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उत्तर दिशा है सिद्धि-समृद्धि का चमत्कारी क्षेत्र है ।उत्तरं जलस्रवो नित्यं, तत्र तिष्ठन्ति देवताः।शिव आगम, कर्णा अध्याय ...
30/07/2026

उत्तर दिशा है सिद्धि-समृद्धि का चमत्कारी क्षेत्र है ।

उत्तरं जलस्रवो नित्यं, तत्र तिष्ठन्ति देवताः।

शिव आगम, कर्णा अध्याय के अनुसार जहाँ जल उत्तर दिशा से बहता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। इसलिए शिवलिंग से निकलने वाला जल उत्तर की ओर जाए तो वह शुद्धि, समृद्धि और मोक्षमार्ग का प्रतीक होता है।

उत्तरं यत्र वहति हरिजलं शंभुभक्तेः प्रसादम्।

तत्रैव तिष्ठति हरिः स्वयं भक्तवशो नित्यम्॥

अर्थात-जहाँ शिवलिंग से अभिषेक का जल उत्तर दिशा में प्रवाहित होता है, वहाँ स्वयं हरि (विष्णु) और शिव दोनों का आशीर्वाद स्थायी होता है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा में चुंबकीय ध्रुव का प्रभाव सबसे शुद्ध माना जाता है। जल यदि इस दिशा में बहता है तो वह विद्युतचुंबकीय तरंगों को संतुलित कर ऊर्जा प्रवाह को स्थिर करता है। इसलिए प्राचीन मंदिरों में जलहरि का मुख उत्तर की ओर रखने से पूरे गर्भगृह में positive ionic flow बनता है!

उत्तर दिशा क्यों शुभ मानी गई है?

उत्तर दिशा का अधिपति कुबेर हैं-धन, स्थिरता और ज्ञान के देवता। यह दिशा सूर्य के उत्तरायण का संकेत है अर्थात ऊर्ध्वगति, उन्नति और प्रकाश का मार्ग। इसलिए जलहरि का मुख उत्तर की ओर रखने का अर्थ है जीवन का प्रवाह अब नीचे नहीं, ऊपर की ओर उत्तरायण दिशा में हो। यह प्रतीकात्मक रूप से संसारिक भाव से आत्मिक भाव की यात्रा है।

शिवलिंग की जलहरि का अर्थ और रहस्य

जलहरि वह भाग होता है जहाँ शिवलिंग से अभिषेक का जल एकत्र होता है और बाहर निकलता है। यह नालीनुमा भाग सदैव उत्तर दिशा में बनाया जाता है क्योंकि जल उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होकर देवताओं के मार्ग (देवयान) में जाता है। आगम शास्त्र कहता है।

उत्तर का उत्तर- रहस्यमय उत्तर

उत्तर का उत्तर क्या है? यह अत्यंत दार्शनिक प्रश्न है। उत्तर का अर्थ केवल दिशा नहीं, प्रत्युत्तर भी है। जब हम किसी प्रश्न का “उत्तर” देते हैं, तब भी हम ज्ञान के उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हैं। तो उत्तर का उत्तर वह स्थिति है! जहाँ प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। वह है-शिव जो हर प्रश्न, हर दिशा, हर उत्तर से परे है।
उत्तर दिशा में जलहरि का रहस्य यह है कि यह जीवन की चेतना को दक्षिण (मृत्यु) से उत्तर (मोक्ष) की ओर मोड़ने की यंत्र-संरचना है। और उत्तर का उत्तर है!

