Ravi Agrahari

Ravi Agrahari [ Senior Journlist | Trustee: NVF | Clinical Psychologist, Psycho-Spiritualist, Counsellor and Energy Therapist] What you know is just a pinch of unknown.

25/05/2026

हार कुमार का ये गाना देखा क्या?

23/03/2026

हम केवल Pok लेना चाहते हैं वहाँ पाकिस्तानी भीखमंगई और महंगाई से तंग आकर पूरा पाकिस्तान देने को तैयार हैं!

लाहौल विला कुवत! ये क्या हो रहा है!

सत्ता के लालच और वोट बैंक की राजनीति ने देश का कितना बड़ा नुकसान किया है, ये आँकड़े उसका जीता-जागता प्रमाण हैं! यूपीए सर...
13/03/2026

सत्ता के लालच और वोट बैंक की राजनीति ने देश का कितना बड़ा नुकसान किया है, ये आँकड़े उसका जीता-जागता प्रमाण हैं! यूपीए सरकार के समय जारी किए गए 'तेल बांड' का 3.23 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज मोदी सरकार को अपनी तरफ से चुकाना पड़ा है।

जरा सोचिए, करदाताओं की गाढ़ी कमाई का जो पैसा विकास में लगना चाहिए था, उससे 200 नए AIIMS, 25,000 किमी से ज्यादा हाईवे, 1000 किमी मेट्रो और 1.3 करोड़ गरीबों के लिए पक्के घर बन सकते थे। लेकिन वह सारा पैसा पिछली सरकार की गलत नीतियों की भेंट चढ़ गया।

एक तरफ वो लोग हैं जिन्होंने देश के भविष्य को कर्ज के बोझ तले दबाया, और दूसरी तरफ वो नेतृत्व है जो ईमानदारी से पिछला कर्ज उतार कर एक सशक्त, सुरक्षित और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण कर रहा है। देश का पैसा अब सही हाथों में है। फर्क बिल्कुल साफ है! 🇮🇳

27/02/2026

रंगभरी एकादशी पर माँ गौरा का गौना कराकर अपने धाम पहुँचे बाबा काशी विश्वनाथ!

एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने ग...
01/01/2026

एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।

राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा-

"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।"

अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फेंक दीं।

वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।

उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।

नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा-

"बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है।"

जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे-

"राजा! इसको तू वेश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।"

यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।

राजा की लड़की ने कहा- "पिता जी! मैं जवान हो गई हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं। मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर। कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?"

युवराज ने कहा - "पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैं आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देता। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख।"

जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।"

फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।"

राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।

यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया। उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी।"

समझ आने की बात है। दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है।

प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए। नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें। क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जाएगा।

#अंतर्मन

प्राणायाम -"एकाक्षरं परं ब्रह्म, प्राणायामाः परं तपः।" – मनुस्मृति २.८३एक अक्षर (ॐ) ही (ब्रह्म प्राप्ति का साधन होने से)...
28/12/2025

प्राणायाम -

"एकाक्षरं परं ब्रह्म, प्राणायामाः परं तपः।" – मनुस्मृति २.८३

एक अक्षर (ॐ) ही (ब्रह्म प्राप्ति का साधन होने से) सर्वश्रेष्ठ है, तीन प्राणायाम ही (चान्द्रायण आदि व्रतों से भी) श्रेष्ठ तप है।

प्राण + आयाम =

प्राण (प्र + अन् + अच्) = श्वास, जीवनशक्ति, जीवनदायी वायु अर्थात् वायु या प्राणवायु, अन्दर खींचा हुआ साँस, ऊर्जा, बल, शक्ति, सामर्थ्य, परमात्मा, ब्रह्म, ज्ञानेन्द्रिय, जीव या आत्मा आदि।

आयाम (आ+यम्) = प्रसार, विस्तार, फैलाना, विस्तार करना, निग्रह, नियंत्रण, रोकथाम आदि।

अतः प्राणायाम का अर्थ हुआ अन्दर खींचे हुए प्राणवायु को प्रसार या विस्तार देना अर्थात् प्राण (श्वास) का आयाम (नियंत्रण)।

ऐतरेयोपनिषद् १.४ में इंद्रिय और इंद्रिय अधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति के संदर्भ में आया है: "नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी।" अर्थात् नासिकारंध्र प्रकट हुए, नासिकारंध्रों से ‘प्राण’ हुआ और प्राण से वायु।

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते॥
– बृहदारण्यक उपनिषद् ३.९.९

शाकल्य ने प्रश्न किया – कहते हैं जो वायु है, एक सा ही बहता है, फिर अध्यर्ध (डेढ़) किस प्रकार है?

