रात्रि 7:00 pm तक तुला राशि में ही रहेंगे उसके पश्चात क्रमशः वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे।।
चंद्रमा देवता क्रमशः मंगल के चित्रा नक्षत्र,राहु के स्वाती नक्षत्र और देवगुरू बृहस्पति के विशाखा नक्षत्र से गोचर करते हुए तुला राशि से वृश्चिक राशि तक की यात्रा करेंगे।।
अतः यह फलादेश 23 जुलाई रात्रि 8 पीएम तक के लिए है और चंद्र राशि पर आधारित है।।
कर्क राशि के जातकों के लिए लंबी दूरी की यात्रा वर्जित है और यदि यात्रा करनी पड़े तो व्यवस्थित और योजनाबद्ध रूप से करें।।नया वृहत कार्य भी दो दिन के पश्चात ही करें।।
वृषभ राशि के जातकों को कुछ आकस्मिक धन लाभ के योग हैं और यदि महादशा अंतर्दशा में भी धन लाभ की स्थिति है तो धन लाभ होना अवश्यंभावी है किंतु वृषभ राशि के जातक बाहर के तले भुने से बचें।।वाहन चलाते समय भी सावधानी रखें।।
मीन राशि और वृश्चिक राशि के जातकों के लिए समय अधिक प्रतिकूल है विशेषकर मीन राशि का समय अधिक विपरीत है।।
मानसिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें और वाद विवाद से सर्वथा दूर रहें।।घर परिवार में सामंजस्य बनाए रखें।।रात्रि को समय से सोने का प्रयास करें।।
धन संबंधित विषय में किसी पर भी अंधा विश्वास न करें।।
रात्रि को ध्यान अवश्य करें।।
कर्क राशि, वृषभ राशि,मीन राशि और वृश्चिक राशि के जातक भगवान शिव की आराधना करें और मानसिक जप करते रहें।।
दूध में मिश्री मिलाकर शिवलिंग पर अर्पित करें।।

20/07/2026

आज का ग्रह गोचर और उसका फल !

आज से 3 अगस्त तक सूर्य और गुरु की युति पुष्य नक्षत्र में रहेगी. पुष्य का स्वामी शनि है. पुष्य को नक्षत्रों का राजा कहते हैं. ऋग्वेद में इसे तिष्य कहा गया है.
यह सभी दोषों को दूर कर कार्य सिद्ध करता है. किसी भी भटकाव से बचते हुए प्रयास जारी रखें. योग्यता के अनुसार फल अवश्य मिलेगा.

04/07/2026

शनि की महादशा के फल !

शनि की अदालत
19 साल का वो इम्तिहान जो हर किसी को देना पड़ता है
( महादशा के 9 पड़ावों का पूरा सफर)

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शुरू करने से पहले ये चौपाई आत्मसात करलें।दुख कम होने लगेगा।

कोऊ न काहू सुख दुख करि दाता
निज कृत कर्म भोगहिं सब भ्राता।

सोचिए एक जज है, जो 19 साल तक आपकी हर हरकत का हिसाब रखता है, और फिर एक-एक करके फैसला सुनाता है। यही है शनि की महादशा। न ये सिर्फ "साढ़े साती" वाला डर है, न सिर्फ मुसीबतों की लिस्ट — यह असल में आपके कर्मों का पूरा ऑडिट है।

कुछ लोगों ने कमेंट किया की बुध की दर्जे जन्म होगा तो शनि महादशा नही आयेगी।सोचने के लिए खयाल अच्छा है गालिब।
अरे भाई बुध में शनि का अंतर नही आयेगा।साढ़ेसाती या ढैया नही आयेगी।तब शनि देव आपसे हाथ मिलाने आएंगे ही।

लाल किताब कहती है साफ बात — शराब, मांस और गलत रिश्तों में उलझे रहोगे तो शनि सांप की तरह डसेगा। लेकिन आचरण शुद्ध रखो, तो यही शनि आपके लिए फरिश्ता बन जाता है।