शिव का मौन -जहाँ कोई प्रश्न, कोई दिशा, कोई जल भी नहीं, केवल अस्तित्व की एकता है।

मस्तिष्क स्वरूप किंग- शिवलिंग

शिवलिंग का वह भाग, जिससे अभिषेक का जल उत्तर दिशा में प्रवाहित होता है, उसे जलहरि” कहा जाता है। शिवलिंग केवल पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि जीवन ऊर्जा की दिशा निर्धारित करने वाला वैदिक यंत्र है।

शिवलिंग पर जब जल, दूध या पंचामृत चढ़ाया जाता है, तो उसका प्रवाह हमारी चेतना के प्रवाह का प्रतीक होता है। वास्तु, आगम और तंत्र सभी कहते हैं जलहरि सदा उत्तर दिशा की ओर ही रखी जानी चाहिए।

उत्तर दिशा का अधिपति कुबेर है! धन, स्थिरता और सिद्धि के देवता। यही दिशा ज्ञान, समृद्धि और मोक्ष की ओर जाने का मार्ग भी मानी गई है।

उत्तर दिशा = देवयान मार्ग यह दिशा सूर्य के उत्तरायण की है अर्थात् प्रकाश, ज्ञान और उन्नति की ओर अग्रसर होना।जब शिवलिंग से जल उत्तर की ओर बहता है, तो वह बताता है कि अब जीवन का प्रवाह मृत्यु (दक्षिण) से हटकर अमरत्व (उत्तर) की ओर है। जो साधक की ध्यानावस्था को गहराई देता है।

शनि को न्याय, कर्म और अनुशासन का देवता माना जाता है। शनि के चाल और गति का प्रभाव मानव जीवन और सम्पूर्ण सृष्टि पर व्यापक ...
28/07/2026

शनि को न्याय, कर्म और अनुशासन का देवता माना जाता है। शनि के चाल और गति का प्रभाव मानव जीवन और सम्पूर्ण सृष्टि पर व्यापक रूप से पड़ता है। 27 जुलाई 2026 से शनि देव मीन राशि में वक्री होने जा रहे हैं और 11 दिसंबर 2026 तक शनि वक्री अवस्था में रहेंगे। पूरे 138 दिन शनि वक्री अवस्था में रहेंगे

ग्रह जब वक्री होता है तब जहां वह बैठा उसके आगे और पीछे वाले घर को भी प्रभावित करता है।

शनि मीन राशि में है वक्री होकर कुंभ और मेष राशि को भी प्रभावित करेंगे।

शनि जब वक्री होते हैं उनका प्रभाव दूगना हो जाता है ।
वर्तमान में शनि बुध के नक्षत्र पर गोचर कर रहे हैं बुध शनि का मित्र है ।

जिन लोगों के बुध मजबूत और अच्छी अच्छी अवस्था में होंगे शनि से उनको काफी लाभ मिलेगा

लेकिन 14 अगस्त 2026 से बुध अस्त हो जायेंगे शनि के निगेटिव प्रभाव में वृद्धि हो सकती है क्योंकि शनि के ठीक एक घर पहले वक्री राहु मंगल के नक्षत्र में गोचर कर रहे हैं।

बुध के अस्त होते ही राहु मंगल शनि का प्रभाव बढ़ जायेगा ।
शनि वक्री हो और गुरु अतिचारी हो तो प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना ज्यादा करना पड़ता है और वर्तमान में गुरु अतिचारी हैं।

शनि वक्री हो तो नये कामों से बचना चाहिए, पुराने और पेंडिंग कामों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए।

बड़े वादों में जल्दबाजी से बचें धैर्य से योजनाएं बनाये
मेष -मकर-कुम्भ-मीन-तुला-सिंह राशि के लोगो को खास ध्यान रखना कार्यों में रूकावटें और मानसिक टेन्सन बढ़ेगा।

वर्तमान में शनि केतु का षडाष्टक योग बना हुआ है 17 अगस्त से सूर्य के सिंह राशि में आ जाने से शनि सूर्य केतु का षडाष्टक बन जायेगा साथ ही सूर्य पर राहु की दृष्टि भी होगी।

यानी एक साथ ग्रहण, षडाष्टक और विस्फोट योग बनेगा
अतः सभी लोगों को अक्टूबर तक ज्यादातर धैर्य और सजगता संयम के साथ काम करने की आवश्यकता होगी

