30/08/2026
श्री सुभाष पाण्डेय जी के एह रचना के भाव-व्याख्या भोजपुरश्री सुभाष पाण्डेय जी के ई रचना मनुष्य के जीवन, ओकर व्यवहार, मान-अपमान, प्रकृति आ मानवीय संवेदना के बहुत गहिराई से छूअत बा। कवि बहुत सहज आ सरल भोजपुरी भाषा में ई संदेश देत बाड़न कि जिनिगी छोट बा, एह से कवनो आदमी के दुखावल, सतावल आ ओकर मन के मंदिर के तोड़ल ठीक नइखे।
“जे फूल से घाही हो ओपर,
पत्थर बरिसावल ठीक ना ह।
मन सबके हS प्रभु के मन्दिर,
मन्दिर भहरावल ठीक ना ह।”
एह पंक्ति में कवि कहत बाड़न कि जे पहिले से दुखी बा, जेकर मन कोमल बा, ओकरा ऊपर फेर से चोट कइल ठीक नइखे। फूल कोमलता आ संवेदना के प्रतीक ह, जबकि पत्थर कठोरता आ चोट के। हर आदमी के मन में भगवान के वास मानल गइल बा। जब मनुष्य कवनो के मन दुखावेला, ओकर आत्मसम्मान के चोट पहुँचावेला, त ऊ जइसे भगवान के मंदिर के ही गिरावत बा। एह से हर आदमी के साथ प्रेम, दया आ सम्मान से व्यवहार करे के चाहीं।
“ई जिनिगी हS, ए जिनिगी में,
कुछ मान मिली, अपमान मिली,
अपमान-मान के चक्कर में
माँथा चकरावल ठीक ना ह।”
कवि जीवन के सच्चाई बतावत बाड़न कि जिनिगी में कबो मान मिली, कबो अपमान मिली। ई दुनु जीवन के हिस्सा ह। अगर आदमी हर समय एह बात के सोचत रही कि केतना सम्मान मिलल, केतना अपमान भइल, के का कहलस, त ओकर मन अशांत हो जाई। एह से मान-अपमान के चक्कर में पड़ के अपना मानसिक शांति गँवावल ठीक नइखे। आदमी के अपना कर्म पर ध्यान देबे के चाहीं।
“बेरा अइले नवका-नवका
फल-फूल डाढ़ि पर लगि जाला,
सगरे बा सोरि की किरिपा से,
सोरी के सुखावल ठीक ना ह।”
एह पद में कवि पेड़-पौधा के माध्यम से जीवन के एगो बड़हन सच्चाई बतावत बाड़न। समय आवेला त डाल पर नया फूल आ नया फल लागेला। ई प्रकृति के व्यवस्था आ ओकर कृपा ह। हमनी के जीवन में जे सुख-सुविधा, उपलब्धि आ समृद्धि बा, ओकरा पीछे खाली हमार मेहनत ना, बल्कि प्रकृति, समाज आ बहुत लोगन के योगदान भी बा। एह से जवन स्रोत हमनी के जीवन के सहारा देत बा, ओकरा के नष्ट कइल ठीक नइखे। एह में प्रकृति के रक्षा आ ओकरा प्रति कृतज्ञ रहे के संदेश भी बा।
“पानी पानी कइलसि पानी,
पानी न मिली बिन पानी के,
पनिगर का पानी का खातिर
पानी के गँवावल ठीक ना ह।”
एह पंक्ति में कवि “पानी” शब्द के बहुत सुंदर ढंग से इस्तेमाल कइले बाड़न। पानी जीवन के आधार ह। पानी के बिना जीवन के कल्पना नइखे कइल जा सकत। आदमी अगर अपना छोट स्वार्थ खातिर पानी के बरबाद करी, त आखिर में संकट ओकरा ऊपर ही आई। एह से पानी जइसन अमूल्य प्राकृतिक संसाधन के बचावल जरूरी बा। एह पंक्ति में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ई सीख भी बा कि अपना स्वार्थ खातिर अपना मूल आधार के नष्ट ना करे के चाहीं।
“धन, धरती, महल, रसूख, रूप,
सुख-सम्पति सब चरिदिना हS,
ए चारि दिनन की चलती में
अदिमी के सतावल ठीक ना ह।”
अंतिम पद में कवि जीवन के नश्वरता के बात बहुत प्रभावशाली ढंग से कहत बाड़न। धन-दौलत, जमीन-जायदाद, महल, पद, प्रतिष्ठा, सुंदरता आ सुख-संपत्ति—ई सभे स्थायी नइखे। आदमी खाली कुछ दिन खातिर एह संसार में आवेला आ एक दिन सभ कुछ छोड़ के चल जाला।
जब धन-दौलत आ पद-प्रतिष्ठा सभ कुछ यहीं रह जाए वाला बा, त एह छोट जिनिगी में अपना ताकत, पैसा या रसूख के घमंड में दोसरा आदमी के सतावल काहे? कवि के संदेश बा कि आदमी के अपना जीवन में प्रेम, दया, करुणा आ इंसानियत के जगह देबे के चाहीं।
समूचा रचना के मूल भाव मानवता, करुणा, विनम्रता, प्रकृति-प्रेम आ जीवन के नश्वरता से जुड़ल बा। कवि कहत बाड़न कि जिनिगी बहुत छोट बा आ संसार के धन-दौलत, मान-सम्मान आ सुख-संपत्ति सभे कुछ समय खातिर बा। एह से कवनो आदमी के मन ना दुखावे के चाहीं, कवनो के सतावे के ना चाहीं आ प्रकृति के भी नुकसान ना पहुँचावे के चाहीं।
“मन सबके हS प्रभु के मन्दिर” एह पूरा रचना के सबसे गहिर भाव बा। जब हर आदमी के मन भगवान के मंदिर ह, त हर आदमी के सम्मान कइल, ओकर भावना के कदर कइल आ ओकरा के दुख से बचावल ही सच्चा धर्म आ सच्ची इंसानियत ह।
संक्षेप में, कवि के संदेश बा—
चार दिन के ई जिनिगी में ना कवनो के मन दुखाईं, ना कवनो के सताईं; प्रेम, करुणा आ इंसानियत के साथ जिनिगी जीईं।