और हां, एक दिलचस्प संकेत — अगर इन सालों में घर का मुख्य दरवाज़ा बार-बार खराब हो रहा है, या घर में लोहे का कबाड़ बढ़ता जा रहा है, तो समझ लीजिए शनि ने दस्तक दे दी है।

अब चलिए, उस 19 साल के सफर के 9 पड़ावों की कहानी सुनते हैं।

1. शनि में शनि — "आइने के सामने" (3 साल 3 दिन)
यह वो दौर है जब शनि खुद आपको आपकी असलियत का आइना दिखाता है। पुरानी आदतें, पुराना ढर्रा — सब खत्म। नई जिम्मेदारियां कंधों पर आ जाती हैं, और व्यापार धीमी आंच पर ही सही, पकता ज़रूर है।
शरीर में घुटनों की कट-कट और गैस की शिकायत बढ़ सकती है। पढ़ाई में आलस्य हावी होता है और मन बार-बार अकेले रहने को करता है।
उपाय: कीकर की दातुन से दांत साफ करें, नंगे पांव मंदिर जाएं।

2. शनि में बुध — "कलम में ताकत" (2 साल 8 महीना)
दिमाग (शनि) और बुद्धि (बुध) जब हाथ मिलाते हैं, तो व्यापार में यू-टर्न आता है। कागज़, कलम और कम्युनिकेशन से जुड़े काम इस दौर में सोना बरसाते हैं।
जुबान लड़खड़ाना या नसों में हल्का तनाव महसूस हो सकता है। लेकिन खुशखबरी — प्रतियोगी परीक्षाओं में जीत के योग हैं, और बरसों पुराने दोस्त फिर से जिंदगी में लौट सकते हैं।
उपाय: कन्या पूजन करें, तांबे का सिक्का पास रखें।

3. शनि में केतु — "मोह से मुक्ति की आहट" (1 साल 1 महीना)
केतु को शनि का सबसे वफादार भक्त कहा गया है। इसीलिए यह दौर दिल से लगाव कम करता जाता है — काम में मन नहीं लगता, माहौल अचानक बदल जाता है।
पेशाब से जुड़ी दिक्कतें या रीढ़ की हड्डी में दर्द हो सकता है। पढ़ाई से मोहभंग होने लगता है, और रिश्तों में एक अनजाना डर या दूरी महसूस होती है।
उपाय: कानों में सोना पहनें, गाय की सेवा करें।

4. शनि में शुक्र — "मेहनत का फल, ठाठ की जिंदगी" (3 साल 2 महीना)
शनि गरीबी है तो शुक्र अमीरी — और जब दोनों मिलते हैं, इंसान फर्श से अर्श तक पहुंच सकता है। लग्जरी सामान, फैशन, कॉस्मेटिक्स से जुड़े काम इस दौर में मुनाफा देते हैं। पैसा अचानक आने लगता है।
सेहत में शुगर या आंखों की परेशानी पर नजर रखें। लेकिन प्रेम और शादी के मामले में यह दौर बेहद शुभ माना गया है — संतान सुख के योग भी बनते हैं।
उपाय: गाय को ज्वार खिलाएं, खुद को अच्छी खुशबू से महकाए रखें।

5. शनि में सूर्य — "अहंकार बनाम आत्म-सम्मान" (11 महीना)
छोटा दौर, पर तीखा। अगर घमंड हावी है, तो यह वक्त सज़ा जैसा लग सकता है — मान-हानि, कोर्ट-कचहरी या सरकारी नोटिस जैसी परेशानियां आ सकती हैं।
दिल, सिरदर्द या हड्डियों की कमजोरी पर ध्यान दें। पिता से मतभेद या गुरुजनों से नाराज़गी भी इसी दौर की पहचान है।
उपाय: रविवार को चना-गुड़ का दान करें, रोज़ पिता का आशीर्वाद लें।