अगस्त सितम्बर का महिना को बड़ी घटना दे सकता है

यदि आपका सिग्नेचर,नाम, व्यापार या दुकान का पहला अक्षर य, भ, ध, फ है तो धनु राशि के अन्तर्गत आते हैं।धनु राशि एक ऐसी राशि...
22/07/2026

यदि आपका
सिग्नेचर,नाम, व्यापार या दुकान का पहला अक्षर य, भ, ध, फ है तो धनु राशि के अन्तर्गत आते हैं।

धनु राशि एक ऐसी राशि है जिसका किसी से कोई दुश्मनी नहीं सब समान है।

जब भी व्यापार, नौकरी, यात्रा, कान्ट्रेक्ट को देखना हो उसकी सफलता जानना हो तो, नाम राशि को महत्व दिया जाता है जन्म राशि को नहीं।

इस नाम राशि से दो ग्रह बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं 1. शनि और 2. शुक्र
इस धनु राशि के बैंक बैलेंस, परिवार,पति/पत्नी के आयु वाणी स्थान में मकर राशि आती जिसके स्वामी शनि है।
शनिदेव आपके कुण्डली में किस भाव,किस राशि,किस नक्षत्र और किन ग्रह योग में है आपके दूसरे घर को काफी हद तक प्रभावित करेगा।

वैसे भी मकर मकर राशि एक ऐसी राशि है जिस भाव हो उस भाव में कमी रहती है।

गोचर में शनि का अस्त होना, वक्री होना,कृतिका,उत्तरा फाल्गुनी,उत्तरा षाढ, रोहिणी,हस्त,श्रवण, मृगशिरा,चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में गोचर करना आपको पारिवारिक और धन सम्बन्धी परेशानी में डाल सकता है।
शनि के परिवर्तन के समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए, महादेव-हनुमान जी की आराधना शनि को प्रसन्न करती है।
मकर राशि का दोष शूलिनी महामंत्र के जाप से दूर होता है।
इन नामो के आय,इनकम के श्रोत को लाने और बढ़ाने वाले शुक्र हो जाते हैं इसलिए भरपूर लाभ के लिए शुक्र का मजबूत होना आवश्यक होता है।

शुक्र अस्त हो तो परेशानियां बढ़ती है ।
शुक्र जब भी सूर्य के नक्षत्र -कृतिका, उत्तराफाल्गुनी,उत्तरा,षाढ,
चंद्रमा के नक्षत्र -रोहिणी,हस्त श्रवण

में गोचर कर रहे हों या राशि में जा रहे हो तो थोड़ा सतर्क हो जाना चाहिए और ख़ासकर तब जब कुण्डली में शुक्र की स्थिति ठीक न हो या शुक्र पाप प्रभाव में हो।
शुक्र को मजबूत लक्ष्मी जी की आराधना बनाती है सफेद वस्त्रों का प्रयोग करना भी अच्छा होता है।

19/07/2026

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19/07/2026

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17/07/2026

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सूर्य हुए दक्षिणायन सूर्य का दक्षिणायन होना एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसमें विज्ञान और धर्म का अद्भुत तालमेल देखने को मिलता...
17/07/2026

सूर्य हुए दक्षिणायन

सूर्य का दक्षिणायन होना एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसमें विज्ञान और धर्म का अद्भुत तालमेल देखने को मिलता है। जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) से दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) की ओर गति करता हुआ प्रतीत होता है, तो इस काल को दक्षिणायन कहा जाता है।

यह चक्र हर साल जुलाई के मध्य (कर्क संक्रांति) से शुरू होकर जनवरी के मध्य (मकर संक्रांति) तक चलता है। आइए इसके वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों पहलुओं को आसान शब्दों में समझते हैं।

1. दक्षिणायन का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सूर्य कहीं आता-जाता नहीं है, बल्कि पृथ्वी की गतियों के कारण हमें ऐसा प्रतीत होता है:

पृथ्वी का अक्षीय झुकाव (Axial Tilt): पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.5° झुकी हुई है और सूर्य के चक्कर लगाती है। जून के अंत यानी Summer Solstice के बाद पृथ्वी की स्थिति सूर्य के सामने इस तरह बदलने लगती है कि सूर्य की सीधी किरणें भूमध्य रेखा (Equator) से धीरे-धीरे दक्षिण की ओर खिसकने लगती हैं।

दिन और रात की अवधि में बदलाव: दक्षिणायन के दौरान उत्तरी गोलार्ध, जिसमें भारत आता है, में धीरे-धीरे दिन छोटे होने लगते हैं और रातें लंबी होने लगती हैं।

ऋतु परिवर्तन: इसी काल में भारत में वर्षा ऋतु, शरद ऋतु और हेमंत ऋतु/ हल्की ठंड का आगमन होता है। मौसम में नमी बढ़ती है, जिससे हवा में बैक्टीरिया और वायरस अधिक सक्रिय हो जाते हैं। हमारा मेटाबॉलिज्म (Metabolism) भी इस समय थोड़ा धीमा हो जाता है, यही कारण है कि इस दौरान खान-पान पर विशेष नियंत्रण रखने की सलाह दी जाती है।

2. दक्षिणायन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
सनातन धर्म में सूर्य के दक्षिणायन काल को आंतरिक साधना, संयम और तपस्या का समय माना गया है:

देवताओं की रात्रि: हिंदू काल गणना के अनुसार, देवताओं का एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि माना जाता है। चूंकि रात विश्राम और साधना के लिए होती है, इसलिए इस काल में शुभ और मांगलिक कार्य- जैसे विवाह, मुंडन आदि कुछ समय के लिए वर्जित या सीमित हो जाते हैं।
चातुर्मास साधना और व्रत का समय: दक्षिणायन के शुरुआती चार महीने "चातुर्मास" कहलाते हैं। इस समय नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव न बढ़े, इसलिए व्रत, उपवास और मानसिक शुद्धि यानी ध्यान-योग पर विशेष बल दिया जाता है।

नकारात्मकता पर विजय के त्योहार: भले ही इस काल में मांगलिक कार्य बंद होते हैं, लेकिन देवी-देवताओं की विशेष कृपा पाने के सबसे बड़े त्योहार इसी दौरान आते हैं। शारदीय नवरात्रि, दशहरा, धनतेरस, दीपावली और छठ पूजा जैसे पर्व दक्षिणायन में ही मनाए जाते हैं, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाते हैं।

पितरों की प्रसन्नता: दक्षिणायन की शुरुआत से ही हमारे पितरों या पूर्वजों के दिन की शुरुआत होती है। इसलिए पितृ पक्ष, श्राद्ध तर्पण और अमावस्या के उपाय इसी काल में किए जाते हैं ताकि पूर्वजों की आत्मा को शांति मिल सके।

संक्षेप में कहें तो: वैज्ञानिक रूप से यह समय हमारे शरीर को बदलते मौसम के अनुकूल ढालने का होता है, और धार्मिक रूप से यह अपनी ऊर्जा को बाहर बिखेरने के बजाय आंतरिक शांति और साधना में लगाने का समय होता है।

जून 2026 का महीना बेहद महत्वपूर्ण और हलचल भरा होने जा रहा है। इस महीने कई बड़े ग्रह अपनी चाल बदल रहे हैं, जिसमें सबसे बड...
29/05/2026

जून 2026 का महीना बेहद महत्वपूर्ण और हलचल भरा होने जा रहा है। इस महीने कई बड़े ग्रह अपनी चाल बदल रहे हैं, जिसमें सबसे बड़ा और ऐतिहासिक गोचर देवगुरु बृहस्पति का है। इसके अलावा शुक्र, सूर्य, मंगल और बुध का भी राशि परिवर्तन होने जा रहा है।

👉🏻बृहस्पति (Guru): गुरु 02 जून 2026 को 12 साल बाद अपनी उच्च राशि कर्क राशि में प्रवेश करेंगे।