याज्ञवल्क्य: क्योंकि इसी में यह सब ऋद्धि (वृद्धि) को प्राप्त होता है।

शाकल्य ने पुनः प्रश्न किया – एक देव कौन है?

याज्ञवल्क्य : प्राण ही एक देवता है, वह ब्रह्म है, उसी को ‘तत्’ (वह) कहते हैं।

प्राणों की इन सभी विशिष्टताओं को ध्यान में रख कर ही ऋषि ने भाव विभोर हो कर यह प्रार्थना की है–

नसोर्मे प्राणोऽस्तु। – पारस्कर गृह्यसूत्र २.३.२५

हे ईश्वर! मेरी नासिका में सदा प्राणों की अवस्थिति रहे।

प्राणायाम के तीन भेद हैं – 1. पूरक (श्वास को भीतर ले जाकर फेफड़े को भरना) 2. कुम्भक (श्वास को भीतर रोकना) और 3. रेचक (श्वास को बाहर निकालना)।

यथा पर्वतधातुनां दोषान् हरति पावकः।
एवमन्तर्गतं पापं प्राणायामेन दह्यते ॥

जिस प्रकार पर्वत से निकले धातुओं का मल अग्नि से जल जाता है, उसी प्रकार प्राणायाम से आंतरिक पाप जल जाता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसकी व्याख्या:

आधुनिक विज्ञान के अनुसार विशाल से विशालतम शरीर क्षुद्र से क्षुद्रतम कोशिकाओं से निर्मित है। यह ऐसा ही है जैसे मधुमक्खी का छत्ता। इन कोशिकाओं का आकार अत्यंत सूक्ष्म होता है। जैसे तर्कुरूपी पेशी-कोशिका 60 से 100 माइक्रॉन तक लंबी होती है।

इन कोशिकाओं को ऊर्जा प्राप्ति हेतु ग्लूकोज के विखण्डन के लिये प्रतिक्षण प्राण या प्राणवायु की आवश्यकता होती है। सोते समय स्थिर दिखने वाली पेशी कोशिकाएँ (muscular cells) भी भूख, प्यास से बेहाल होकर ऊष्मा ऊर्जा की प्राप्ति के लिए लगातार खाती, साँस लेती तथा मल उत्सर्जन करती हैं। इस प्रकार विश्व के प्रत्येक प्राणी की प्रत्येक कोशिका को जिस चीज की प्रतिक्षण समान रूप से आवश्यकता है, वह है– प्राण।

एक कोशकीय अमीबा (amoeba) जैसे प्राणी को इसे ग्रहण करने में बड़ी सुविधा है। वह अपने चारों ओर से कहीं से भी इसे परासरण (osmosis) क्रिया द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है तथा विसरण (diffusion) द्वारा अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकल सकता है।

किन्तु हमारे शरीर में कोशिकाओं का समूह किसी विशाल बस्ती के सदृश है जहाँ स्वच्छ वायु तथा जल के लिए अलग और अपशिष्ट पदार्थों के लिए अलग व्यवस्था होती है। जहाँ पोषक आहार ग्लूकोज आदि को ‘रक्तरस’ (plasma) के रूप में नालियों द्वारा भेजा जाता है। किन्तु प्राण वायु का इस रक्तरस में विलयन बहुत कम हो पता है। अतः इसके लिए उभयावतल डिस्क जैसी या चकती जैसी रक्त-कणिकाएँ (red blood corpuscles) रूपी छोटे-छोटे डिब्बों में बंद करके इसी रक्त में तैराकर धमनी (artery) धमनिका (arteriole) तथा केशिकाओं (capillary) रूपी बंद नालियों के द्वारा तैराकर अंतिम छोर की कोशिकाओं तक पहुँचाया जाता है।