6. शनि में चंद्रमा — "मन बेचैन, नींद गायब" (1 साल 7 महीना)
मन (चंद्रमा) और कर्म (शनि) की टक्कर इस दौर को उथल-पुथल भरा बना देती है। बार-बार जगह बदलने का मन करता है, स्थिरता मुश्किल हो जाती है।
नींद न आना, डिप्रेशन जैसा एहसास या पानी से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। मां की सेहत पर भी असर पड़ सकता है।
उपाय: रात को सिरहाने पानी रखें, सुबह पीपल में डालें। चांदी की अंगूठी पहनें।

7. शनि में मंगल — "आग और हवा का धमाका" (1 साल 1 महीना)
मंगल शनि का सबसे बड़ा दुश्मन है, इसलिए यह दौर सबसे ज्यादा सावधानी मांगता है। जल्दबाजी में लिए फैसले व्यापार को डुबो सकते हैं। आग या मशीनों से नुकसान की आशंका रहती है।
सर्जरी, चोट या खून से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। भाइयों से विवाद और लव लाइफ में ब्रेकअप भी इसी दौर की पहचान है।
उपाय: कुत्तों को मीठी रोटी खिलाएं, हनुमान जी को लाल वस्त्र चढ़ाएं।

8. शनि में राहु — "माया का चक्कर" (2 साल 10 महीना)
दो "पापी" ग्रहों का मेल — नतीजा अचानक और नाटकीय। राजनीति और स्टॉक मार्केट में बड़ा रिस्क, लेकिन अचानक तरक्की के मौके भी।
उलझी हुई बीमारियां और पैरों में भारीपन महसूस हो सकता है। टेक्नोलॉजी में रुचि बढ़ती है, लेकिन गुप्त दुश्मनों से भी सावधान रहना होगा।
उपाय: शनिवार को सरस्वती चालीसा पढ़ें, बहते पानी में नारियल प्रवाहित करें।

9. शनि में गुरु — "यात्रा का सुनहरा अंत" (2 साल 6 महीना)
19 साल की इस लंबी परीक्षा का समापन सबसे मीठा होता है। स्थाई सफलता, नाम और इज्जत — सब इसी दौर में मिलता है।
लिवर या वजन बढ़ने की चिंता रह सकती है, लेकिन ज्ञान की ऊंचाई, संतान सुख और मांगलिक कार्य इस पड़ाव को यादगार बना देते हैं।
उपाय: केसर का तिलक लगाएं, मंदिर में चने की दाल दान करें।

ध्यान देने वाला संकेत
अगर शनि की दशा के दौरान आपके जूते-चप्पल बार-बार टूट रहे हैं, या घर में काली चींटियां दिखने लगी हैं — घबराइए मत। यह शनि के सकारात्मक मोड़ लेने का इशारा है। संघर्ष को स्वीकारें, आत्म-शुद्धि का रास्ता अपनाएं — बाकी शनि खुद संभाल लेंगे।

29/06/2026

यूरोप में इस बार भीषण गर्मी ने कहर बरपा रखा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। ऐसे देशों में जहां सामान्यतः तापमान 20 डिग्री के आसपास रहता है, वहां पारा 40 डिग्री तक पहुंच गया है। एसी और कूलिंग की व्यवस्था न होने के कारण वहां की जनता के लिए यह स्थिति असहनीय हो गई है।

भारत की बात करें तो शुरुआती दिनों में तेज गर्मी पड़ी, लेकिन हर पांच-सात दिन में बारिश होती रही, जिससे गर्मी ज्यादा नहीं बढ़ पाई। वहीं जहां कभी गर्मी पड़ती ही नहीं, वहां भयंकर गर्मी पड़ रही है।