👉🏻शुक्र (Venus): 08 जून 2026 को कर्क राशि में गोचर करेंगे।

👉🏻सूर्य (Sun): 15 जून 2026 मिथुन राशि में प्रवेश (सूर्य संक्रांति) करेंगे।

👉🏻बृहस्पति (Guru): 18 जून 2026 को पुष्य नक्षत्र में प्रवेश (शनि के शुभ नक्षत्र में) करेंगे।

👉🏻मंगल (Mars): 21 जून 2026 को वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे।

👉🏻बुध (Mercury): 22 जून 2026 कर्क राशि में प्रवेश

👉🏻बुध (Mercury): 29 जून 2026 कर्क राशि में वक्री (Retrograde) होंगे।

यह इस साल का सबसे बड़ा ज्योतिषीय फेरबदल है। ज्ञान, भाग्य और संतान के कारक गुरु 12 साल बाद अपनी उच्च राशि कर्क (Cancer) में प्रवेश कर रहे हैं। कर्क एक जल तत्व की राशि है और गुरु यहाँ सबसे बलवान होते हैं।
असर: इस गोचर से आध्यात्मिक कार्यों में वृद्धि होगी। शिक्षा, बैंकिंग और ज्ञान के क्षेत्र से जुड़े लोगों को बड़ा लाभ होगा। विशेषकर मेष, मिथुन, कर्क और मीन राशि के जातकों के लिए यह समय भाग्य बदलने वाला साबित हो सकता है।

जून के महीने में कर्क राशि में एक अद्भुत संयोग बनने जा रहा है। 2 जून को गुरु, 8 जून को शुक्र और 22 जून को बुध के आने से कर्क राशि में तीन शुभ ग्रहों की युति बनेगी।

असर: इसके प्रभाव से 'गजकेसरी' जैसे कई शुभ राजयोगों का निर्माण होगा। यह समय कला, साहित्य, पारिवारिक संबंधों और देश की आर्थिक स्थिति के लिए सकारात्मक बदलाव लेकर आएगा।

सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर अपने मित्र बुध की राशि मिथुन में प्रवेश करेंगे।

असर: मिथुन राशि में सूर्य के आने से लोगों की निर्णय क्षमता, बौद्धिक शक्ति और संचार कौशल

(Communication Skills) में सुधार होगा। व्यापारिक वर्ग के लिए नई योजनाएं बनाने का यह बेहतरीन समय होगा।

साहस और ऊर्जा के कारक मंगल ग्रह 21 जून को शुक्र की राशि वृषभ में प्रवेश करेंगे।
वृषभ राशि के जातकों के आत्मविश्वास में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी। हालांकि, मंगल के इस गोचर के कारण भूमि-भवन से जुड़े मामलों में तेजी आएगी, लेकिन लोगों को अपनी वाणी पर थोड़ा नियंत्रण रखना होगा क्योंकि यहाँ मंगल थोड़े उग्र हो सकते हैं।

बुध ग्रह 22 जून को कर्क राशि में आएंगे और महीने के ठीक अंत में यानी 29 जून को इसी राशि में उलटी चाल (वक्री) चलना शुरू कर देंगे।
असर: बुध के वक्री होने से तकनीकी गैजेट्स में खराबी, दस्तावेजों (Documents) में गड़बड़ी और पारिवारिक बातचीत में गलतफहमियां बढ़ सकती हैं। इस दौरान कोई भी बड़ा वित्तीय फैसला सोच-समझकर लेना सही रहेगा।

जून 2026 के इन भारी गोचरों के चलते वृषभ, मेष, सिंह, कन्या और मीन राशि के जातकों को करियर, व्यापार और धन के मामले में छप्परफाड़ सफलता मिलने के मजबूत योग दिखाई दे रहे हैं।

कलयुग में सहि और सत्य को संघर्ष दुगना करना पड़ता है
26/05/2026

कलयुग में सहि और सत्य को संघर्ष दुगना करना पड़ता है

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