इन नलिकाओं तथा कणिकाओं की लघुता अत्यंत विस्मयजनक है। धमनिका का व्यास लगभग 0.01 मिलीमीटर या 10 माइक्रॉन (एक मिलीमीटर का सौवाँ भाग) तक होता है। इसके अंदर लगभग 0.007 मिलीमीटर या 7-8 माइक्रॉन व्यास की रक्त-कणिकाएँ अपने डिब्बे में प्राणवायु को लेकर तैरती हैं।

इनकी लघुता का अनुमान आप ऐसे लगा सकते हैं कि एक घन मिलीमीटर रक्त में इन कोशिकाओं की संख्या लगभग 50 लाख होती है। अर्थात् यदि शरीर में 3 लीटर रक्त है तो इसमें 15 खरब कणिकाएँ समाती हैं जिन्हें प्राण फेफड़ों से मिलता है और इन्हें पूरे शरीर में पहुँचाने के लिए हृदय को जीवन भर निरन्तर प्रति मिनट औसतन 70 बार आकुंचन करते हुए प्रति आकुंचनों के बीच 0.4 सेकेण्ड का समय विश्राम के नाम पर मिलता है।

फेफड़े में सामान्यतः 300 से 400 करोड़ वायुकोष्ठक (alveoli) होते हैं। इनके चारों ओर रक्तकोशिकाओं का अत्यंत घना जाल बिछा रहता है। इन वायुकोष्ठकों से ऑक्सीजन का रुधिर में तथा रुधिर की कार्बन डाइ ऑक्साइड का वायुकोष्ठकों में विसरण होता रहता है।

सामान्य श्वास-प्रश्वास के समय बहुत कम वायुकोष्ठक ही वायु से भरते हैं जो सामान्य चर्या के लिए तो ठीक है किन्तु प्राणायाम के उपाय से रुधिर को अधिकतम ऑक्सीजन उपलब्ध होती है तथा इसकी अधिकतम मलिनता दूर होती है। इससे रुधिर का रंग अतिस्वच्छ लाल हो जाता है तथा यह शरीर की प्रत्येक कोशिका को अधिकतम ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम हो जाता है।

निष्कर्ष:

शास्त्रों के अनुसार विचार करें अथवा आधुनिक विज्ञान के अनुसार, उपरोक्त तथ्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि प्राणायाम करने से शरीर को ‘प्राण’ के रूप में अतिरिक्त ऊर्जा का लाभ मिलता है जिससे लंबी आयु भी मिलती है। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि प्राणायाम करने से पाप-ताप तो जल ही जाते हैं, शारीरिक उन्नति भी अद्भुत ढंग से होती है। हजारों वर्ष की लंबी आयु भी इससे मिल सकती है। सुन्दरता और स्वास्थ्य के लिए तो यह मानो वरदान ही है।

गच्छंस्तिष्ठन् सदा कालं वायुस्वीकरणं परम् ।
सर्वकालप्रयोगेण सहस्रायुर्भवेन्नरः॥

Ravi Agrahari

#अंतर्मन

समुद्र तट से करीब पाँच मील दूर, नाविकों ने ऐसा नजारा देखा जिसे कोई कभी देखना नहीं चाहता। एक हाथी अथाह समुद्र में डूब रहा...
05/12/2025

समुद्र तट से करीब पाँच मील दूर, नाविकों ने ऐसा नजारा देखा जिसे कोई कभी देखना नहीं चाहता। एक हाथी अथाह समुद्र में डूब रहा था।

उसका सूंड लगातार लहरों से ऊपर उठता और फिर पानी के नीचे चला जाता, वह साँस लेने के लिए तड़प रहा था। हाथी डूब रहा था। हाथी के जीवन पर संकट था वह वहाँ जीवित नहीं रह सकता था।

यह हाथी लैगून पार करते समय बह गया था। धीरे-धीरे दूर समुद्र की ओर बहता गया, और किनारे से दूर होकर जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष चलता रहा। समुद्र ही उसका कैदखाना बन गया।