मौसम वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और कई प्रमुख यूट्यूबर्स (जिनमें ध्रुव राठी भी शामिल हैं) ने भारत में कमजोर मानसून और सूखे की आशंका जताई थी। कुछ लोग जामुन के भारी फलने को अकाल का संकेत बता रहे हैं, तो कुछ घाघ जी की परंपरागत भविष्यवाणियां और अल-नीनो का हवाला दे रहे हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस नक्षत्र में अकाल की चर्चा हो रही है।

**मेरा अपना आकलन इन सबसे थोड़ा अलग है।**

17 जुलाई को सूर्य देव कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। उसके बाद बारिश अपने नियमित क्रम में शुरू हो जाएगी। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार शनि और मंगल की स्थिति के कारण वर्षा असमान (कहीं ज्यादा, कहीं कम) रहने की संभावना है। देवगुरु बृहस्पति की अतिचारी गति के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में भारी बारिश, भूस्खलन और नदियों में उफान की प्रबल आशंका है।

- पश्चिमोत्तर भारत में रुक-रुक कर बारिश हो सकती है।
- उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत में पर्याप्त वर्षा के संकेत हैं।

समग्र विश्लेषण में मेघ संबंधित योग पूर्णतः निर्बल नहीं हैं, इसलिए व्यापक अकाल की आशंका नहीं दिख रही है।

> **आर्द्राप्रवेशसमये यद्भवेत् ग्रहसंस्थितिः।**
> **तया वर्षफलं ब्रूयात् शुभाशुभविनिर्णयम्॥**

सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, उसी समय ग्रहों की स्थिति के आधार पर पूरे वर्ष की वर्षा और शुभ-अशुभ फलों का निर्णय किया जाता है।

> **गुरौ बले सुभिक्षं स्यात् दुर्बले तु विपर्ययः॥**
> जब गुरु बलवान होता है तो सुभिक्ष (अच्छी फसल और पर्याप्त वर्षा) होता है। निर्बल होने पर विपरीत परिणाम देखने को मिलते हैं।

> **शनिभौमसमायोगे विषमा वृष्टिरिष्यते॥**
> शनि और मंगल के संयोग में वर्षा विषम (असमान) होती है।

**आगे की बात थोड़ी धार्मिक है…**

दुनिया भर में भूकंप, युद्ध और आगजनी जैसी विभीषिकाएं देखी जा रही हैं, लेकिन भारत में स्थिति अभी भी अपेक्षाकृत ठीक है। यह सब केवल और केवल ईश्वरीय कृपा से ही संभव है।

कष्ट आने पर कुछ लोग भागते हैं, कुछ दौड़ते हैं, पर हम अपने इष्ट को याद करके शांत हो जाते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे वश में कुछ नहीं, सब उनके हाथ में है।

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं:

> **अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।**
> **तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥**

“जो भक्त अनन्य भाव से निरंतर मेरा चिंतन और उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।”

जितना समझ में आया, लिख दिया। आज का लेख बिना ज्यादा सोचे-विचारे ही लिखा है। वैसे मैं सूर्यास्त के बाद लिखने से बचता हूँ। शेष सब जगन्नाथ श्रीकृष्ण ही जानते हैं।

**सभी को शुभ रात्रि 🙏**

**बोलिए आनंदकंद भगवान श्री कृष्ण चंद्र की जय! 🙏**
नमस्कार

26/06/2026

सूर्य 6 जुलाई तक आर्द्रा नक्षत्र में है. आर्द्रा का स्वामी राहु होता है. गोचर में सूर्य राहु परस्पर नव पंचम भाव में है.
आप इन दिनों जिस बात को लेकर जुनून की हद तक सोच रहे हैं, क्या वह बात वास्तव में आपके लिए इतनी जरुरी है? ऑब्सेशन और वास्तविक जरूरत में अंतर होता है.