लेकिन जैसे ही उस इलाके में श्रीलंकाई नौसेना पहुँची, तो उन्होंने देखा कि विशालकाय हाथी काँप रहा था, थका हुआ था और मुश्किल से सिर पानी के ऊपर रख पा रहा था। फिर भी… वह लहरों से लड़ता रहा।

फिर जो हुआ, वह असाधारण था।

नौसेना के गोताखोर उसे बचाने के लिए कूद पड़े। जाल या शांतिदायक दवा के साथ नहीं, बल्कि कोमल आवाज़ और स्थिर हाथों के साथ। उन्होंने उसके पास तैरते हुए उसे शांत किया, उसके विशाल शरीर के चारों ओर रस्सियाँ डालकर धीरे-धीरे तट की ओर खींचना शुरू किया। जबकि समुद्र उन्हें खिलौनों की तरह धकेल रहा था।

बारह घंटे तक उन्होंने हाथी को इंच दर इंच किनारे की ओर ले जाते रहे। हर मिनट महत्वपूर्ण था। हर लहर सब कुछ बर्बाद कर सकती थी। हाथी की हर साँस एक जीत जैसी लग रही थी।

जैसे ही सूर्यास्त हुआ और आकाश सोने की तरह चमक उठा, बचाव टीम ने देखा कि उनकी रस्सियाँ ढीली पड़ गई हैं।

हाथी के पैर आखिरकार रेत को छू गए थे। तभी अंतिम ताकत लगाकर थका हुआ विशालकाय हाथी उठ खड़ा हुआ, सूंड उठाया और एक गहरी, गूंजती हुई आवाज़ निकाली — जैसे कृतज्ञता को साँसों में बदल दिया गया हो।

फिर, बिना किसी हिचकिचाहट के, वह जंगल की ओर चला गया… स्वतंत्र, जीवित और और एक दैवीय कृपा को समेटे घर वापसी।

बचाव करने वालों ने खुशी में नहीं चिल्लाया। वे कुछ बोले नहीं। वे सिर्फ देखते रहे — उस जीवन के लिए सम्मानित होकर जो उन्होंने मौत के किनारे से वापस लाया था।

क्योंकि उस दिन, गहरे पानी और मद्धम रोशनी में, समुद्र ने एक सरल सच्चाई देखी-

जहाँ साहस और करुणा मिलते हैं, वहाँ सबसे भारी आत्मा भी सुरक्षित घर पहुँच सकती है। महादेव 🙏🏻

#अंतर्मन

सुख-दुख किसे कहते है और उनसे निवृत्ति कैसे हो?वास्तव में सुख-दुख हैं नहीं। सब इस बात पर निर्भर है कि हम कहाँ हैं, किस ओर...
04/12/2025

सुख-दुख किसे कहते है और उनसे निवृत्ति कैसे हो?

वास्तव में सुख-दुख हैं नहीं। सब इस बात पर निर्भर है कि हम कहाँ हैं, किस ओर और भावदशा में हैं। जो जैसा है उसे वैसा ही देख पाएँ तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों।

वैसे आम भाषा में सुख और दुःख है क्या? कुछ भी हमारे मन के अनुकूल हो जाए तो सुख हो गया और मन के विरुद्ध हो गया तो दुख हो गया। बाकी कुछ है नहीं सुख-दुख। यह सब हमारे बनाए हुए हैं।

चलिए इसे समझाने के लिए एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। एक कुम्हार था उसकी दो लड़कियाँं थीं। उन दोनों का पास के ही गाँव में विवाह कर दिया था।

एक लड़की के यहाँ खेती का काम था और दूसरी के यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने का काम-धंधा था।

एक दिन कुम्हार लड़कियों से मिलने के लिए गया। पूछा, "बेटी क्या ढंग है? पिता जी खेती सूख रही है। अगर पाँच-दस दिनों में वर्षा नहीं हुई तो फिर कुछ नहीं होगा।