12/06/2026
09/06/2026

बुधादित्य योग

कई जातक कुंडली दिखाते हुए प्रश्न करते हैं— गुरु जी, मेरी कुंडली में सूर्य और बुध एक साथ हैं, जिससे बुधादित्य योग बन रहा है, फिर भी इसका कोई विशेष लाभ क्यों नहीं मिल रहा?

सबसे पहले यह समझना होगा कि सूर्य लगभग 30 दिन में एक राशि बदलता है और बुध भी सामान्यतः लगभग इसी अवधि में राशि परिवर्तन करता है। सूर्य से बुध की अधिकतम दूरी भी सीमित होती है, इसलिए जन्म कुंडली में दोनों ग्रह प्रायः एक साथ दिखाई देते हैं। यही कारण है कि बुधादित्य योग बहुत बड़ी संख्या में कुंडलियों में पाया जाता है।

यदि केवल सूर्य और बुध के एक साथ होने मात्र से ही बुधादित्य योग के सभी फल मिलने लगें, तो लगभग सभी लोगों में तेज बुद्धि, उत्कृष्ट निर्णय क्षमता, प्रभावशाली वाणी, लेखन कौशल, व्यापारिक सफलता, प्रशासनिक क्षमता, सरकारी पद, सम्मान और प्रतिष्ठा जैसे गुण समान रूप से दिखाई देने चाहिए। जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है।

ऐसा क्यों?

क्योंकि किसी भी योग का फल केवल उसके नाम से नहीं मिलता। सूर्य के अत्यधिक निकट होने के कारण बुध कई बार अस्त अवस्था में होता है। इसके अतिरिक्त ग्रहों की राशि, नक्षत्र, भाव, दृष्टियाँ, युति, बल तथा संपूर्ण कुंडली का संदर्भ भी देखना पड़ता है। कुछ विशेष भाव, जैसे प्रथम, पंचम और दशम, में स्थित सूर्य-बुध की युति अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली परिणाम दे सकती है, यदि अन्य योगकारक स्थितियाँ भी अनुकूल हों।

नोट—जन्म कुंडली में योग या राजयोग होने मात्र से जीवन असाधारण नहीं हो जाता। पृथ्वी पर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसकी कुंडली में दो-चार योग या राजयोग न हों, लेकिन सभी राजा नहीं बनते। योगों को सक्रिय करने के लिए उचित कर्म, प्रयास, ज्योतिषीय सहयोग,अवसर और अनुकूल परिस्थितियाँ भी आवश्यक होती हैं।

04/06/2026



एक सज्जन मिले। कहने लगे- जानते हो तुम्हारा हिन्दू धर्म कमजोर क्यों हो गया?
मैंने कहा- नहीं ! आप बताओ।

उन्होंने मुझे समझाना शुरू किया- देखो ! ये तो तुम लोग स्वयं मानते हो कि तुम सबका पहला और सबसे बड़ा ग्रंथ वेद हैं?

मैंने कहा- हाँ !

और ये भी मानते हो कि इस वेद ज्ञान का प्रकाश स्वयं विधाता ने कुछ ऋषियों के हृदय में किया? उन्होंने आगे पूछा।

मैंने कहा- हाँ ! ऐसा ही है।

तो मेरे भाई ! जब संपूर्ण ज्ञान आ ही गया था तो फिर हिन्दू धर्म में एक के बाद एक ग्रंथ क्यों आते गए? क्यों तुम लोगों ने इसे क्यों allow किया और हर किसी को मनमर्जी से ग्रंथ रचने की छूट दे दी?

मैंने कहा- आपके कहने का अर्थ है कि हमारे ऐसा करने देने के चलते धर्म कमजोर हुआ?

उन्होंने कहा- बिल्कुल, ऐसा ही है।

मैंने उन्हें समझाना शुरू किया- देखिये ! हिन्दू धर्म किसी अन्य मत, मज़हब या पंथ की तरह अचानक ही प्रस्फुटित नहीं हो गया; बल्कि वेदों का ज्ञान हमें जिन ऋषियों से प्राप्त हुए थे वो न तो कोई एक व्यक्ति थे और न ही किसी एक काल विशेष में जन्मे थे। जिन ऋषियों से हमें ये ज्ञान राशि मिली, उन्हीं ऋषियों ने हमसे कहा कहा कि ये वेद तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए है पर इसे प्राप्त कर ही तुम्हें रुक नहीं जाना है; क्योंकि ये जो वेद हैं ये भी कोई आसमान से नहीं आये बल्कि ये हम ऋषियों की निरंतर साधना का परिणाम है। इसलिए हम ऋषियों ने जब स्वयं को जब साधनारत किया था तो सबसे पहले हमने जो ज्ञान प्राप्त कर उसे संकलित किया, उसको नाम दिया "ऋग्वेद"। इसमें हमने प्रकृति और परमात्मा को जाना, फिर हमने जिस ज्ञान की खोज की उसे “यजुर्वेद” नाम देकर में संकलित किया, फिर संगीत के मूल ग्रंथ “सामवेद” की रचना की और अंत में हमने अपने ज्ञान को “अथर्ववेद” में सहेज दिया जिसमें हमने मोक्ष और ब्रहमज्ञान की बातें बताई। तो जब हमने अपने ज्ञान राशियों के संकलन का प्रयास बंद नहीं किया तो तुम कैसे कर सकते हो? याद रखो कि तत्व ज्ञान की निरंतर खोज ही हिन्दू धर्म की विशिष्टता है और यही कारण है कि वेदों का ज्ञान मिलने के बावजूद हमारे यहाँ अनवरत ज्ञान, अनुसंधान और साधना चलती रहनी चाहिए।

इसलिए हमारे यहाँ हरेक को सत्य (जिसे ईश्वर भी कहा गया है) के बारे में विश्लेषण करने की छूट दी गई और तो और जो वेदों को नहीं मानना चाहते थे, उनको भी प्रोत्साहित किया गया कि आप भी अपनी अनुभूति को प्रकट करने और उसका प्रचार करने को स्वतंत्र हो।

हिन्दू धर्म का जो स्वरूप आज आप देख रहे हो वह न जाने कितने ऋषियों, चिंतकों, विचारकों और अनुसंधानकर्ताओं के युगों-युगों के प्रयत्नों का परिणाम है और जिसे आप हिन्दू संस्कृति कहते हो वो इसी अनवरत ज्ञान साधना से निर्मित हुई है। इसलिए हमारा धर्म आज भी एक लंबी दीर्घकालीन यात्रा का एक क्षणिक विराम-स्थल मात्र है, क्योंकि हम यहां आकर भी रुके नहीं है।

उन्होंने पूछा- यहाँ आकर भी रुके नहीं ? इसका क्या अर्थ है?

मैंने कहा- वेदों के बाद हमारे यहाँ ब्राहमण ग्रंथ रचे गये, यानि वो ग्रंथ जो वैदिक मंत्रों की व्याख्या करे, उसके अर्थ को बताये फिर इसके बाद आरण्यक रचे गये, जिसमें यज्ञ और कर्मकांड की विवेचना न करके धर्म के दार्शनिक व आध्यात्मिक तत्वों के बारे में ऋषियों ने चिंतन किया। आरण्यक ग्रंथों से बीज ग्रहण कर उपनिषद् रचे गये, जिनकी संख्या एक सौ आठ से लेकर सवा दो सौ तक कही जाती है। इन उपनिषदों में ब्रहम, माया, प्रकृति आदि का तात्विक विवेचन किया गया। फिर पुराण रचे गये जिसका उद्देश्य था वेद, उपनिषद आदि के सूक्ष्म ज्ञान को कथा और कथानकों के माध्यम से विस्तार देते हुए सरल भाषा में समझाना। ये पुराण भी कई हैं जिसमें 18 मुख्य हैं। फिर वेदांग आये। कभी हमने रामायण को हमने पाथेय बनाया, फिर महाभारत आया, इसी महाभारत में गीता है जिसके बारे में कहा जाता है कि सभी उपनिषद गायें हैं जिन्हें दुहने वाले कृष्ण हैं, अर्जुन बछड़ा है जिसके माध्यम से सुधीजन गीतामृत का पान करते हैं।