वहाँ से वह दूसरी लड़की के यहाँ गया और पूछा तो वह कहने लगी पिता जी बर्तन बनाकर सूखने के लिए रखे हैं अगर पाँच-दस दिनों में वर्षा हो गई तो सब मिट्टी हो जाएगा।

अब राम जी क्या करें तो क्या करें बताओ? एक के यहाँ वर्षा होने से सुख और दूसरे के यहाँ वर्षा होने से दुख है। जिसके यहाँ वर्षा होने से सुख है उसको वर्षा न होने से दुख है।

तो समझ आ गया होगा कि दरअसल, यह सुख-दुख क्या है। सब मन के भाव हैं। अपने बनाए हुए हैं। जबकि वर्षा हो जाए अथवा वर्षा न हो यह हमारे हाथ में तो है नहीं। फिर क्यों सुखी-दुखी होना। जो हो जाए उसमें प्रसन्न रहो। जो होना होगा वह होकर रहेगा।

लेकिन, इतनी सी बात समझने में भी या इस भाव दशा में आने में भी इंसान पूरा जीवन लगाकर भी नहीं आ पाता। महादेव 🙏🏻

#अंतर्मन

मैं नर्मदा हूँ! जब गंगा नहीं थी, तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था, तभी भी मै थी। मेरे किनारों पर नागर सभ्यता का विकास नही...
24/11/2025

मैं नर्मदा हूँ! जब गंगा नहीं थी, तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था, तभी भी मै थी।

मेरे किनारों पर नागर सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। उन दिनों मेरे तट पर उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था।

मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों में मार्कंडेय, कपिल, भृगु , जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे। यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था। ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए।

इन्हीं ऋषियों में से एक ने मेरा नाम रखा, "रेवा "। रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम "रेवा" रखा।

एक अन्य ऋषि ने मेरा नाम "नर्मदा " रखा। "नर्म" यानी आनंद। आनंद देनेवाली नदी।

मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूँ। गंगा के बाद मेरा ही महत्व है। पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं। स्कंदपुराण का "रेवाखंड" तो पूरा का पूरा मुझको ही अर्पित है।

"पुराण कहते हैं कि जो पुण्य, गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह मेरे दर्शन मात्र से मिल जाता है।"

मेरा जन्म अमरकंटक में हुआ। मैं पश्चिम की ओर बहती हूँ। मेरा प्रवाह आधार चट्टानी भूमि है। जीवन में मैंने सदा कड़ा संघर्ष किया।

मैं एक हूँ, पर मेरे रुप अनेक हैं। मूसलाधार वृष्टि पर उफन पड़ती हूँ, तो गर्मियों में बस मेरी साँस भर चलती रहती है। मैं प्रपात बाहुल्या नदी हूँ। कपिलधारा, दूधधारा, धावड़ीकुंड, सहस्त्रधारा मेरे मुख्य प्रपात हैं।

ओंकारेश्वर मेरे तट का प्रमुख तीर्थ है। महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है। वहाँ के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है। मैं स्वयं को भरूच (भृगुकच्छ) में अरब सागर को समर्पित करती हूँ।

मुझे याद आया।

अमरकंटक में मैंने कैसी मामूली सी शुरुआत की थी। वहाँ तो एक बच्चा भी मुझे लांघ जाया करता था पर यहाँ मेरा पाट 20 किलोमीटर चौड़ा है। यह तय करना कठिन है कि कहाँ मेरा अंत है और कहाँ समुद्र का आरंभ?

पर आज मेरा स्वरुप बदल रहा है। मेरे तटवर्ती प्रदेश बदल गए हैं मुझ पर कई बांध बांधे जा रहे हैं। मेरे लिए यह कष्टप्रद तो है पर जब अकालग्रस्त, भूखे-प्यासे लोगों को पानी, चारे के लिए तड़पते पशुओं को, बंजर पड़े खेतों को देखती हूँ, तो मन रो पड़ता है। आखिर में माँ हूँ।

मुझ पर बने बांध इनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगें। अब धरती की प्यास बुझेगी। मैं धरती को सुजला सुफला बनाऊँगी। यह कार्य मुझे एक आंतरिक संतोष देता है।

त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे!

#अंतर्मन

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