श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है। वो जब गीता का ज्ञान देकर गये तब भी उन्होंने ये नहीं कहा कि यही अंतिम है। एक समय आया जब कहा गया कि हम मानव मन के अंदर उठने वाले प्रश्न, जिज्ञासा और उसके उत्तर की वैज्ञानिक विवेचना भी करेंगे और इसी प्रक्रिया में दर्शन शास्त्र का उद्भव हुआ, जिसमें छः दर्शन प्रमुख हैं। रोचक ये कि इसमें कुछ दर्शन तो वैसे हैं जो ईश्वर के अस्तित्व का इंकार करते हैं।

इसके बाद बुद्ध, महावीर, आदि शंकराचार्य और फिर पंद्रहवीं सदी में गुरु नानक आये; ये सब लोग वही थे जो सत्य का अनुसंधान करते थे। इस श्रेणी में तुम स्वामी विवेकानंद को भी रख सकते हो क्योंकि हिन्दू धर्म का आधुनिक स्वरूप उन्हीं के विचारों का प्रतिपादन कर रहा है।

हिन्दू धर्म कमजोर तो तब होता जब हम ज्ञान प्राप्ति की कोशिश छोड़कर जड़ हो जाते, क्योंकि प्रखर, चेतन और उर्वर मानव मस्तिष्क कभी भी थोपी हुई चीज से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि वो विद्रोह कर बैठता है इसलिए हमारे हिन्दू धर्म में तर्क शक्ति और अनुसंधान को हमेशा प्रोत्साहित किया गया ताकि हमारा धर्म मजबूत हो। इसी बात को सबसे पहले ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 164वें सूक्त की 46वीं ऋचा ने कही थी- इन्द्रं एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति...अर्थात् अर्थात् The Truth is one, the wise express it in numerous ways.

सत्य की अलग-अलग अभिव्यक्तियों का ही समुच्चय है हिन्दू धर्म। सत्य पर पीएचडी कराने वाला विश्वविद्यालय है हिन्दू धर्म; क्योंकि हमारे ऋषियों ने वेद और उपनिषद रचे तो उसके भाष्य लिखने वाले अनेक हुए और उन्होंने तरीके से उस ज्ञान को समझा और विस्तृत किया। गीता का भाष्य तो आजतक लिखा जा रहा है।

अगर आप किसी एक मजहब या पंथ विशेष के अनुयायी हैं तो आप अपने यहां बुलाकर मुझे एक या अधिक से अधिक दो या तीन किताबें ऑफर कर सकते हैं; जबकि मैं आपसे गर्व से आपसे कह सकता हूँ- Welcome to our Library……...जिसे कहने का सामर्थ्य दुनिया में किसी और के पास नहीं है!
अभिजीत जी द्वारा लिखित

02/06/2026

बृहस्पति ग्रह सूर्य की परिक्रमा 12 वर्षों में पूरी करता है और यह मूलभूत परिवर्तन और विस्तार का कारक है। 2014 में यह ग्रह कर्क राशि में आया था और अब 31 अक्टूबर तक कर्क राशि में रहेगा, इसके बाद 25 जनवरी से 26 जून 2027 तक कर्क राशि में ही रहेगा। एक प्रसिद्ध कहावत है कि बारह वर्षों के बाद व्यक्ति के भाग्य में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

02/06/2026

राहु पर गुरु की दृष्टि समाप्त हो रही है और शनि पर दृष्टि डालने जा रही है, 2 जून से बड़े षडयंत्रों के खुलासे होंगे।

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